8 अगस्त 2026
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एससीआई का $720 मिलियन का वैश्विक टेंडर: 6 कंटेनर जहाज, 8,000 टीईयू क्षमता, भारतीय शिपयार्ड को प्राथमिकता

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एससीआई का $720 मिलियन का वैश्विक टेंडर: 6 कंटेनर जहाज, 8,000 टीईयू क्षमता, भारतीय शिपयार्ड को प्राथमिकता

सारांश

एससीआई का $720 मिलियन का यह टेंडर सिर्फ जहाज खरीद नहीं है — यह भारत के घरेलू शिपयार्ड उद्योग को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की रणनीतिक कोशिश है। आरओएफआर व्यवस्था और ₹24,736 करोड़ की एसबीएफएएस सब्सिडी मिलकर घरेलू निर्माताओं को दुर्लभ प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दे सकती है।

मुख्य बातें

शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एससीआई) ने $720 मिलियन (₹6,858 करोड़) का वैश्विक जहाज निर्माण टेंडर जारी किया।
कुल 6 सेल्युलर कंटेनर जहाज बनाए जाएंगे, प्रत्येक की क्षमता 8,000 टीईयू ; इनमें 2 फर्म और 4 वैकल्पिक ऑर्डर शामिल हैं।
राइट ऑफ फर्स्ट रिफ्यूजल (आरओएफआर) व्यवस्था से भारतीय शिपयार्ड को विदेशी बोली से मूल्य मिलान का पहला अवसर मिलेगा।
भारतीय शिपयार्ड ₹24,736 करोड़ की एसबीएफएएस योजना के तहत प्रति जहाज 15%-25% वित्तीय सहायता पा सकते हैं।
यह टेंडर 2025 में घोषित ₹69,725 करोड़ के समुद्री क्षेत्र पैकेज का हिस्सा है।
अनुभवहीन भारतीय शिपयार्ड विदेशी निर्माताओं के साथ तकनीकी साझेदारी कर टेंडर में भाग ले सकते हैं।

शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एससीआई) ने 8 अगस्त 2026 को अपना अब तक का सबसे बड़ा वैश्विक जहाज निर्माण टेंडर जारी किया — $720 मिलियन (लगभग ₹6,858 करोड़) की अनुमानित लागत से 6 आधुनिक सेल्युलर कंटेनर पोतों के निर्माण हेतु अंतरराष्ट्रीय निविदा आमंत्रित की गई है। प्रत्येक जहाज की क्षमता 8,000 ट्वेंटी-फुट इक्विवेलेंट यूनिट (टीईयू) होगी, जो भारत की समुद्री माल ढुलाई क्षमता में उल्लेखनीय इज़ाफ़ा करेगी।

टेंडर की संरचना और शर्तें

रिपोर्टों के अनुसार, 6 जहाजों में से 2 जहाजों का ऑर्डर निश्चित (फर्म) श्रेणी में है, जबकि शेष 4 जहाज वैकल्पिक (ऑप्शनल) श्रेणी में रखे गए हैं। इस व्यवस्था से एससीआई को भविष्य की परिचालन आवश्यकताओं और बाज़ार की परिस्थितियों के अनुरूप अतिरिक्त जहाजों का ऑर्डर देने का लचीलापन मिलेगा।

टेंडर की तकनीकी शर्तों के अनुसार, विदेशी तकनीकी साझेदार को पिछले 10 वर्षों में कम-से-कम 2 कंटेनर जहाज (5,000 टीईयू या अधिक क्षमता वाले) सफलतापूर्वक बनाकर डिलीवर किए होने चाहिए और वे जहाज वर्तमान में संचालन में होने चाहिए। साथ ही, विदेशी साझेदार को निर्माण के दौरान बुनियादी और विस्तृत डिज़ाइन सहायता भी उपलब्ध करानी होगी।

भारतीय शिपयार्ड को विशेष प्राथमिकता

इस टेंडर की सबसे उल्लेखनीय विशेषता राइट ऑफ फर्स्ट रिफ्यूजल (आरओएफआर) व्यवस्था है। यदि किसी विदेशी शिपयार्ड की बोली सबसे कम रहती है, तो योग्य भारतीय शिपयार्ड को उस मूल्य का मिलान करने का पहला अवसर दिया जाएगा। यदि पहला पात्र भारतीय शिपयार्ड मूल्य मिलान करने में असमर्थ रहता है, तो यह अवसर अगले योग्य भारतीय शिपयार्ड को स्वतः मिलेगा।

यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार घरेलू जहाज निर्माण उद्योग को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने की कोशिश में जुटी है। गौरतलब है कि भारत वैश्विक जहाज निर्माण में अभी भी चीन, दक्षिण कोरिया और जापान से काफी पीछे है।

नए शिपयार्ड के लिए तकनीकी साझेदारी का रास्ता

एससीआई ने उन भारतीय शिपयार्ड्स के लिए भी भागीदारी का मार्ग खुला रखा है जिनके पास बड़े कंटेनर जहाज बनाने का पूर्व अनुभव नहीं है। ऐसे शिपयार्ड अनुभवी विदेशी जहाज निर्माताओं के साथ तकनीकी साझेदारी कर इस टेंडर में भाग ले सकते हैं — जो भारत के शिपयार्ड क्षेत्र में क्षमता निर्माण की दिशा में एक व्यावहारिक कदम माना जा रहा है।

सेल्युलर कंटेनर जहाज विशेष रूप से मानकीकृत कंटेनरों के परिवहन के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं। इनमें ऊर्ध्वाधर गाइड रेल और स्लॉट होते हैं, जिनकी सहायता से 20 फुट और 40 फुट के कंटेनरों को सुरक्षित रूप से एक के ऊपर एक रखा जा सकता है।

शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस स्कीम से मिलेगा फायदा

इस परियोजना में भाग लेने वाले भारतीय शिपयार्ड केंद्र सरकार की ₹24,736 करोड़ की शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस स्कीम (एसबीएफएएस) का लाभ उठा सकते हैं। इस योजना के तहत प्रत्येक जहाज के निर्माण पर 15% से 25% तक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

यह योजना वर्ष 2025 में घोषित ₹69,725 करोड़ के व्यापक समुद्री क्षेत्र पैकेज का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य भारतीय शिपयार्ड्स की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को वैश्विक स्तर पर सुदृढ़ करना है।

आगे की राह

एससीआई का यह टेंडर भारत की समुद्री महत्वाकांक्षाओं को नई दिशा देने वाला कदम है। आरओएफआर व्यवस्था और एसबीएफएएस सब्सिडी के संयोजन से घरेलू शिपयार्ड्स को वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले टिकने का वास्तविक अवसर मिल सकता है। अब देखना यह होगा कि भारत के प्रमुख शिपयार्ड — जैसे कोचीन शिपयार्ड और हिंदुस्तान शिपयार्ड — इस अवसर का कितना लाभ उठा पाते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा आरओएफआर व्यवस्था के क्रियान्वयन में है — क्योंकि अतीत में 'मेक इन इंडिया' के नाम पर दी गई तरजीहें अक्सर मूल्य-प्रतिस्पर्धा की दीवार से टकराकर दम तोड़ देती हैं। भारत के शिपयार्ड अभी भी 8,000 टीईयू श्रेणी के जहाज बनाने में सीमित अनुभव रखते हैं, और तकनीकी साझेदारी का रास्ता खुला रखना व्यावहारिकता की स्वीकृति है। ₹69,725 करोड़ के समुद्री पैकेज और एसबीएफएएस सब्सिडी का संयोजन सही दिशा में है, पर जब तक घरेलू शिपयार्ड स्वतंत्र रूप से बड़े पोत बनाने में सक्षम नहीं होते, तब तक यह 'आत्मनिर्भरता' आंशिक ही रहेगी।
RashtraPress
8 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एससीआई का $720 मिलियन का कंटेनर जहाज टेंडर क्या है?
यह शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा जारी किया गया अब तक का सबसे बड़ा वैश्विक जहाज निर्माण टेंडर है, जिसके तहत $720 मिलियन (लगभग ₹6,858 करोड़) की लागत से 6 सेल्युलर कंटेनर पोत बनाए जाएंगे। प्रत्येक जहाज की क्षमता 8,000 टीईयू होगी।
आरओएफआर व्यवस्था भारतीय शिपयार्ड को कैसे फायदा देती है?
राइट ऑफ फर्स्ट रिफ्यूजल (आरओएफआर) के तहत यदि कोई विदेशी शिपयार्ड सबसे कम बोली लगाता है, तो योग्य भारतीय शिपयार्ड को उस कीमत का मिलान करने का पहला अवसर दिया जाएगा। यदि पहला भारतीय शिपयार्ड असमर्थ रहे, तो यह अवसर अगले योग्य भारतीय शिपयार्ड को मिलेगा।
शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस स्कीम (एसबीएफएएस) क्या है और इससे कितनी सहायता मिलती है?
एसबीएफएएस केंद्र सरकार की ₹24,736 करोड़ की योजना है जो घरेलू जहाज निर्माण को बढ़ावा देती है। इस योजना के तहत प्रत्येक जहाज के निर्माण पर 15% से 25% तक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है और यह 2025 में घोषित ₹69,725 करोड़ के समुद्री पैकेज का हिस्सा है।
क्या अनुभवहीन भारतीय शिपयार्ड भी इस टेंडर में भाग ले सकते हैं?
हाँ, जिन भारतीय शिपयार्ड्स के पास बड़े कंटेनर जहाज बनाने का पूर्व अनुभव नहीं है, वे अनुभवी विदेशी जहाज निर्माताओं के साथ तकनीकी साझेदारी कर इस टेंडर में भाग ले सकते हैं। विदेशी साझेदार के लिए अनिवार्य है कि उन्होंने पिछले 10 वर्षों में कम-से-कम 2 कंटेनर जहाज (5,000 टीईयू या अधिक) बनाकर डिलीवर किए हों।
इस टेंडर के 6 जहाजों में फर्म और वैकल्पिक ऑर्डर का क्या अंतर है?
6 जहाजों में से 2 का ऑर्डर 'फर्म' यानी निश्चित है, जबकि शेष 4 'वैकल्पिक' श्रेणी में हैं। इससे एससीआई को भविष्य की ज़रूरतों और बाज़ार की परिस्थितियों के अनुसार अतिरिक्त जहाजों का ऑर्डर देने या न देने का लचीलापन मिलता है।
राष्ट्र प्रेस
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