सेंसेक्स हफ्ते में 2.68% टूटा, निफ्टी 23,767 पर बंद; कच्चे तेल और वैश्विक महंगाई की दोहरी मार
सारांश
मुख्य बातें
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) सेंसेक्स और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) निफ्टी50 पर इस सप्ताह भारी दबाव रहा — सेंसेक्स 2.68% और निफ्टी 2.33% की साप्ताहिक गिरावट के साथ बंद हुए। 25 जुलाई 2026 को सप्ताह के अंतिम कारोबारी सत्र में सेंसेक्स 331 अंक फिसलकर 76,059 पर और निफ्टी50 0.43% की गिरावट के साथ 23,767 पर बंद हुआ। कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने और पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव गहराने से निवेशकों की धारणा पूरे हफ्ते सतर्क बनी रही।
बाजार पर दबाव के मुख्य कारण
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष और रेड सी में नाकेबंदी के चलते कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गईं, जिसने वैश्विक महंगाई की आशंकाओं को और हवा दी। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका और भारत दोनों में बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी देखी गई। विश्लेषकों का कहना है कि अब सितंबर 2026 में ब्याज दरों में वृद्धि की संभावना पहले से अधिक मजबूत दिख रही है।
इसके अलावा, अमेरिकी टैरिफ से जुड़ी अनिश्चितताओं की वापसी ने घरेलू निवेशकों की भावना को प्रभावित किया। विश्लेषकों के मुताबिक इसका सबसे अधिक असर निर्यात-आधारित कंपनियों पर पड़ा।
सेक्टोरल प्रदर्शन
बैंकिंग और रियल एस्टेट शेयरों में सबसे तीखी बिकवाली देखी गई। वहीं, मजबूत तिमाही नतीजों के बल पर FMCG और ऑटो सेक्टर ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया। लार्ज-कैप शेयरों में बिकवाली का दबाव व्यापक बाजार की तुलना में अधिक रहा।
व्यापक बाजार भी इस गिरावट से अछूता नहीं रहा — निफ्टी मिडकैप-100 में 1.90% और निफ्टी स्मॉलकैप-100 में 2.18% की साप्ताहिक गिरावट दर्ज की गई।
PMI आंकड़ों का असर
विशेषज्ञों के मुताबिक, जुलाई 2026 के PMI (परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स) आंकड़ों ने कारोबारी गतिविधियों में नरमी और आर्थिक माहौल के कमजोर पड़ने के संकेत दिए। यह ऐसे समय में आया है जब एशियाई बाजार पहले से ही दबाव में हैं और वैश्विक निवेशक जोखिम से दूरी बना रहे हैं।
तकनीकी स्तर और आगे की राह
तकनीकी विश्लेषकों के अनुसार, निफ्टी के लिए 23,800–24,000 का दायरा तत्काल रेजिस्टेंस और 23,600–23,700 का स्तर मजबूत सपोर्ट माना जा रहा है। बैंक निफ्टी के लिए 56,000–56,100 पर सपोर्ट और 56,800–56,900 पर रेजिस्टेंस देखा जा रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि कंपनियों की आय में उल्लेखनीय सुधार वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी छमाही से संभव है — बशर्ते कच्चे तेल की कीमतें स्थिर हों और पश्चिम एशिया में तनाव कम हो। आने वाले सत्रों में निवेशकों की नजर अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दर फैसले, वैश्विक महंगाई के आंकड़ों, भारत के IIP (औद्योगिक उत्पादन सूचकांक) और GDP वृद्धि के आंकड़ों पर टिकी रहेगी।