सुमन कल्याणपुर की अंतिम विदाई: फिल्म-संगीत जगत रहा अनुपस्थित, सिर्फ सुरेश वाडकर पहुंचे
सारांश
मुख्य बातें
पद्म भूषण से सम्मानित पार्श्व गायिका सुमन कल्याणपुर का अंतिम संस्कार सोमवार, 2 जून 2025 को मुंबई के पवन हंस श्मशान घाट पर राजकीय सम्मान के साथ किया गया। उनके पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेटा गया, किंतु फिल्म और संगीत उद्योग से केवल पार्श्व गायक सुरेश वाडकर ही उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंचे — शेष उद्योग उल्लेखनीय रूप से अनुपस्थित रहा।
अंतिम संस्कार का विवरण
रिपोर्टों के अनुसार, सुमन कल्याणपुर का निधन रविवार को लोखंडवाला स्थित उनके आवास पर वृद्धावस्था के कारण हुआ। उनके परिवार में उनकी बेटी चारू हैं, जो इस कठिन समय में उनके साथ थीं। सरकार की ओर से राजकीय सम्मान के साथ दी गई अंतिम विदाई उनके असाधारण योगदान की स्वीकृति थी, परंतु बॉलीवुड की अनुपस्थिति ने एक गहरी खामोशी छोड़ी।
संगीत जगत की अनुपस्थिति पर चर्चा
यह ऐसे समय में आया है जब फिल्म उद्योग अपने दिग्गजों के प्रति सम्मान प्रदर्शन के लिए जाना जाता है। गायिका के अंतिम संस्कार में केवल सुरेश वाडकर की उपस्थिति ने सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा छेड़ दी है। आलोचकों का कहना है कि यह उद्योग की उन कलाकारों के प्रति उदासीनता को दर्शाता है जिन्होंने दशकों तक इसकी नींव रखी।
सुमन कल्याणपुर का संगीत सफर
28 जनवरी 1937 को जन्मी सुमन कल्याणपुर ने 1950 और 1960 के दशक में हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम युग में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने शंकर-जयकिशन, ओ.पी. नैयर और कल्याणजी-आनंदजी जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम किया। मोहम्मद रफी के साथ उनके युगल गीत विशेष रूप से अमर हो गए।
गौरतलब है कि लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के बीच हुए मतभेद के दौर में सुमन कल्याणपुर की माँग तेज़ी से बढ़ी, और उन्होंने उस अवसर का पूरा उपयोग अपनी प्रतिभा से किया। उनकी आवाज़ की मधुरता, स्पष्टता और भावनात्मक गहराई उन्हें समकालीनों से अलग करती थी।
बहुभाषी विरासत
सुमन कल्याणपुर ने हिंदी, मराठी, असमिया, कन्नड़ और बंगाली सहित अनेक भारतीय भाषाओं में गीत गाए। उन्होंने भक्ति गीत और गज़लें भी गाईं, जो उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण हैं। प्लेबैक सिंगिंग के स्वर्णिम युग में दिग्गज समकालीनों की भीड़ में भी उन्होंने अपनी एक अलग और अमिट पहचान बनाई।
विरासत और आगे
भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित सुमन कल्याणपुर की आवाज़ आज भी लाखों संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवित है। उनके जाने से भारतीय शास्त्रीय और फिल्म संगीत की एक पूरी पीढ़ी का एक अमूल्य सूत्र टूट गया है। उनकी विरासत उनके गीतों में सदा जीवित रहेगी।