सुमन कल्याणपुर का 89 की उम्र में निधन, अंतिम संस्कार में पहुँचे सिर्फ सुरेश वाडकर
सारांश
मुख्य बातें
दिग्गज पार्श्व गायिका सुमन कल्याणपुर का 89 वर्ष की आयु में मुंबई में निधन हो गया, और उनके अंतिम संस्कार में फ़िल्म व संगीत जगत से केवल गायक सुरेश वाडकर ही पहुँचे। दशकों तक अपनी मधुर आवाज़ से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाली इस कलाकार की विदाई में बड़ी हस्तियों की अनुपस्थिति ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या सिनेमा अपने पुराने सितारों को बहुत जल्दी भुला देता है।
सादगी भरी विदाई और सूना मातम
सुमन कल्याणपुर की आवाज़ ने 1950 और 60 के दशक में हिंदी सिनेमा को कई यादगार गीत दिए, लेकिन उनकी अंतिम यात्रा में इंडस्ट्री की मौजूदगी नगण्य रही। लता मंगेशकर और हाल ही में आशा भोसले के निधन पर जिस तरह पूरी इंडस्ट्री अंतिम दर्शन के लिए उमड़ी थी, सुमन के मामले में वह दृश्य नदारद रहा। श्रद्धांजलि देने पहुँचे एकमात्र चर्चित नाम सुरेश वाडकर थे।
नैय्यर साहब से मनमुटाव और करियर का मोड़
रिपोर्टों के अनुसार, संगीतकार ओ. पी. नैय्यर से उनके रिश्तों में आए मनमुटाव ने उनके करियर को बड़ा झटका दिया। अपनी पहली ही फ़िल्म में सुमन के नाम तीन गाने आए थे, जिनमें से दो नैय्यर ने फ़िल्म से हटा दिए और केवल लोरी “कोई पुकारे तुझे धीरे से” को रहने दिया। फ़िल्म ‘आर-पार’ में भी उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिला, जिसके बाद सुमन ने नैय्यर की फ़िल्मों में गाने से इनकार कर दिया।
लता-रफी विवाद और रफी साहब के साथ युगल गीत
जब लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के बीच मनमुटाव हुआ, तो सुमन के हिस्से में रफी के साथ कई युगल गीत आए और उनकी आवाज़ को बड़ा मंच मिला। लेकिन जैसे ही लता-रफी विवाद सुलझा, सुमन को मिलने वाले बड़े अवसर लगभग बंद हो गए और उनका करियर ढलान पर आ गया। लता मंगेशकर ने एक बार स्वयं कहा था कि सुमन “काफ़ी टैलेंटेड लड़की हैं”, पर उनकी आवाज़ काफ़ी हद तक उनसे मिलती-जुलती थी और सुमन ने अपनी शैली को अलग करने का प्रयास नहीं किया — आलोचकों के अनुसार यही उनके सीमित अवसरों की एक बड़ी वजह बनी।
ढाका से मुंबई तक का सफर
सुमन कल्याणपुर का जन्म 28 जनवरी 1937 को तत्कालीन अविभाजित भारत के ढाका में हुआ था। संगीत की औपचारिक शिक्षा उन्होंने मुंबई में पाई, हालाँकि फ़िल्मी दुनिया में आने की उनकी कोई योजना नहीं थी। वे मुंबई के जे. जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट में पेंटिंग की पढ़ाई कर रही थीं, तभी एक कार्यक्रम में उनकी गायकी सुनकर मशहूर गायक तलत महमूद प्रभावित हुए और यहीं से हिंदी फ़िल्म संगीत के दरवाज़े उनके लिए खुले।
देर से मिला पद्म भूषण और अधूरी पहचान
वर्ष 2023 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया — यह उनके लंबे व महत्वपूर्ण संगीत योगदान की औपचारिक स्वीकृति थी। हालाँकि, उनके प्रशंसकों का कहना है कि यह सम्मान उन्हें बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। सुधा मल्होत्रा और आशा भोसले के दौर में भी सुमन की आवाज़ श्रोताओं की पसंद बनी रही, पर बदलती परिस्थितियों ने उन्हें धीरे-धीरे पर्दे से ओझल कर दिया। उनकी विदाई के साथ हिंदी फ़िल्म संगीत के स्वर्णिम युग की एक और कड़ी मौन हो गई — और यह सवाल पीछे छोड़ गई कि इंडस्ट्री अपने गुमनाम नायकों को कैसे याद रखेगी।