सुमन कल्याणपुर का 89 की उम्र में निधन, अंतिम विदाई में पहुंचे सिर्फ सुरेश वाडकर
सारांश
मुख्य बातें
दिग्गज पार्श्व गायिका सुमन कल्याणपुर का 89 वर्ष की उम्र में मुंबई में निधन हो गया, लेकिन उनके अंतिम संस्कार में संगीत जगत से केवल गायक सुरेश वाडकर ही पहुंचे। फिल्म और संगीत बिरादरी की बड़ी हस्तियों की गैरमौजूदगी ने एक बार फिर इस बहस को हवा दे दी है कि क्या हिंदी सिनेमा अपने पुराने नगीनों को बहुत जल्दी भुला देता है।
सन्नाटे में हुई अंतिम विदाई
दशकों तक अपनी मखमली आवाज़ से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने वाली सुमन कल्याणपुर की अंतिम यात्रा बेहद सादगी भरी रही। लता मंगेशकर और हाल ही में आशा भोसले जैसी हस्तियों के निधन पर जहाँ पूरा फिल्म उद्योग अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़ा था, वहीं सुमन के मामले में ऐसा कोई दृश्य देखने को नहीं मिला। प्रशंसकों का कहना है कि जिस कलाकार ने सैकड़ों यादगार गीत दिए, उसे यह उपेक्षा रास नहीं आती।
ढाका से मुंबई तक का सफ़र
सुमन कल्याणपुर का जन्म 28 जनवरी 1937 को तत्कालीन अविभाजित भारत के ढाका में हुआ था। संगीत की औपचारिक शिक्षा उन्होंने मुंबई में ली। दिलचस्प बात यह है कि गायिकी उनका पहला लक्ष्य नहीं था — वे मुंबई के जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट में पेंटिंग की पढ़ाई कर रही थीं। एक कार्यक्रम में उनकी आवाज़ सुनकर मशहूर गायक तलत महमूद इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने ही सुमन के लिए हिंदी फिल्म संगीत के दरवाज़े खुलवाए।
ओ.पी. नैय्यर से मनमुटाव और करियर पर असर
सुमन कल्याणपुर का करियर शुरुआत से ही उतार-चढ़ाव से गुज़रा। बताया जाता है कि संगीतकार ओ.पी. नैय्यर से उनके मतभेदों ने उनकी गायिकी पर गहरा असर डाला। उनकी पहली ही फिल्म में उन्होंने तीन गीत रिकॉर्ड किए थे, लेकिन नैय्यर ने उनमें से दो हटा दिए और केवल लोरी ‘कोई पुकारे तुझे धीरे से’ को फिल्म में रखा। फिल्म ‘आर-पार’ में भी उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिला, जिसके बाद सुमन ने नैय्यर की फिल्मों में गाने से ही इनकार कर दिया।
लता-रफी विवाद और रफी के साथ युगल गीत
जब लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के बीच मनमुटाव हुआ, तो सुमन कल्याणपुर के हिस्से में रफी साहब के साथ कई यादगार युगल गीत आए। लेकिन जैसे ही लता और रफी का विवाद सुलझा, सुमन को मिलने वाले अवसरों में तेज़ी से गिरावट आ गई। यहीं से उनके करियर का ढलान शुरू हुआ। लता मंगेशकर ने स्वयं एक बार कहा था कि सुमन बेहद प्रतिभाशाली हैं, परन्तु उनकी आवाज़ काफ़ी हद तक उनकी (लता की) आवाज़ से मिलती है, और इसी समानता ने सुमन को अलग पहचान बनाने का अवसर सीमित कर दिया।
देर से मिला पद्म भूषण
लंबे संगीत योगदान की स्वीकृति के तौर पर भारत सरकार ने उन्हें 2023 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। हालांकि उनके प्रशंसकों का कहना है कि यह सम्मान उन्हें बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। सुधा मल्होत्रा और आशा भोसले के दौर में सुमन की आवाज़ ने अपनी अलग जगह बनाई थी, परन्तु बदलती परिस्थितियों ने उनकी गायिकी को धीरे-धीरे पर्दे से ओझल कर दिया।
एक दौर का अंत, एक सवाल बाक़ी
सुमन कल्याणपुर का जाना हिंदी फिल्म संगीत के स्वर्णिम युग की एक और कड़ी का टूटना है। उनकी अंतिम विदाई में उद्योग की चुप्पी आने वाले समय में भी इस बहस को ज़िंदा रखेगी कि क्या सिनेमा वाक़ई अपने पुराने सितारों के प्रति उतना ही ईमानदार है, जितनी कि उनकी विरासत।