22 सितंबर 2026
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बीमार होने पर भी जीतेंद्र पहुँचे गणपति दर्शन को, बोले — 'बप्पा बुलाते हैं तो मना नहीं कर सकता'

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बीमार होने पर भी जीतेंद्र पहुँचे गणपति दर्शन को, बोले — 'बप्पा बुलाते हैं तो मना नहीं कर सकता'

सारांश

तबीयत ठीक न होने के बावजूद जीतेंद्र पुणे में बप्पा के दर्शन को पहुँचे और कहा — 'स्ट्रेचर पर भी आऊँगा।' 52 साल की परंपरा, बचपन की बूंदी और महाराष्ट्रियन मिट्टी से जुड़ी उनकी यादें — यह सिर्फ एक दर्शन नहीं, एक उम्रभर की श्रद्धा की दास्तान है।

मुख्य बातें

जीतेंद्र मंगलवार, 22 सितंबर 2026 को तबीयत खराब होने के बावजूद पुणे में गणपति दर्शन के लिए पहुँचे।
अभिनेता ने कहा — 'मरते दम तक अपने दो पैरों पर चलना चाहता हूँ, भले ही स्ट्रेचर पर आना पड़े।' मुंबई में उनके घर पर लगभग 52 वर्षों से गणेशोत्सव मनाया जा रहा है।
बचपन में 100 परिवारों वाली चार मंजिला इमारत में वे अकेले पंजाबी परिवार थे; माँ मराठी बोलती थीं।
उन्होंने अपनी महाराष्ट्रियन पहचान पर ज़ोर दिया — 'मैं अंदर और बाहर से महाराष्ट्रियन हूँ।'

दिग्गज बॉलीवुड अभिनेता जीतेंद्र मंगलवार, 22 सितंबर 2026 को तबीयत खराब होने के बावजूद पुणे में गणपति दर्शन के लिए पहुँचे और महाराष्ट्र के साथ अपने गहरे भावनात्मक जुड़ाव को खुलकर साझा किया। उन्होंने कहा कि बप्पा का बुलावा आने पर शरीर की तकलीफ कभी आड़े नहीं आ सकती।

बप्पा का बुलावा और अटूट श्रद्धा

अभिनेता ने बातचीत में कहा, 'देखिए, बप्पा हमें बुलाते हैं और उनका प्यार, हमारे निंबालकर जी का प्यार और लगाव इतना गहरा है कि आना ही पड़ता है। आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है लेकिन मैं मना नहीं कर सकता।' जीतेंद्र की यह श्रद्धा केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि दशकों की परंपरा से जुड़ी हुई है।

आखिरी साँस तक दर्शन की कामना

बप्पा से अपनी इच्छा के बारे में पूछे जाने पर जीतेंद्र ने कहा, 'मेरी बप्पा से प्रार्थना है कि मरते दम तक मैं अपने दो पैरों पर चलना चाहता हूँ और बप्पा के दर्शन करना चाहता हूँ, भले ही इसका मतलब स्ट्रेचर पर आना हो।' उन्होंने यह भी बताया कि उनकी प्रार्थना में परिवार के लिए शांति, स्नेह और अच्छी सेहत की कामना हमेशा शामिल रहती है।

बचपन की यादें और महाराष्ट्रियन पहचान

अभिनेता ने बताया कि वह मुंबई की एक चार मंजिला इमारत में रहते थे जहाँ लगभग 100 परिवार बसे थे — ज़्यादातर महाराष्ट्रियन और कोंकणी — और वह उनमें अकेले पंजाबी थे। उन्होंने कहा, 'मेरे घर में सब कुछ महाराष्ट्रियन था और मेरी माँ भी मराठी बोलती थीं।' गणपति उत्सव को वह अपनी ज़िंदगी का अभिन्न हिस्सा मानते हैं और मुंबई में उनके घर पर लगभग 52 वर्षों से गणेशोत्सव मनाया जा रहा है।

बूंदी की खुशी और सादगी के दिन

जीतेंद्र ने बचपन की छोटी-छोटी खुशियाँ याद करते हुए कहा, 'कोई भी त्योहार हो, हमें बूंदी जरूर मिलती थी और उसे अपनी जेब में डाल लेते थे। हम उन्हें एक-एक करके खाते थे। अब वह मजा नहीं है।' उन्होंने यह भी बताया कि पूरी इमारत में जहाँ सबके पास एयर कंडीशनर था, उनके घर में केवल एक पंखा था — और वह वहाँ 17 साल रहे। 'उसके बाद भगवान की कृपा से मैं एक एक्टर बन गया', उन्होंने कहा।

महाराष्ट्रियन संस्कारों की विरासत

अपनी सांस्कृतिक पहचान पर जीतेंद्र ने ज़ोर देते हुए कहा, 'मैं अंदर और बाहर से महाराष्ट्रियन हूँ। उन लोगों में कभी कोई ईगो या एटीट्यूड नहीं था, लेकिन उनमें बहुत सेल्फ-प्राइड और सेल्फ-रिस्पेक्ट थी। वे पूरी तरह से आत्मनिर्भर होते थे।' यह बयान इस बात की गवाही देता है कि बॉलीवुड के 'जंपिंग जैक' के व्यक्तित्व को गढ़ने में महाराष्ट्र की मिट्टी की भी बड़ी भूमिका रही है। गणेशोत्सव के इस मौसम में उनकी यह यात्रा श्रद्धा, स्मृति और जड़ों से जुड़ाव का प्रतीक बन गई है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जेब में बूंदी, 52 साल की अटूट परंपरा — एक स्पष्ट विरोधाभास रचती है। मुख्यधारा कवरेज इसे 'हार्टवार्मिंग स्टोरी' तक सीमित कर देती है, जबकि असल कोण यह है कि एक पंजाबी परिवार का महाराष्ट्रियन संस्कारों में पूरी तरह रच-बस जाना — भारत की सांस्कृतिक बहुलता का वह रूप है जो राजनीतिक विमर्श में अक्सर नदारद रहता है।
RashtraPress
22 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जीतेंद्र तबीयत खराब होने पर भी पुणे क्यों गए?
जीतेंद्र का मानना है कि बप्पा खुद बुलाते हैं और उनका बुलावा ठुकराना संभव नहीं। उन्होंने कहा कि तबीयत ठीक न होने के बावजूद वह मना नहीं कर सकते, क्योंकि निंबालकर जी और बप्पा का प्यार उन्हें खींच लाता है।
जीतेंद्र के घर पर गणेशोत्सव कितने साल से मनाया जा रहा है?
जीतेंद्र ने बताया कि मुंबई में उनके घर पर लगभग 52 वर्षों से गणेशोत्सव मनाया जा रहा है। यह परंपरा उनके बचपन के महाराष्ट्रियन परिवेश से गहराई से जुड़ी है।
जीतेंद्र का महाराष्ट्र से क्या खास जुड़ाव है?
जीतेंद्र बचपन में मुंबई की एक चार मंजिला इमारत में रहते थे जहाँ लगभग 100 परिवार थे और वे अकेले पंजाबी थे। उनकी माँ मराठी बोलती थीं और उन्होंने महाराष्ट्रियन संस्कारों में पले-बढ़े होने के कारण खुद को 'अंदर और बाहर से महाराष्ट्रियन' बताया।
जीतेंद्र ने बप्पा से क्या प्रार्थना की?
जीतेंद्र ने बप्पा से प्रार्थना की कि वे मरते दम तक अपने दो पैरों पर चलते रहें और उनके दर्शन कर सकें — चाहे इसके लिए स्ट्रेचर पर ही क्यों न आना पड़े। साथ ही उन्होंने परिवार में शांति, स्नेह और अच्छी सेहत की कामना भी की।
जीतेंद्र की बचपन की कौन-सी यादें गणेशोत्सव से जुड़ी हैं?
जीतेंद्र को बचपन में हर त्योहार पर बूंदी मिलने और उसे जेब में रखकर एक-एक करके खाने की छोटी-छोटी खुशियाँ याद आती हैं। उन्होंने कहा कि अब बड़ी चीजों में वह सुकून नहीं मिलता जो बचपन की सादगी में था।
राष्ट्र प्रेस
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