बीमार होने पर भी जीतेंद्र पहुँचे गणपति दर्शन को, बोले — 'बप्पा बुलाते हैं तो मना नहीं कर सकता'
सारांश
मुख्य बातें
दिग्गज बॉलीवुड अभिनेता जीतेंद्र मंगलवार, 22 सितंबर 2026 को तबीयत खराब होने के बावजूद पुणे में गणपति दर्शन के लिए पहुँचे और महाराष्ट्र के साथ अपने गहरे भावनात्मक जुड़ाव को खुलकर साझा किया। उन्होंने कहा कि बप्पा का बुलावा आने पर शरीर की तकलीफ कभी आड़े नहीं आ सकती।
बप्पा का बुलावा और अटूट श्रद्धा
अभिनेता ने बातचीत में कहा, 'देखिए, बप्पा हमें बुलाते हैं और उनका प्यार, हमारे निंबालकर जी का प्यार और लगाव इतना गहरा है कि आना ही पड़ता है। आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है लेकिन मैं मना नहीं कर सकता।' जीतेंद्र की यह श्रद्धा केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि दशकों की परंपरा से जुड़ी हुई है।
आखिरी साँस तक दर्शन की कामना
बप्पा से अपनी इच्छा के बारे में पूछे जाने पर जीतेंद्र ने कहा, 'मेरी बप्पा से प्रार्थना है कि मरते दम तक मैं अपने दो पैरों पर चलना चाहता हूँ और बप्पा के दर्शन करना चाहता हूँ, भले ही इसका मतलब स्ट्रेचर पर आना हो।' उन्होंने यह भी बताया कि उनकी प्रार्थना में परिवार के लिए शांति, स्नेह और अच्छी सेहत की कामना हमेशा शामिल रहती है।
बचपन की यादें और महाराष्ट्रियन पहचान
अभिनेता ने बताया कि वह मुंबई की एक चार मंजिला इमारत में रहते थे जहाँ लगभग 100 परिवार बसे थे — ज़्यादातर महाराष्ट्रियन और कोंकणी — और वह उनमें अकेले पंजाबी थे। उन्होंने कहा, 'मेरे घर में सब कुछ महाराष्ट्रियन था और मेरी माँ भी मराठी बोलती थीं।' गणपति उत्सव को वह अपनी ज़िंदगी का अभिन्न हिस्सा मानते हैं और मुंबई में उनके घर पर लगभग 52 वर्षों से गणेशोत्सव मनाया जा रहा है।
बूंदी की खुशी और सादगी के दिन
जीतेंद्र ने बचपन की छोटी-छोटी खुशियाँ याद करते हुए कहा, 'कोई भी त्योहार हो, हमें बूंदी जरूर मिलती थी और उसे अपनी जेब में डाल लेते थे। हम उन्हें एक-एक करके खाते थे। अब वह मजा नहीं है।' उन्होंने यह भी बताया कि पूरी इमारत में जहाँ सबके पास एयर कंडीशनर था, उनके घर में केवल एक पंखा था — और वह वहाँ 17 साल रहे। 'उसके बाद भगवान की कृपा से मैं एक एक्टर बन गया', उन्होंने कहा।
महाराष्ट्रियन संस्कारों की विरासत
अपनी सांस्कृतिक पहचान पर जीतेंद्र ने ज़ोर देते हुए कहा, 'मैं अंदर और बाहर से महाराष्ट्रियन हूँ। उन लोगों में कभी कोई ईगो या एटीट्यूड नहीं था, लेकिन उनमें बहुत सेल्फ-प्राइड और सेल्फ-रिस्पेक्ट थी। वे पूरी तरह से आत्मनिर्भर होते थे।' यह बयान इस बात की गवाही देता है कि बॉलीवुड के 'जंपिंग जैक' के व्यक्तित्व को गढ़ने में महाराष्ट्र की मिट्टी की भी बड़ी भूमिका रही है। गणेशोत्सव के इस मौसम में उनकी यह यात्रा श्रद्धा, स्मृति और जड़ों से जुड़ाव का प्रतीक बन गई है।