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तिलोत्तमा शोम बोलीं — फिल्म की सफलता को जेंडर से जोड़ना सबसे बड़ा दोहरा मापदंड

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तिलोत्तमा शोम बोलीं — फिल्म की सफलता को जेंडर से जोड़ना सबसे बड़ा दोहरा मापदंड

सारांश

तिलोत्तमा शोम ने बॉलीवुड के उस दोहरे मापदंड पर उँगली उठाई जहाँ पुरुष कलाकारों की फ्लॉप फिल्में नज़रअंदाज़ होती हैं, लेकिन एक महिला प्रधान फिल्म की असफलता पूरे महिला सिनेमा पर सवाल बन जाती है। 'इक्का' में नज़र आ रहीं इस अभिनेत्री का तर्क है — सफलता या असफलता का जेंडर नहीं होता।

मुख्य बातें

अभिनेत्री तिलोत्तमा शोम ने 19 जुलाई को महिला प्रधान फिल्मों पर चल रही बहस में अपनी राय रखी।
उनका कहना है कि फिल्म की सफलता या असफलता को कलाकार के जेंडर से जोड़ना दोहरा मापदंड है।
फिल्म की कामयाबी कहानी, निर्देशन, पटकथा, संगीत और प्रचार सभी पर निर्भर करती है — केवल मुख्य कलाकार पर नहीं।
कंगना रनौत, तापसी पन्नू, विद्या बालन और आलिया भट्ट का उदाहरण देते हुए कहा कि महिलाएँ सफल फिल्में दे चुकी हैं।
तिलोत्तमा ने भाषा में निहित भेदभाव पर भी सवाल उठाया — 'महिला निर्देशक' जैसे शब्दों के इस्तेमाल को अनावश्यक बताया।

अभिनेत्री तिलोत्तमा शोम ने बॉलीवुड में महिला प्रधान फिल्मों को लेकर चल रही बहस पर तीखी और स्पष्ट राय रखी है। उनका कहना है कि किसी फिल्म की सफलता या असफलता को मुख्य कलाकार के जेंडर से जोड़ना न केवल गलत है, बल्कि यह एक गहरे दोहरे मापदंड को दर्शाता है जो बॉलीवुड में वर्षों से चला आ रहा है। यह बयान उन्होंने 19 जुलाई को एक खास बातचीत में दिया, जब वे सनी देओल स्टारर फिल्म 'इक्का' में अपने अभिनय के लिए दर्शकों से प्रशंसा बटोर रही हैं।

दोहरा मापदंड: असली मुद्दा क्या है

तिलोत्तमा ने कहा कि जब पुरुष कलाकारों की एक के बाद एक फिल्में बॉक्स ऑफिस पर नाकाम होती हैं, तब कोई यह सवाल नहीं उठाता कि 'पुरुष प्रधान फिल्में चल नहीं रहीं।' लेकिन जैसे ही किसी महिला केंद्रित फिल्म का प्रदर्शन कमज़ोर रहता है, तुरंत पूरे महिला सिनेमा को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। उनके अनुसार, 'यही सबसे बड़ा दोहरा मापदंड है।'

उन्होंने स्पष्ट किया, 'अगर किसी फिल्म को दर्शक पसंद नहीं करते तो उसकी वजह सिर्फ उसका मुख्य कलाकार नहीं होती। फिल्म की कहानी, निर्देशन, पटकथा, संगीत, प्रचार और कई दूसरे पहलू भी उसकी सफलता या असफलता तय करते हैं।'

सफल महिला कलाकारों का उदाहरण

तिलोत्तमा ने अपनी बात को पुष्ट करने के लिए बॉलीवुड की कई अभिनेत्रियों का नाम लिया। उन्होंने कहा, 'कंगना रनौत, तापसी पन्नू, विद्या बालन और आलिया भट्ट जैसी अभिनेत्रियों ने अपने दम पर कई सफल फिल्में दी हैं।' साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि कई बड़े पुरुष सितारों की फिल्में भी बॉक्स ऑफिस पर उम्मीदों पर खरी नहीं उतरीं। इसलिए सफलता और असफलता को किसी कलाकार के लिंग से जोड़ना तर्कसंगत नहीं है।

भाषा और समाज की सोच पर सवाल

अभिनेत्री ने एक और महत्वपूर्ण बिंदु उठाया — भाषा में निहित भेदभाव। उन्होंने कहा, 'आज भी हम अक्सर 'महिला निर्देशक', 'महिला निर्माता' या 'महिला अभिनेता' जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं, जबकि किसी पुरुष निर्देशक के लिए हम 'पुरुष निर्देशक' नहीं कहते। यह भी एक तरह का भेदभाव है, जिसे सामान्य मान लिया गया है।'

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संदर्भ देते हुए कहा कि दुनिया के कई देशों में कलाकारों को केवल 'अभिनेता' या 'कलाकार' कहा जाता है — महिला और पुरुष के आधार पर अलग पहचान देने की ज़रूरत नहीं समझी जाती। भारत में भी इस सोच को बदलने की आवश्यकता है, क्योंकि महिलाएँ समाज की आधी आबादी हैं।

टीम की जिम्मेदारी: सफलता और असफलता दोनों में

तिलोत्तमा ने अपनी बात को एक सरल लेकिन प्रभावी तर्क से समाप्त किया। उन्होंने कहा, 'जब कोई फिल्म सफल होती है, तो उसका श्रेय पूरी टीम को मिलता है। उसी तरह अगर कोई फिल्म असफल होती है, तो उसकी जिम्मेदारी भी पूरी टीम की होती है — निर्देशक, लेखक, निर्माता, कलाकार और यहाँ तक कि दर्शकों की पसंद भी।'

गौरतलब है कि यह बयान ऐसे समय में आया है जब बॉलीवुड में महिला केंद्रित फिल्मों की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन उनके बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन को लेकर बहस भी तेज़ हुई है। तिलोत्तमा का यह दृष्टिकोण उस बहस को एक नई दिशा देता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन बॉलीवुड की असली समस्या केवल मापदंड की नहीं, बल्कि ढाँचे की भी है — महिला केंद्रित फिल्मों को अक्सर कम बजट, सीमित स्क्रीन और कमज़ोर मार्केटिंग मिलती है, जो बॉक्स ऑफिस तुलना को शुरू से असमान बना देती है। जब तक निर्माण और वितरण के स्तर पर समानता नहीं आती, तब तक 'जेंडर से न जोड़ें' की अपील अधूरी रहेगी। भाषा में बदलाव की उनकी माँग प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है, पर व्यावसायिक सिनेमा में असली बदलाव तब दिखेगा जब महिला निर्देशित और महिला नेतृत्व वाली फिल्मों को बराबर का ग्रीनलाइट मिले।
RashtraPress
20 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तिलोत्तमा शोम ने महिला प्रधान फिल्मों पर क्या कहा?
तिलोत्तमा शोम ने कहा कि किसी महिला प्रधान फिल्म की असफलता को पूरे महिला सिनेमा की विफलता मानना गलत है। उनके अनुसार फिल्म की सफलता या असफलता कहानी, निर्देशन, पटकथा, संगीत और प्रचार सहित कई कारकों पर निर्भर करती है, न केवल मुख्य कलाकार के जेंडर पर।
तिलोत्तमा शोम ने किस फिल्म के सिलसिले में यह बयान दिया?
तिलोत्तमा शोम इन दिनों सनी देओल स्टारर फिल्म 'इक्का' में अपने अभिनय के लिए चर्चा में हैं। इसी फिल्म के प्रचार के दौरान उन्होंने 19 जुलाई को महिला प्रधान फिल्मों पर यह राय साझा की।
तिलोत्तमा शोम ने किन अभिनेत्रियों का उदाहरण दिया?
उन्होंने कंगना रनौत, तापसी पन्नू, विद्या बालन और आलिया भट्ट का नाम लिया और कहा कि इन अभिनेत्रियों ने अपने दम पर कई सफल फिल्में दी हैं, जो साबित करता है कि महिला प्रधान फिल्में सफल हो सकती हैं।
तिलोत्तमा शोम ने भाषा के बारे में क्या कहा?
'महिला निर्देशक' या 'महिला अभिनेता' जैसे शब्दों के इस्तेमाल को तिलोत्तमा ने एक छुपा हुआ भेदभाव बताया। उनका कहना है कि दुनिया के कई देशों में कलाकारों को सिर्फ 'अभिनेता' कहा जाता है और भारत में भी यह सोच बदलनी चाहिए।
फिल्म की असफलता की जिम्मेदारी किसकी होती है?
तिलोत्तमा शोम के अनुसार, जैसे सफलता का श्रेय पूरी टीम को मिलता है, वैसे ही असफलता की जिम्मेदारी भी निर्देशक, लेखक, निर्माता, कलाकार और दर्शकों की पसंद — सभी की सामूहिक होती है।
राष्ट्र प्रेस
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