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अनिद्रा से 50 के बाद कामकाजी जीवन 9 महीने तक घट सकता है: फिनलैंड अध्ययन

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अनिद्रा से 50 के बाद कामकाजी जीवन 9 महीने तक घट सकता है: फिनलैंड अध्ययन

सारांश

फिनलैंड के नए शोध ने चेताया है कि 50 की उम्र के बाद गंभीर अनिद्रा कामकाजी जीवन को करीब नौ महीने तक छोटा कर सकती है। सात से नौ घंटे की नींद सबसे सुरक्षित, जबकि नौ घंटे से अधिक सोना भी जोखिम भरा पाया गया।

मुख्य बातें

फिनलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ तुर्कू के अध्ययन के अनुसार, गंभीर अनिद्रा से 50 वर्ष के बाद कामकाजी जीवन करीब आठ महीने कम हो सकता है।
मध्यम स्तर की नींद संबंधी परेशानी में कामकाजी अवधि करीब पाँच महीने कम पाई गई।
सात से साढ़े आठ घंटे सोने वालों की कामकाजी जीवन प्रत्याशा 13 साल दो महीने रही; नौ घंटे या अधिक सोने वालों में यह 12 साल पाँच महीने रह गई।
बिना नींद की समस्या वाली पेशेवर महिलाओं की कामकाजी जीवन प्रत्याशा सबसे अधिक — लगभग 14 साल — रही।
शोधकर्ताओं ने कार्यस्थल पर नींद जागरूकता कार्यक्रमों और व्यावसायिक स्वास्थ्य थेरेपी को प्रभावी उपाय बताया।
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने माना कि शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य जैसे कारकों को पूरी तरह शामिल नहीं किया जा सका; आगे और शोध ज़रूरी है।

फिनलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ तुर्कू के शोधकर्ताओं के एक नए अध्ययन के अनुसार, रात में खराब या बाधित नींद का असर केवल अगले दिन की थकान तक सीमित नहीं है — 50 वर्ष की उम्र के बाद गंभीर अनिद्रा से पीड़ित कामकाजी लोगों का कामकाजी जीवन करीब नौ महीने तक कम हो सकता है। यह शोध नौकरीपेशा मध्यआयु वर्ग के लोगों के लिए नींद की सेहत को लेकर एक महत्वपूर्ण चेतावनी है।

अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष

शोध में पाया गया कि गंभीर नींद संबंधी परेशानियों से जूझ रहे लोग, बिना किसी नींद की समस्या वाले लोगों की तुलना में 50 से 68 वर्ष की उम्र के बीच करीब आठ महीने कम काम करने की संभावना रखते हैं। मध्यम स्तर की नींद संबंधी परेशानी वाले लोगों की कामकाजी अवधि करीब पाँच महीने कम पाई गई। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह प्रभाव लिंग और नौकरी के प्रकार से स्वतंत्र था।

नींद की परेशानियों में सोने में कठिनाई, रात में बार-बार जागना, सुबह बहुत जल्दी नींद खुलना और पर्याप्त नींद के बावजूद तरोताजा महसूस न करना शामिल था।

नींद की अवधि और कामकाजी जीवन

अध्ययन में रात की नींद को तीन श्रेणियों में बाँटा गया — सात घंटे से कम, सात से साढ़े आठ घंटे और नौ घंटे या उससे अधिक। आँकड़ों के अनुसार, सात घंटे से कम और सात से साढ़े आठ घंटे सोने वालों की 50 वर्ष के बाद कामकाजी जीवन प्रत्याशा करीब 13 साल दो महीने रही। वहीं, नौ घंटे या उससे अधिक सोने वालों में यह अवधि घटकर करीब 12 साल पाँच महीने रह गई।

गौरतलब है कि सबसे लंबी कामकाजी जीवन प्रत्याशा — लगभग 14 साल — बिना नींद की समस्या वाली पेशेवर महिलाओं में देखी गई। इसके विपरीत, गंभीर नींद संबंधी समस्याओं वाले नियमित काम करने वाले पुरुषों में यह अवधि करीब साढ़े 12 साल रही।

शोध की प्रमुख शोधकर्ता की राय

अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता डॉ. साना मायलिन्ताउस्ता ने कहा कि यह चौंकाने वाला था कि सात घंटे से कम सोने और सात से नौ घंटे की नींद लेने वालों की कामकाजी जीवन प्रत्याशा में बड़ा अंतर नहीं मिला। हालाँकि, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि लंबे समय तक सोना कम कामकाजी जीवन और खराब स्वास्थ्य परिणामों से जुड़ा पाया गया।

डेटा स्रोत और शोध की सीमाएँ

शोधकर्ताओं ने फिनिश पब्लिक सेक्टर (FPS) और हेल्थ एंड सोशल सपोर्ट (HeSSup) अध्ययनों के आँकड़ों का उपयोग किया, जिनमें 50 वर्ष की उम्र के बाद प्रतिभागियों की नींद की आदतों का आकलन किया गया था। शोधकर्ताओं ने स्वयं यह भी स्वीकार किया कि अध्ययन में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, पहले से मौजूद बीमारियाँ, स्वास्थ्य संबंधी आदतें और शिफ्ट में काम करने जैसी परिस्थितियों को पूरी तरह शामिल नहीं किया जा सका। इसलिए अनिद्रा और कम कामकाजी जीवन के बीच के संबंध को और गहराई से समझने के लिए आगे शोध की आवश्यकता है।

विशेषज्ञों की सलाह और आगे की राह

शोधकर्ताओं ने मध्यआयु में नींद की सेहत पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत बताई है, खासकर कम सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाले लोगों के बीच। उनके अनुसार, अनिद्रा के उपचार के लिए व्यावसायिक स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से थेरेपी और कार्यस्थल पर नींद संबंधी जागरूकता कार्यक्रम प्रभावी हो सकते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब भारत सहित दुनियाभर में कामकाजी आबादी में अनिद्रा की समस्या तेज़ी से बढ़ रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक श्रम-नीति प्रश्न के रूप में स्थापित करता है — और यही इसकी असली अहमियत है। भारत में जहाँ कामकाजी घंटे लंबे हैं और नींद की समस्याओं को अक्सर 'कमज़ोरी' माना जाता है, वहाँ इस शोध के निहितार्थ गहरे हैं। हालाँकि अध्ययन फिनिश डेटा पर आधारित है और भारतीय कार्यस्थल संदर्भ में इसकी सीधी तुलना सीमित है, फिर भी मध्यआयु में नींद की उपेक्षा के आर्थिक परिणामों को नज़रअंदाज़ करना अब तर्कसंगत नहीं रहा। कंपनियों और नीति-निर्माताओं को कर्मचारी कल्याण कार्यक्रमों में नींद स्वास्थ्य को केंद्रीय स्थान देना चाहिए।
RashtraPress
20 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अनिद्रा का कामकाजी जीवन पर क्या असर पड़ता है?
फिनलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ तुर्कू के अध्ययन के अनुसार, 50 वर्ष की उम्र के बाद गंभीर अनिद्रा से पीड़ित लोगों का कामकाजी जीवन बिना नींद की समस्या वाले लोगों की तुलना में करीब आठ महीने कम हो सकता है। मध्यम स्तर की नींद संबंधी परेशानी में यह अंतर करीब पाँच महीने पाया गया।
50 साल की उम्र के बाद कितने घंटे की नींद सही मानी गई?
अध्ययन में सात से साढ़े आठ घंटे की नींद लेने वालों की कामकाजी जीवन प्रत्याशा करीब 13 साल दो महीने रही, जो नौ घंटे या उससे अधिक सोने वालों (12 साल पाँच महीने) से बेहतर थी। शोधकर्ताओं के अनुसार, अत्यधिक नींद भी खराब स्वास्थ्य परिणामों से जुड़ी पाई गई।
यह अध्ययन किसने और कैसे किया?
यह शोध फिनलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ तुर्कू के शोधकर्ताओं ने किया, जिसमें फिनिश पब्लिक सेक्टर (FPS) और हेल्थ एंड सोशल सपोर्ट (HeSSup) अध्ययनों के आँकड़ों का उपयोग किया गया। अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता डॉ. साना मायलिन्ताउस्ता थीं।
अनिद्रा से बचाव के लिए क्या उपाय सुझाए गए हैं?
शोधकर्ताओं ने व्यावसायिक स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से थेरेपी और कार्यस्थल पर नींद संबंधी जागरूकता कार्यक्रमों को प्रभावी उपाय बताया है। उन्होंने विशेष रूप से कम सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाले मध्यआयु कामकाजी लोगों पर ध्यान देने की ज़रूरत रेखांकित की है।
क्या इस अध्ययन की कोई सीमाएँ हैं?
हाँ, शोधकर्ताओं ने स्वयं माना कि अध्ययन में शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य, पहले से मौजूद बीमारियाँ, स्वास्थ्य संबंधी आदतें और शिफ्ट में काम करने जैसी परिस्थितियों को पूरी तरह शामिल नहीं किया जा सका। इसलिए अनिद्रा और कम कामकाजी जीवन के बीच के संबंध को और स्पष्ट करने के लिए आगे शोध आवश्यक है।
राष्ट्र प्रेस
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