50+ उम्र के कर्मचारियों में नींद की गुणवत्ता खराब, एडिनबर्ग अध्ययन में काम का तनाव सबसे बड़ा कारण
सारांश
मुख्य बातें
यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के एक नए शोध में सामने आया है कि 50 से 66 वर्ष की उम्र के कर्मचारियों में नींद से जुड़ी गंभीर समस्याएँ अनुमान से कहीं अधिक व्यापक हैं, और इनकी जड़ में उम्र से ज़्यादा कार्यस्थल का तनाव है। अध्ययन के अनुसार, करीब 92 प्रतिशत प्रतिभागियों में शोध के दौरान कम से कम एक बार नींद संबंधी समस्या के नैदानिक मानक पूरे पाए गए — और इनमें से किसी का भी पहले से कोई ज्ञात स्लीप डिसऑर्डर का इतिहास नहीं था।
अध्ययन की पद्धति और दायरा
इस शोध में 50 से 66 वर्ष आयुवर्ग के 45 कर्मचारियों को शामिल किया गया, जो विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत थे। शोधकर्ताओं ने करीब एक वर्ष तक इन प्रतिभागियों की निगरानी की। इस दौरान स्वास्थ्य, कार्य और जीवनशैली से जुड़े प्रश्न पूछे गए और स्मार्टवॉच तथा अन्य वियरेबल सेंसर के ज़रिए नींद के वस्तुनिष्ठ आँकड़े एकत्र किए गए।
शोध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की सहायता से यह विश्लेषण किया गया कि नींद और समग्र स्वास्थ्य पर सबसे अधिक प्रभाव डालने वाले कारण कौन से हैं। इस विश्लेषण में काम से जुड़े अनुभव सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारकों में उभरे।
मुख्य निष्कर्ष
अध्ययन के अनुसार, करीब 70 प्रतिशत प्रतिभागियों को लगातार ऐसी नींद की समस्या थी जिसे चिकित्सकीय रूप से गंभीर माना जा सकता है। अधिकांश लोग रात में 6.5 से 8 घंटे सो रहे थे, फिर भी सुबह उठने पर उन्हें पूर्ण विश्राम का अनुभव नहीं होता था। गौरतलब है कि समस्या नींद की अवधि नहीं, बल्कि नींद की गुणवत्ता थी — रात में बार-बार नींद टूटना इसकी मुख्य वजह पाई गई। करीब 90 प्रतिशत प्रतिभागियों में अध्ययन के दौरान नींद में रुकावट दर्ज की गई।
यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब कार्यबल में उम्रदराज़ कर्मचारियों की हिस्सेदारी बढ़ रही है और नियोक्ता कर्मचारी कल्याण को उत्पादकता से जोड़ने पर ज़ोर दे रहे हैं।
काम का तनाव बनाम उम्र का प्रभाव
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि नींद की ये समस्याएँ केवल उम्र बढ़ने का स्वाभाविक परिणाम नहीं हैं। जिन प्रतिभागियों ने बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस और नौकरी से संतुष्टि की बात कही, उनमें मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य भी बेहतर पाया गया। इसके विपरीत, जो लोग काम के दौरान तनाव, चिड़चिड़ापन या उदासी महसूस करते थे, उनमें स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ अधिक देखी गईं।
कई प्रतिभागियों का मानना था कि उनकी खराब नींद का कारण पर्याप्त समय न मिलना है, लेकिन स्मार्टवॉच के आँकड़ों ने इस धारणा को चुनौती दी — असली समस्या नींद में बार-बार खलल पड़ना थी।
विशेषज्ञ की राय
यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग बिजनेस स्कूल की डॉ. बेलिंडा स्टेफन ने कहा कि उम्र से जुड़े शारीरिक बदलावों के अलावा आर्थिक चिंता, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और काम का दबाव भी नींद को गहराई से प्रभावित करते हैं। उनके अनुसार, नींद को अब कार्यस्थल की सेहत और कर्मचारी कल्याण से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
आगे की राह
इस शोध के निष्कर्ष संकेत देते हैं कि नियोक्ताओं और नीति-निर्माताओं को 50 वर्ष से अधिक आयु के कर्मचारियों के लिए विशेष कार्यस्थल नीतियाँ बनाने की ज़रूरत है — जिनमें तनाव प्रबंधन, लचीले कार्य-घंटे और नींद स्वास्थ्य जागरूकता शामिल हो। शोधकर्ताओं का कहना है कि बड़े नमूने पर किए गए दीर्घकालिक अध्ययन इन निष्कर्षों को और पुख्ता कर सकते हैं।