क्या 'इंटरमिटेंट फास्टिंग' केवल एक फिटनेस ट्रेंड है या महिलाओं के लिए है जोखिम भरा?
सारांश
Key Takeaways
- इंटरमिटेंट फास्टिंग एक लोकप्रिय डाइट ट्रेंड है।
- यह महिलाओं के लिए खतरनाक हो सकता है।
- आयुर्वेद और विज्ञान दोनों इसे सावधानी से अपनाने की सलाह देते हैं।
- शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।
- डॉक्टर की सलाह लेना आवश्यक है।
नई दिल्ली, 10 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग वजन कम करने और फिट रहने के लिए नए-नए डाइट ट्रेंड्स का सहारा लेते हैं। इन्हीं में से एक है इंटरमिटेंट फास्टिंग, जिसे कई लोग चमत्कारी उपाय समझते हैं। सोशल मीडिया, फिटनेस इन्फ्लुएंसर्स और जिम कल्चर ने इसे इतना लोकप्रिय बना दिया है कि लोग बिना पूरी जानकारी और डॉक्टर की सलाह के इसे अपनाने लगे हैं।
देखने में यह तरीका आसान प्रतीत होता है, जिसमें कुछ घंटों तक भोजन सेवन नहीं किया जाता है और बाकी समय अपनी पसंद का खाना खाया जाता है। लेकिन आयुर्वेद और विज्ञान दोनों मानते हैं कि हर शरीर एक जैसा नहीं होता और हर डाइट सभी के लिए उपयुक्त नहीं हो सकती।
इंटरमिटेंट फास्टिंग का प्रभाव पूरे शरीर पर पड़ता है। आयुर्वेद के अनुसार, हमारा पाचन तंत्र, जिसे अग्नि कहते हैं, एक निश्चित समय पर भोजन की मांग करता है। लंबे समय तक भूखा रहना इस अग्नि को कमजोर कर सकता है, जिससे शरीर में वात दोष बढ़ता है। यही वजह है कि कई लोगों को इस डाइट के दौरान गैस, सिरदर्द, चक्कर और थकान जैसी समस्याएं होने लगती हैं। विज्ञान भी मानता है कि जब शरीर को लंबे समय तक भोजन नहीं मिलता, तो वह तनाव की स्थिति में चला जाता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर इस डाइट का असर सबसे पहले स्पष्ट होता है। इंटरमिटेंट फास्टिंग के कारण शरीर में कोर्टिसोल नामक तनाव हार्मोन का स्तर बढ़ सकता है। इससे व्यक्ति को बेचैनी, घबराहट और नींद न आने की समस्या हो सकती है। कई लोग यह समझ नहीं पाते कि उनकी चिड़चिड़ाहट और मूड स्विंग्स की वजह उनकी डाइट है।
महिलाओं के लिए इंटरमिटेंट फास्टिंग एक और अधिक संवेदनशील विषय है। महिलाओं का हार्मोनल सिस्टम पुरुषों की तुलना में अधिक नाजुक होता है। आयुर्वेद में कहा गया है कि अनियमित भोजन से शरीर का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ सकता है। रिसर्च भी बताती है कि लंबे समय तक फास्टिंग करने से महिलाओं में पीरियड्स अनियमित हो सकते हैं, थायरॉयड की समस्या बढ़ सकती है और फर्टिलिटी पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा, शुगर लेवल में बार-बार उतार-चढ़ाव हो सकता है।
इंटरमिटेंट फास्टिंग का एक बड़ा नुकसान मांसपेशियों पर भी पड़ता है। यदि शरीर को समय पर पोषण नहीं मिलता, तो वह ऊर्जा मांसपेशियों को कमजोर कर सकता है। इससे शरीर बाहर से पतला दिखता है, लेकिन अंदर से काफी कमजोर हो जाता है। प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम और विटामिन्स जैसे आवश्यक पोषक तत्व सीमित समय में पूरी मात्रा में लेना हर किसी के लिए संभव नहीं होता।
डायबिटीज, लो ब्लड प्रेशर, बुजुर्गों और ईटिंग डिसऑर्डर से जूझ रहे लोगों के लिए यह डाइट खतरनाक साबित हो सकती है। इंटरमिटेंट फास्टिंग से ब्लड शुगर नीचे गिर सकता है, जिससे बेहोशी आ सकती है। इसलिए विशेषज्ञ हमेशा यही सलाह देते हैं कि किसी भी डाइट को अपनाने से पहले अपने शरीर को समझना अत्यंत आवश्यक है।