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कर्णपीड़ासन: मानसिक एकाग्रता बढ़ाने वाला योगासन, जानें सही विधि और सावधानियाँ

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कर्णपीड़ासन: मानसिक एकाग्रता बढ़ाने वाला योगासन, जानें सही विधि और सावधानियाँ

सारांश

बाहरी शोर से मुक्ति दिलाने वाला कर्णपीड़ासन हलासन का उन्नत रूप है। घुटनों से कानों पर हल्का दबाव डालकर की जाने वाली यह मुद्रा तंत्रिका तंत्र को शांत करने और मानसिक एकाग्रता बढ़ाने में सहायक मानी जाती है — बशर्ते इसे सही विधि और आवश्यक सावधानियों के साथ किया जाए।

मुख्य बातें

कर्णपीड़ासन संस्कृत के तीन शब्दों — कर्ण (कान), पीड़ा (दबाव) और आसन (मुद्रा) — से बना है।
यह आसन हलासन और सर्वांगासन के बाद किया जाता है और इसे हलासन का उन्नत स्वरूप माना गया है।
इस मुद्रा में 30 से 60 सेकंड तक रहने की सलाह दी जाती है।
नियमित अभ्यास से तनाव में कमी , पाचन सुधार और मानसिक स्थिरता में लाभ हो सकता है।
गर्दन-रीढ़ की चोट, हर्निया, उच्च रक्तचाप या ग्लूकोमा से पीड़ित लोग यह आसन केवल चिकित्सकीय सलाह पर करें।

कर्णपीड़ासन एक उन्नत योगासन है जो बाहरी शोर और व्यवधानों से ध्यान हटाकर आंतरिक चेतना पर केंद्रित करने में सहायक माना जाता है। योग परंपरा के अनुसार, इस आसन के नियमित अभ्यास से तंत्रिका तंत्र को शांत रखने, रीढ़ की हड्डी के लचीलेपन और मानसिक एकाग्रता में सुधार हो सकता है। आज की तनावपूर्ण जीवनशैली में यह आसन विशेष रूप से प्रासंगिक माना जा रहा है।

कर्णपीड़ासन का अर्थ और परंपरा

संस्कृत में कर्णपीड़ासन तीन शब्दों से मिलकर बना है — 'कर्ण' (कान), 'पीड़ा' (दबाव या खिंचाव) और 'आसन' (मुद्रा)। इस मुद्रा में घुटनों द्वारा कानों पर हल्का दबाव डाला जाता है, जिससे बाहरी ध्वनियाँ अवरुद्ध होती हैं और साधक का ध्यान भीतर की ओर केंद्रित होता है।

आयुर्वेद और योग परंपरा में इसे हलासन का उन्नत स्वरूप माना गया है। यह आसन सामान्यतः हलासन और सर्वांगासन के बाद किया जाता है, जिससे शरीर पहले से तैयार अवस्था में रहता है।

अभ्यास की सही विधि

इस आसन को करने के लिए सबसे पहले पीठ के बल सीधे लेट जाएं और हथेलियों को जमीन की ओर रखें। सांस लेते हुए दोनों पैरों को ऊपर उठाएं और सिर के पीछे ले जाकर हलासन की मुद्रा बनाएं।

इसके बाद धीरे-धीरे घुटनों को मोड़ते हुए कानों के दोनों ओर जमीन पर टिकाने का प्रयास करें। हाथों को पीठ के सहारे रखें या जमीन पर सीधा रखें। सामान्य गति से सांस लेते हुए 30 से 60 सेकंड तक इस स्थिति में बने रहें।

संभावित लाभ

योग विशेषज्ञों के अनुसार, इस आसन के नियमित अभ्यास से तनाव में कमी, पाचन क्रिया में सुधार और मानसिक स्थिरता में वृद्धि हो सकती है। पेट और कमर की मांसपेशियाँ इस आसन के दौरान शरीर के संतुलन को बनाए रखने में सक्रिय रहती हैं, जिससे उनकी कार्यक्षमता भी बेहतर होती है।

गौरतलब है कि यह लाभ योग परंपरा और अनुभव-आधारित ज्ञान पर आधारित हैं। किसी भी दावे की पुष्टि के लिए चिकित्सकीय परामर्श आवश्यक है।

किन्हें सावधानी बरतनी चाहिए

निम्नलिखित स्वास्थ्य स्थितियों में यह आसन केवल योग्य योग प्रशिक्षक या चिकित्सक की सलाह पर ही करना चाहिए — गर्दन या रीढ़ की गंभीर चोट, हर्निया, अनियंत्रित उच्च रक्तचाप और ग्लूकोमा। गर्भवती महिलाओं को भी इस आसन से परहेज की सलाह दी जाती है।

यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब शहरी जीवनशैली में तनाव-जनित बीमारियाँ तेज़ी से बढ़ रही हैं और लोग योग जैसे प्राकृतिक उपायों की ओर रुख कर रहे हैं। किसी भी नए योगाभ्यास को दिनचर्या में शामिल करने से पहले प्रशिक्षित मार्गदर्शन लेना उचित रहता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

नैदानिक शोध पर नहीं। यह ज़रूरी है कि पाठक 'सहायक माना जाता है' और 'वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है' के बीच का फ़र्क समझें। बिना प्रशिक्षित निगरानी के उन्नत आसनों का अभ्यास, विशेषकर गर्दन और रीढ़ पर दबाव डालने वाले, चोट का जोखिम भी उठाते हैं जिसे अक्सर स्वास्थ्य लेखों में कम आँका जाता है।
RashtraPress
25 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कर्णपीड़ासन क्या है और इसे क्यों किया जाता है?
कर्णपीड़ासन एक उन्नत योगासन है जिसमें घुटनों से कानों पर हल्का दबाव डाला जाता है, जिससे बाहरी शोर अवरुद्ध होता है और ध्यान आंतरिक चेतना पर केंद्रित होता है। योग परंपरा के अनुसार यह मानसिक एकाग्रता और तंत्रिका तंत्र की शांति के लिए सहायक माना जाता है।
कर्णपीड़ासन करने की सही विधि क्या है?
पीठ के बल लेटकर हथेलियाँ जमीन पर रखें, सांस लेते हुए पैर ऊपर उठाएं और हलासन बनाएं, फिर घुटनों को मोड़कर कानों के दोनों ओर जमीन पर टिकाएं। हाथों को पीठ के सहारे या जमीन पर रखें और सामान्य सांस के साथ 30 से 60 सेकंड तक इस स्थिति में रहें।
कर्णपीड़ासन के क्या लाभ हैं?
योग परंपरा के अनुसार इस आसन के नियमित अभ्यास से तनाव में कमी, रीढ़ के लचीलेपन में सुधार, पाचन क्रिया बेहतर होना और मानसिक स्थिरता में वृद्धि हो सकती है। ये लाभ अनुभव-आधारित हैं; किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए चिकित्सकीय परामर्श आवश्यक है।
किन लोगों को कर्णपीड़ासन नहीं करना चाहिए?
गर्दन या रीढ़ की गंभीर चोट, हर्निया, अनियंत्रित उच्च रक्तचाप और ग्लूकोमा से पीड़ित लोगों को यह आसन केवल योग्य प्रशिक्षक या चिकित्सक की सलाह पर ही करना चाहिए। गर्भवती महिलाओं को भी इससे परहेज की सलाह दी जाती है।
कर्णपीड़ासन और हलासन में क्या अंतर है?
हलासन में पैर सिर के पीछे जमीन पर सीधे टिकाए जाते हैं, जबकि कर्णपीड़ासन में घुटनों को मोड़कर कानों के दोनों ओर रखा जाता है। आयुर्वेद और योग परंपरा में कर्णपीड़ासन को हलासन का उन्नत और गहन स्वरूप माना गया है।
राष्ट्र प्रेस
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