नदिया जिला टीबीमुक्त भारत अभियान में अव्वल, 185 में से 98 ग्राम पंचायतें हुईं टीबीमुक्त
सारांश
मुख्य बातें
पश्चिम बंगाल का नदिया जिला 'प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान' के अंतर्गत तपेदिक (टीबी) उन्मूलन में देशभर के जिलों में शीर्ष स्थान पर पहुँच गया है। जिला प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार, जिले की कुल 185 ग्राम पंचायतों में से 98 ग्राम पंचायतें अब टीबी-मुक्त घोषित हो चुकी हैं — जो एक उल्लेखनीय सार्वजनिक स्वास्थ्य उपलब्धि है।
मुख्य घटनाक्रम: गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज मानक
राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम के तहत तीन श्रेणियों में मान्यता दी जाती है। नदिया जिले की 15 ग्राम पंचायतों में पिछले तीन वर्षों के दौरान टीबी का एक भी मामला सामने नहीं आया है, जिसे 'गोल्ड स्टैंडर्ड' का दर्जा दिया जाता है।
इसके अतिरिक्त, 33 ग्राम पंचायतों में पिछले दो वर्षों से कोई टीबी मामला दर्ज नहीं हुआ, जो 'सिल्वर स्टैंडर्ड' की श्रेणी में आता है। वहीं, 50 ग्राम पंचायतों में पिछले एक वर्ष में टीबी का कोई मामला नहीं मिला, जिन्हें 'ब्रॉन्ज स्टैंडर्ड' में रखा गया है। इस प्रकार, 185 में से 98 ग्राम पंचायतें — यानी आधे से अधिक — अब टीबी-मुक्त श्रेणी में हैं।
जिला मजिस्ट्रेट की प्रतिक्रिया
नदिया के जिला मजिस्ट्रेट डॉ. श्रीकांत पल्ली के अनुसार, यह सफलता टीबी की शीघ्र पहचान, नियमित इलाज, सतत निगरानी और व्यापक जागरूकता अभियानों के संयुक्त प्रयासों का प्रतिफल है।
उन्होंने कहा, 'लगभग 20 साल पहले, नदिया जिले में टीबी के मरीजों की संख्या आज की तुलना में लगभग 30 गुना अधिक थी। अब स्थिति पूरी तरह से बेहतर हो गई है।'
ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी की चुनौती और समाधान
डॉ. पल्ली ने बताया कि टीबी के इलाज में 6 से 18 महीने तक का समय लग सकता है, जो बीमारी की गंभीरता पर निर्भर करता है। पहले मरीज प्रारंभिक राहत मिलते ही बीच में दवाएँ छोड़ देते थे, जिससे 'ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी' का खतरा बढ़ जाता था — यह स्वरूप इलाज के लिहाज से कहीं अधिक जटिल होता है।
इस प्रवृत्ति से निपटने के लिए पिछले कुछ वर्षों में विशेष जोर दिया गया कि मरीज चिकित्सकों की सलाह के अनुसार पूरा इलाज पूरा करें और नियत अवधि तक दवाएँ लेना जारी रखें।
निक्षय मित्र: स्वयंसेवकों की भूमिका
डॉ. पल्ली के अनुसार, फिलहाल अकेले नदिया जिले में लगभग 350 स्वयंसेवक 'निक्षय मित्र' के रूप में कार्यरत हैं। ये स्वयंसेवक टीबी-प्रभावित मरीजों को इलाज की प्रक्रिया में मदद करने के साथ-साथ उचित पोषण (न्यूट्रिशन) सुनिश्चित करने में भी सहयोग करते हैं।
गौरतलब है कि यह उपलब्धि ऐसे समय में आई है जब भारत सरकार ने 2025 तक देश को टीबी-मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा है — जो वैश्विक लक्ष्य से पाँच वर्ष पहले है। नदिया जैसे जिलों की प्रगति इस राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को ज़मीन पर साकार करने की दिशा में एक ठोस नज़ीर बन रही है।