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पटना के डॉक्टरों का कीर्तिमान: 545 मिमी 3डी प्रिंटेड इंप्लांट से घुटने के कैंसर की सर्जरी, इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज

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पटना के डॉक्टरों का कीर्तिमान: 545 मिमी 3डी प्रिंटेड इंप्लांट से घुटने के कैंसर की सर्जरी, इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज

सारांश

पटना के दो ऑर्थोपेडिक सर्जनों ने 60 वर्षीय मरीज के घुटने के कैंसर के इलाज में 545 मिमी लंबा कस्टमाइज्ड 3डी प्रिंटेड इंप्लांट प्रत्यारोपित कर विश्व-स्तरीय कीर्तिमान बनाया। कई असफल सर्जरियों के बाद मरीज दोबारा चलने लगा। इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज इस उपलब्धि को बिहार में आधुनिक चिकित्सा तकनीक के बढ़ते स्तर का संकेत माना जा रहा है।

मुख्य बातें

सौरभ चौधरी ने 60 वर्षीय मरीज पर दुर्लभ घुटने की सर्जरी सफलतापूर्वक की।
सर्जरी में 545 मिलीमीटर लंबा कस्टमाइज्ड 3डी प्रिंटेड इंप्लांट प्रत्यारोपित किया गया।
यह उपलब्धि इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज की गई है।
मरीज समस्तीपुर का निवासी है और कई पूर्व सर्जरियों के बावजूद चलने में असमर्थ था।
ऑपरेशन कंकड़बाग स्थित मेडिवर्सल अस्पताल , पटना में किया गया; मरीज अब सामान्य जीवन जी रहा है।

पटना के दो वरिष्ठ ऑर्थोपेडिक सर्जनों — डॉ. निशिकांत और डॉ. सौरभ चौधरी — ने घुटने के कैंसर से पीड़ित 60 वर्षीय मरीज पर 545 मिलीमीटर लंबे कस्टमाइज्ड 3डी प्रिंटेड इंप्लांट के साथ जटिल सर्जरी सफलतापूर्वक कर एक कीर्तिमान स्थापित किया है। यह उपलब्धि इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज की गई है, और चिकित्सकों के अनुसार इतनी लंबाई के कस्टमाइज्ड इंप्लांट के साथ ऐसी सर्जरी का दुनिया में अब तक कोई अन्य उदाहरण सामने नहीं आया है।

मरीज का मामला और पृष्ठभूमि

समस्तीपुर निवासी मरीज का घुटने की हड्डी कैंसर के कारण पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी थी। देश के अलग-अलग शहरों में कई बार उपचार और सर्जरी कराने के बावजूद उनकी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ था और वे चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ हो गए थे।

इसके बाद मामले की कमान पटना के कंकड़बाग स्थित मेडिवर्सल अस्पताल में डॉ. निशिकांत और डॉ. सौरभ चौधरी की टीम ने संभाली।

545 मिमी इंप्लांट: तकनीक कैसे काम आई

चिकित्सकों की टीम ने अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए मरीज के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया 545 मिलीमीटर लंबा 3डी प्रिंटेड इंप्लांट तैयार किया, जिसे बाद में सफलतापूर्वक शरीर में प्रत्यारोपित किया गया। ऑपरेशन के बाद मरीज ने दोबारा चलना शुरू कर दिया और चिकित्सकों के अनुसार अब वे सामान्य जीवन जी रहे हैं।

चिकित्सकों की प्रतिक्रिया

डॉ. निशिकांत ने कहा, ‘यह सफलता सिर्फ हमारी नहीं, बल्कि पूरे बिहार के चिकित्सा क्षेत्र की उपलब्धि है। अब जटिल बीमारियों के इलाज के लिए मरीजों को दूसरे राज्यों में जाने की जरूरत नहीं है।’

वहीं, डॉ. सौरभ चौधरी ने इस उपलब्धि को पूरी चिकित्सा टीम के सामूहिक प्रयास और आधुनिक तकनीक का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि चुनौतीपूर्ण मामलों में बेहतर योजना, विशेषज्ञ टीम और अत्याधुनिक तकनीक के समन्वय से मरीजों को बेहतर उपचार उपलब्ध कराया जा सकता है।

बिहार के लिए मायने

यह उपलब्धि ऐसे समय में आई है जब बिहार से जटिल बीमारियों के लिए मरीज लंबे समय से दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और वेल्लोर जैसे केंद्रों का रुख करते रहे हैं। कस्टमाइज्ड 3डी प्रिंटेड ऑर्थोपेडिक इंप्लांट अब तक मुख्यतः चुनिंदा मेट्रो अस्पतालों तक सीमित माने जाते रहे हैं, ऐसे में पटना में इस स्तर की सर्जरी को राज्य में आधुनिक चिकित्सा तकनीक और विशेषज्ञता के बढ़ते स्तर के रूप में देखा जा रहा है।

दोनों चिकित्सकों को मेडल और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया है। मेडिवर्सल अस्पताल प्रबंधन ने इस उपलब्धि के लिए दोनों चिकित्सकों और पूरी टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह न केवल संस्थान, बल्कि पूरे बिहार के लिए गर्व का विषय है। आने वाले समय में इस तरह की तकनीक-आधारित सर्जरी राज्य में और मरीजों तक पहुँच सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहाँ से जटिल इलाज के लिए मरीज़ अब भी दिल्ली, मुंबई और वेल्लोर का रुख करते हैं। कस्टमाइज्ड 3डी प्रिंटेड ऑर्थोपेडिक इंप्लांट अभी भारत में बहुत सीमित अस्पतालों में उपलब्ध हैं, और लागत व नियामकीय ढाँचा इसे मुख्यधारा बनने से रोकता रहा है। असली परीक्षा यह होगी कि क्या यह सफलता एक अलग-थलग उपलब्धि बनकर रहती है या राज्य में उच्च-स्तरीय टेक-आधारित सर्जरी के लिए संस्थागत क्षमता खड़ी करती है। जब तक बीमा कवरेज और प्रशिक्षित सर्जिकल टीमों की संख्या नहीं बढ़ती, ऐसी सुर्खियाँ आम मरीज़ की पहुँच से दूर ही रहेंगी।
RashtraPress
24 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पटना में यह दुर्लभ सर्जरी क्या है और यह किसने की?
यह घुटने के कैंसर से पीड़ित 60 वर्षीय मरीज पर की गई जटिल ऑर्थोपेडिक सर्जरी है, जिसमें 545 मिलीमीटर लंबा कस्टमाइज्ड 3डी प्रिंटेड इंप्लांट प्रत्यारोपित किया गया। यह सर्जरी पटना के कंकड़बाग स्थित मेडिवर्सल अस्पताल में डॉ. निशिकांत और डॉ. सौरभ चौधरी की टीम ने की।
इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में यह उपलब्धि क्यों दर्ज हुई?
चिकित्सकों के अनुसार, 545 मिमी लंबाई के कस्टमाइज्ड 3डी प्रिंटेड इंप्लांट के साथ इस तरह की सर्जरी का दुनिया में अब तक कोई अन्य दर्ज उदाहरण सामने नहीं आया है। इसी वजह से इसे इंटरनेशनल बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में स्थान दिया गया है।
मरीज की स्थिति सर्जरी के बाद कैसी है?
चिकित्सकों के अनुसार, सर्जरी के बाद मरीज की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है और उन्होंने दोबारा चलना शुरू कर दिया है। वे अब सामान्य जीवन जी रहे हैं, जबकि सर्जरी से पहले वे चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ थे।
3डी प्रिंटेड इंप्लांट क्या होता है और यह पारंपरिक इंप्लांट से कैसे अलग है?
3डी प्रिंटेड इंप्लांट मरीज की हड्डी के सटीक माप और आकार के अनुसार विशेष रूप से डिज़ाइन कर तैयार किया जाता है, जबकि पारंपरिक इंप्लांट पूर्व-निर्धारित मानक आकारों में आते हैं। कस्टमाइजेशन जटिल और अधिक क्षतिग्रस्त मामलों में बेहतर फिटिंग और परिणाम देने में सहायक माना जाता है।
इस उपलब्धि का बिहार के मरीजों के लिए क्या मतलब है?
चिकित्सकों का कहना है कि इससे बिहार में जटिल ऑर्थोपेडिक और कैंसर सर्जरी के लिए स्थानीय स्तर पर उन्नत विकल्प उपलब्ध होंगे। इससे मरीजों की दूसरे राज्यों पर निर्भरता कम होने की उम्मीद है, हालांकि व्यापक पहुँच के लिए लागत और बीमा कवरेज जैसे कारक निर्णायक बने रहेंगे।
राष्ट्र प्रेस
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