बांग्लादेश आईसीटी ने जफर इकबाल समेत 8 के खिलाफ मानवता-विरोधी आरोप स्वीकार किए, 5 के वारंट जारी
सारांश
मुख्य बातें
बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (आईसीटी) ने 21 सितंबर 2026 को प्रमुख शिक्षाविद मोहम्मद जफर इकबाल, ढाका विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एएसएम मकसूद कमाल और पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश एएचएम शम्सुद्दीन चौधरी माणिक सहित आठ लोगों के खिलाफ कथित मानवता-विरोधी अपराधों के आरोपों को औपचारिक रूप से स्वीकार किया। ये आरोप जुलाई 2024 के प्रदर्शनों से जुड़े बताए गए हैं। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार ट्रिब्यूनल ने पाँच आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी किए हैं।
मुख्य घटनाक्रम
न्यायमूर्ति एमडी गोलाम मुर्तजा मजूमदार की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने अभियोजन पक्ष द्वारा दाखिल आरोपों का रविवार को संज्ञान लिया। ट्रिब्यूनल ने जफर इकबाल, मकसूद कमाल, अवामी लीग की छात्र शाखा छात्र लीग के पूर्व अध्यक्ष सद्दाम हुसैन, तत्कालीन महासचिव शेख वली आसिफ एनान और तत्कालीन ढाका विश्वविद्यालय छात्र लीग अध्यक्ष मजहरुल कबीर शायन के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए।
शेष तीन आरोपी — न्यायाधीश माणिक, ढाका विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के शिक्षक एकेएम जमाल उद्दीन और छात्र लीग के पूर्व महासचिव तनबीर हसन शैकत — पहले से हिरासत में हैं। ट्रिब्यूनल ने अधिकारियों को इन तीनों को 22 अक्टूबर को उसके समक्ष पेश करने का निर्देश दिया है।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन की आपत्ति
फ्रांस स्थित संगठन जस्टिस मेकर्स बांग्लादेश (जेएमबीएफ) ने इस कार्यवाही की कड़ी निंदा की है। संगठन का कहना है कि जाँच 'राजनीतिक रूप से प्रेरित और पक्षपातपूर्ण तरीके' से की गई और इसमें स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त जाँच के न्यूनतम मानकों का पालन नहीं हुआ।
जेएमबीएफ ने कहा, 'मानवता के खिलाफ अपराध अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सबसे गंभीर अपराधों में शामिल हैं। ऐसे आरोपों को राजनीतिक विरोधियों, असहमति रखने वाली आवाज़ों, शिक्षाविदों, लेखकों, शिक्षकों या न्यायाधीशों के खिलाफ राजनीतिक प्रतिशोध के साधन में बदलना न्याय का गंभीर दुरुपयोग है।' संगठन ने यह भी जोड़ा कि किसी व्यक्ति की राजनीतिक विचारधारा, बयान या पेशेवर पहचान व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी का विकल्प नहीं हो सकती।
अकादमिक स्वतंत्रता पर गंभीर चिंता
जेएमबीएफ ने चेतावनी दी है कि विश्वविद्यालय के शिक्षकों और प्रोफेसरों की अकादमिक गतिविधियों, अभिव्यक्ति या पेशेवर भूमिकाओं को मानवता-विरोधी अपराधों के आरोपों में बदलना अकादमिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा है। संगठन के अनुसार, किसी शिक्षाविद के खिलाफ विशिष्ट और विश्वसनीय साक्ष्य के बिना उनकी राय, बयानों या संस्थागत पहचान को आधार बनाकर मुकदमा चलाना 'अकादमिक स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन' है।
गौरतलब है कि यह मामला ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश में जुलाई 2024 के व्यापक विरोध-प्रदर्शनों के बाद राजनीतिक बदलाव की प्रक्रिया जारी है और कई पुराने संस्थागत चेहरों पर कानूनी शिकंजा कसा जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की माँग
जेएमबीएफ ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त, संबंधित विशेष प्रतिवेदकों, यूरोपीय संघ और व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस मामले सहित चल रहे सभी मामलों पर करीबी निगरानी रखने और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप निष्पक्ष व पारदर्शी सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कूटनीतिक कदम उठाने का आह्वान किया है।
अब सभी की निगाहें 22 अक्टूबर की सुनवाई पर होंगी, जब तीन हिरासत में लिए गए आरोपियों को ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश किया जाएगा और यह स्पष्ट होगा कि मुकदमे की आगे की दिशा क्या होगी।