बुद्ध के शिष्यों के पवित्र अवशेष दिल्ली से मंगोलिया पहुंचाए, IAF के 'गजराज' ने निभाई ऐतिहासिक भूमिका
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय वायुसेना के भारी परिवहन विमान 'गजराज' (IL-76MD) ने शनिवार, 31 मई 2025 को एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक मिशन को अंजाम दिया — बौद्ध धर्म के दो प्रमुख अरहंतों, सारिपुत्र और मौद्गल्यायन, के पवित्र अस्थि अवशेष नई दिल्ली से मंगोलिया की राजधानी उलानबटार तक पहुंचाए गए। यह मिशन भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के तत्वावधान में आयोजित किया गया और इसे भारत-मंगोलिया के बीच सदियों पुराने बौद्ध संबंधों को पुनर्जीवित करने वाली एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल माना जा रहा है।
मिशन का विवरण
भारतीय वायुसेना के जनसंपर्क विभाग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस मिशन की जानकारी साझा की। असम के राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य की अगुवाई में एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने एयरपोर्ट पर पूरे विधि-विधान के साथ इन पवित्र अवशेषों को औपचारिक रूप से ग्रहण किया। तस्वीरों में यह सुपुर्दगी स्पष्ट रूप से दर्ज है।
ये अवशेष यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल सांची स्तूप से संबद्ध हैं, जिसे बौद्ध धर्म के सबसे पूजनीय केंद्रों में गिना जाता है। वायुसेना ने इस मिशन को महज एक लॉजिस्टिक ऑपरेशन नहीं, बल्कि आस्था, विरासत और अंतरराष्ट्रीय मित्रता का प्रतीक बताया।
उलानबटार में प्रदर्शनी
मंगोलिया पहुंचे इन पवित्र अवशेषों को उलानबटार में 9 जून 2025 तक प्रदर्शित किया जाएगा। यह प्रदर्शनी दोनों देशों की साझा बौद्ध विरासत को रेखांकित करने वाली एक आध्यात्मिक और राजनयिक पहल है।
गौरतलब है कि बौद्ध धर्म में अरहंत सारिपुत्र और अरहंत मौद्गल्यायन को महात्मा बुद्ध के सबसे प्रमुख शिष्यों में स्थान दिया जाता है। उनके अवशेषों को ज्ञान, करुणा और मोक्ष के प्रतीक के रूप में अत्यंत श्रद्धा से देखा जाता है।
भारत-मंगोलिया संबंधों का संदर्भ
भारत और मंगोलिया बौद्ध धर्म की साझा विरासत के माध्यम से ऐतिहासिक रूप से जुड़े हुए हैं। मंगोलिया में बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव है और वहाँ की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा तिब्बती बौद्ध परंपरा का अनुसरण करता है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत अपनी 'सभ्यतागत कूटनीति' को एशिया में और विस्तार दे रहा है।
गजराज की भूमिका
IL-76MD, जिसे भारतीय वायुसेना में 'गजराज' के नाम से जाना जाता है, भारी माल और सामरिक परिवहन के लिए वायुसेना का प्रमुख विमान है। इस मिशन में उसकी तैनाती इस बात का प्रतीक है कि भारत सरकार ने इस सांस्कृतिक कूटनीति को उच्च प्राथमिकता दी। यह पहली बार नहीं है जब भारत ने बौद्ध अवशेषों को राजनयिक उद्देश्यों के लिए विदेश भेजा है — इससे पहले श्रीलंका और थाईलैंड जैसे देशों में भी ऐसी पहल हो चुकी है।
आगे क्या
प्रदर्शनी के बाद अवशेष भारत वापस लाए जाएंगे। संस्कृति मंत्रालय की यह पहल भारत की 'बुद्ध-कूटनीति' की व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, जो एशिया के बौद्ध देशों के साथ सांस्कृतिक और राजनयिक संबंधों को नई ऊंचाई देने की दिशा में काम कर रही है।