13 जुलाई 2026
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सारिपुत्र-मौद्गल्यायन के पवित्र अवशेष मंगोलिया पहुंचेंगे, 1-10 जून तक उलानबटार में प्रदर्शनी

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सारिपुत्र-मौद्गल्यायन के पवित्र अवशेष मंगोलिया पहुंचेंगे, 1-10 जून तक उलानबटार में प्रदर्शनी

सारांश

भारत की बौद्ध कूटनीति एक नई ऊंचाई पर — अर्हत सारिपुत्र और मौद्गल्यायन के पवित्र अवशेष 1-10 जून 2026 को उलानबटार के गंडेन मठ में प्रदर्शित होंगे। यह 2022 की कपिलवस्तु अवशेष यात्रा के बाद भारत-मंगोलिया के 'स्पिरिचुअल सिबलिंग' संबंधों की अगली कड़ी है।

मुख्य बातें

अर्हत सारिपुत्र और अर्हत मौद्गल्यायन के पवित्र अवशेष 1 से 10 जून 2026 तक उलानबटार के गंडेन मठ में प्रदर्शित होंगे।
आयोजन में संस्कृति मंत्रालय , इंटरनेशनल बौद्ध कन्फेडरेशन (IBC) और नेशनल म्यूजियम, नई दिल्ली का सहयोग है।
PM मोदी ने 14 अक्टूबर 2025 को राष्ट्रपति खुरेलसुख उखना के भारत दौरे के दौरान यह घोषणा की थी।
जून 2022 में कपिलवस्तु के चार अवशेष करीब 29 साल बाद 11 दिनों के लिए मंगोलिया भेजे गए थे, जो इस श्रृंखला की पहली कड़ी थी।
सारिपुत्र को गहन ज्ञान और मौद्गल्यायन को आध्यात्मिक शक्तियों के लिए बौद्ध परंपरा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।

भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय, इंटरनेशनल बौद्ध कन्फेडरेशन (IBC) और नई दिल्ली के नेशनल म्यूजियम के संयुक्त प्रयास से भगवान बुद्ध के प्रमुख शिष्यों अर्हत सारिपुत्र और अर्हत मौद्गल्यायन के पवित्र अवशेषों की एक विशेष प्रदर्शनी मंगोलिया की राजधानी उलानबटार में आयोजित होगी। यह प्रदर्शनी 1 से 10 जून 2026 तक गंडेन मठ में आयोजित की जाएगी। यह आयोजन भारत और मंगोलिया के बीच सदियों पुराने बौद्ध धम्म के सूत्र में बंधे आध्यात्मिक रिश्तों की एक नई अभिव्यक्ति है।

प्रधानमंत्री की घोषणा और राजनयिक पृष्ठभूमि

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 अक्टूबर 2025 को मंगोलियाई राष्ट्रपति खुरेलसुख उखना के चार दिवसीय भारत दौरे के दौरान संयुक्त संबोधन में यह घोषणा की थी कि अर्हत सारिपुत्र और अर्हत मौद्गल्यायन के पवित्र अवशेष मंगोलिया भेजे जाएंगे। मोदी ने इसे दोनों देशों के बीच बौद्धिक और धार्मिक संबंधों को और गहरा करने वाला ऐतिहासिक कदम बताया था।

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा था, "हमारे संबंधों की असली गहराई हमारे पीपल-टू-पीपल-टाइज में दिखाई देती है। सदियों से दोनों देश बौद्ध धर्म के सूत्र में बंधे हैं। इस वजह से हमें 'स्पिरिचुअल सिबलिंग' कहा जाता है।"

2022 की ऐतिहासिक मिसाल

यह पहली बार नहीं है जब भारत ने अपनी बौद्ध धरोहर मंगोलिया के साथ साझा की हो। जून 2022 में भगवान बुद्ध के कपिलवस्तु से जुड़े चार पवित्र अवशेष करीब 29 साल के अंतराल के बाद 11 दिनों के लिए गंदन्तेगछेलिंग मठ में प्रदर्शित किए गए थे। उस समय इन अवशेषों को महात्मा बुद्ध के दंत अवशेष के साथ प्रदर्शित किया गया था और इन्हें भारतीय वायुसेना के सी-17 विमान से विशेष सुरक्षा के साथ भेजा गया था। एक उच्चस्तरीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल भी उनके साथ गया था।

सारिपुत्र और मौद्गल्यायन का बौद्ध महत्व

बौद्ध परंपरा में अर्हत सारिपुत्र और अर्हत मौद्गल्यायन को भगवान बुद्ध के सर्वाधिक प्रमुख शिष्यों में गिना जाता है। सारिपुत्र को विशेष रूप से गहन ज्ञान और विश्लेषणात्मक समझ के लिए जाना जाता है, जबकि मौद्गल्यायन को आध्यात्मिक शक्तियों और साधना में सिद्ध माना जाता है। बौद्ध धर्म के ज्ञान, शिक्षाओं और साधना के प्रसार में दोनों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।

भारत-मंगोलिया संबंधों पर असर

माना जाता है कि यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक और आध्यात्मिक रिश्तों का प्रतीक भी है। भारत की 'बौद्ध कूटनीति' एशिया में सॉफ्ट पावर विस्तार की एक सुचिंतित रणनीति के रूप में उभर रही है। यह आयोजन उसी दिशा में एक और ठोस कदम है। आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और राजनयिक सहयोग के और नए आयाम खुलने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और दोनों बार मंगोलिया ही गंतव्य रहा है। यह संयोग नहीं है: मंगोलिया एकमात्र तिब्बती बौद्ध परंपरा वाला स्वतंत्र देश है जो चीन के प्रत्यक्ष भू-राजनीतिक दबाव में है। ऐसे में भारत का यह सांस्कृतिक जुड़ाव धर्म से परे एक सामरिक संदेश भी देता है। मुख्यधारा की कवरेज इसे केवल आध्यात्मिक कदम बताती है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह सॉफ्ट पावर निवेश दीर्घकालिक संस्थागत सहयोग में बदलेगा — या यह भी उच्च-प्रोफ़ाइल प्रतीकवाद तक सीमित रहेगा।
RashtraPress
13 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अर्हत सारिपुत्र और मौद्गल्यायन के अवशेष मंगोलिया में कब और कहाँ प्रदर्शित होंगे?
ये पवित्र अवशेष 1 से 10 जून 2026 तक मंगोलिया की राजधानी उलानबटार के गंडेन मठ में प्रदर्शित किए जाएंगे। यह आयोजन संस्कृति मंत्रालय, IBC और नेशनल म्यूजियम के संयुक्त प्रयास से हो रहा है।
PM मोदी ने यह घोषणा कब और किस अवसर पर की थी?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 अक्टूबर 2025 को मंगोलियाई राष्ट्रपति खुरेलसुख उखना के चार दिवसीय भारत दौरे के दौरान संयुक्त संबोधन में यह घोषणा की थी। उन्होंने इसे दोनों देशों के 'स्पिरिचुअल सिबलिंग' संबंधों को और मजबूत करने वाला कदम बताया।
बौद्ध परंपरा में सारिपुत्र और मौद्गल्यायन का क्या महत्व है?
बौद्ध परंपरा में अर्हत सारिपुत्र को गहन ज्ञान और विश्लेषणात्मक समझ के लिए जाना जाता है, जबकि अर्हत मौद्गल्यायन को आध्यात्मिक शक्तियों और साधना में सिद्ध माना जाता है। दोनों को भगवान बुद्ध के सर्वाधिक प्रमुख शिष्यों में गिना जाता है।
क्या इससे पहले भी भारत ने बौद्ध अवशेष मंगोलिया भेजे हैं?
हाँ, जून 2022 में कपिलवस्तु से जुड़े चार पवित्र अवशेष करीब 29 साल के अंतराल के बाद 11 दिनों के लिए मंगोलिया के गंदन्तेगछेलिंग मठ में प्रदर्शित किए गए थे। उन्हें भारतीय वायुसेना के सी-17 विमान से विशेष सुरक्षा के साथ भेजा गया था।
इस आयोजन का भारत-मंगोलिया संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
यह आयोजन दोनों देशों के बीच केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनयिक संबंधों को भी नई ऊर्जा देगा। भारत की बौद्ध कूटनीति एशिया में सॉफ्ट पावर विस्तार की एक रणनीतिक पहल के रूप में देखी जा रही है।
राष्ट्र प्रेस
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