बिश्केक एससीओ शिखर सम्मेलन: घोषणापत्र सहित 20 से अधिक निर्णय पारित, मोदी ने आतंकवाद पर दोहरे मापदंड को नकारा
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 सितंबर 2026 को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के 26वें शिखर सम्मेलन में भाग लिया और आतंकवाद, क्षेत्रीय सुरक्षा, संपर्क एवं विकास पर भारत का स्पष्ट रुख प्रस्तुत किया। विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज ने शिखर सम्मेलन के बाद प्रेस ब्रीफिंग में बताया कि बिश्केक घोषणापत्र के साथ-साथ चार समझौता ज्ञापनों और बीस से अधिक फैसलों एवं बयानों को भी औपचारिक रूप से अपनाया गया।
शिखर सम्मेलन में क्या-क्या हुआ
यह बैठक 31 अगस्त से 1 सितंबर के बीच आयोजित हुई और इस वर्ष एससीओ की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर हुई। सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने संगठन की अब तक की प्रगति का मूल्यांकन किया और क्षेत्र में शांति, सुरक्षा, स्थिरता एवं समृद्धि को बढ़ावा देने में एससीओ की भूमिका को और सुदृढ़ करने पर विचार-विमर्श किया। जलवायु परिवर्तन, परमाणु सुरक्षा, ऊर्जा संरक्षण और नशीले पदार्थों की लत से मुकाबले जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी सहमति बनी।
भारत की प्रमुख पहलें
भारत ने कई महत्वपूर्ण पहलों का नेतृत्व किया जिन्हें बिश्केक घोषणापत्र में स्थान मिला। इनमें एससीओ चार्टर में अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल करना, सभ्यता संवाद मंच, युवा वैज्ञानिक मंच और युवा लेखक सम्मेलन जैसी पहलें शामिल हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने घोषणा की कि भारत इस वर्ष के अंत में पहले एससीओ सभ्यता संवाद मंच की मेजबानी करेगा, जिसका उद्देश्य सदस्य देशों के बीच सभ्यतागत आदान-प्रदान को बढ़ावा देना है।
मोदी के संबोधन के मुख्य बिंदु
प्रधानमंत्री ने किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सदिर जापारोव को गर्मजोशी भरे आतिथ्य के लिए धन्यवाद देते हुए अपना संबोधन शुरू किया। उन्होंने कहा कि एससीओ की 25वीं वर्षगांठ अगले 25 वर्षों की दिशा तय करने का उपयुक्त अवसर है। पिछले एससीओ शिखर सम्मेलन में भारत द्वारा रखे गए 'सुरक्षा, संपर्क और अवसर' के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अब इन तीनों क्षेत्रों में ठोस परिणाम हासिल करने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।
मोदी ने आतंकवाद को पूरी मानवता के लिए गंभीर खतरा बताते हुए इसके पूरे इकोसिस्टम को ध्वस्त करने का आह्वान किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में किसी भी प्रकार के दोहरे मापदंड स्वीकार्य नहीं हैं। संघर्ष समाधान पर भारत का रुख दोहराते हुए उन्होंने कहा कि युद्ध के मैदान में समस्याओं का हल नहीं निकलता — संवाद और कूटनीति ही एकमात्र व्यावहारिक मार्ग है।
अफगानिस्तान और क्षेत्रीय सुरक्षा
प्रधानमंत्री ने यूरेशिया क्षेत्र की सुरक्षा और अफगानिस्तान में शांति एवं स्थिरता के बीच गहरे संबंध को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान की स्थिरता पूरे क्षेत्र की शांति के लिए अनिवार्य है और इस संदर्भ में भारत की विकासात्मक एवं मानवीय सहायता का भी उल्लेख किया।
संपर्क पहलों पर बोलते हुए मोदी ने कहा कि भारत ऐसे प्रयासों का समर्थन करता है जो बाजारों को जोड़ें, व्यापार बढ़ाएं और विकास के नए अवसर उत्पन्न करें — लेकिन इन सभी प्रयासों में देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान अनिवार्य है।
आगे की राह
प्रधानमंत्री ने तकनीक, उद्यमिता, नवाचार, स्टार्टअप और लोगों के बीच संपर्क को एससीओ देशों के नागरिकों के लिए नए अवसरों का प्रमुख माध्यम बताया। उन्होंने किर्गिस्तान की अध्यक्षता में युवाओं की भागीदारी पर दिए गए जोर की सराहना की। गौरतलब है कि यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हुआ है जब एससीओ विस्तार के साथ-साथ सदस्य देशों के बीच भू-राजनीतिक मतभेद भी बढ़ रहे हैं। भारत का अगला कदम वर्ष के अंत में एससीओ सभ्यता संवाद मंच की मेजबानी होगी, जो नई दिल्ली की सांस्कृतिक कूटनीति का अहम पड़ाव साबित होगा।