क्या चीनी वैज्ञानिकों ने इबोला वायरस के अहम म्यूटेशन की पहचान की?

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क्या चीनी वैज्ञानिकों ने इबोला वायरस के अहम म्यूटेशन की पहचान की?

सारांश

क्या चीन के वैज्ञानिकों की नई खोज इबोला वायरस की भविष्य की घटनाओं को नियंत्रित कर सकती है? एक महत्वपूर्ण म्यूटेशन की पहचान ने वायरस की संक्रमण क्षमता को बढ़ा दिया है, और इस पर शोध ने कई नए सवाल खड़े किए हैं। जानिए इस शोध के पीछे की कहानी और इसका प्रभाव।

Key Takeaways

  • इबोला वायरस में एक महत्वपूर्ण म्यूटेशन की पहचान हुई है।
  • इस म्यूटेशन ने संक्रमण क्षमता को बढ़ा दिया है।
  • जीनोमिक निगरानी संक्रमण को नियंत्रित करने में मददगार है।

बीजिंग, 27 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। चीनी वैज्ञानिकों ने इबोला वायरस में एक महत्वपूर्ण म्यूटेशन की पहचान की है, जिसने एक बड़े प्रकोप के दौरान वायरस की संक्रमण क्षमता को बहुत बढ़ा दिया था। यह खोज महामारी निगरानी और दवा विकास के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

यह अध्ययन प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका सेल में प्रकाशित हुआ है। शोध का केंद्र 2018 से 2020 के बीच कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (डीआरसी) में फैला इबोला वायरस रोग (ईवीडी) का प्रकोप रहा, जो अब तक का दूसरा सबसे बड़ा इबोला प्रकोप था। इस दौरान 3,000 से अधिक लोग संक्रमित हुए और 2,000 से ज्यादा की मृत्यु हुई।

सन यात-सेन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कियान जुन ने कहा, “यह शोध बताता है कि किसी भी बड़े संक्रामक रोग प्रकोप के दौरान वायरस की रियल-टाइम जीनोमिक निगरानी और उसके विकास का विश्लेषण बहुत आवश्यक है। इससे न केवल संक्रमण के बढ़ते जोखिम की समय रहते चेतावनी मिल सकती है, बल्कि मौजूदा दवाओं और वैक्सीन की प्रभावशीलता का आकलन कर नियंत्रण रणनीतियों में पहले से बदलाव किया जा सकता है।”

शोध का मुख्य प्रश्न यह था कि क्या स्थानीय स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरियों के अलावा, वायरस के अपने विकास ने भी इबोला प्रकोप के लंबे समय तक चलने में भूमिका निभाई।

प्रोफेसर जुन ने बताया, “हम जानते हैं कि वायरस के कुछ विशेष म्यूटेशन बड़े प्रकोपों के दौरान संक्रमण को तेजी से फैलाने वाले अदृश्य कारक बन जाते हैं। इबोला पर एक दशक से अधिक समय तक काम करने के बाद, यह जानना आवश्यक था कि क्या इस वायरस में भी ऐसा कोई पैटर्न मौजूद है।”

2022 में शोध टीम ने इबोला वायरस के 480 पूर्ण जीनोम का विश्लेषण किया। इसमें पाया गया कि डीआरसी प्रकोप के शुरुआती चरण में वायरल ग्लाइकोप्रोटीन में एक विशेष म्यूटेशन सामने आया, जिसे जीपी-वी75ए नाम दिया गया। यह वैरिएंट तेजी से मूल स्ट्रेन की जगह लेने लगा और इसके फैलाव की दर इबोला मामलों में आई तेज बढ़ोतरी से मेल खाती थी, जिससे इसके अधिक संक्रामक होने के संकेत मिले।

इसके बाद किए गए प्रयोगों में यह पुष्टि हुई कि जीपी-वी75ए म्यूटेशन ने वायरस की विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं और चूहों में संक्रमण करने की क्षमता को काफी बढ़ा दिया था।

शोध में एक और चिंताजनक पहलू सामने आया। जीपी-वी75ए म्यूटेशन के कारण कुछ मौजूदा एंटीवायरल एंटीबॉडी और छोटे अणु (स्मॉल-मॉलिक्यूल) आधारित दवाओं की प्रभावशीलता कम हो गई, जिससे दवा प्रतिरोध का खतरा उत्पन्न हो सकता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि ये निष्कर्ष इस बात को रेखांकित करते हैं कि किसी भी प्रकोप के दौरान वायरस के जीनोम की लगातार निगरानी बहुत आवश्यक है, ताकि भविष्य में होने वाले विकासात्मक खतरों को समय रहते पहचाना जा सके और व्यापक प्रभाव वाली उपचार रणनीतियां विकसित की जा सकें।

Point of View

बल्कि भविष्य में आने वाले खतरों का समय रहते पता लगाने में भी मदद करता है।
NationPress
04/02/2026

Frequently Asked Questions

इबोला वायरस का म्यूटेशन क्या है?
इबोला वायरस का म्यूटेशन वह परिवर्तन है जो वायरस के जीनोम में होता है, जिससे उसकी संक्रमण क्षमता में बदलाव आता है।
चinese वैज्ञानिकों की खोज का महत्व क्या है?
इस खोज से वायरस की संक्रमण क्षमता की वृद्धि का पता चलता है, जो भविष्य में प्रकोपों को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।
जीपी-वी75ए म्यूटेशन का क्या प्रभाव है?
जीपी-वी75ए म्यूटेशन ने वायरस की संक्रमण करने की क्षमता को बढ़ा दिया है, जिससे दवा प्रतिरोध का खतरा बढ़ सकता है।
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