कांगो में इबोला संकट: 101 पुष्ट मामले, 900 से अधिक संदिग्ध; WHO ने जताई गंभीर चिंता
सारांश
मुख्य बातें
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (डीआरसी) में इबोला वायरस का प्रकोप गहराता जा रहा है — निगरानी तंत्र के विस्तार के साथ-साथ नए मामलों की संख्या भी तेज़ी से बढ़ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के महानिदेशक टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयेसस ने 25 मई 2026 को जानकारी दी कि अब तक 900 से अधिक संदिग्ध मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें से 101 मामले प्रयोगशाला-पुष्ट हैं। यह प्रकोप 16 मई 2026 को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी ऑफ इंटरनेशनल कंसर्न' (PHEIC) घोषित किया जा चुका है।
इतुरी प्रांत बना सबसे बड़ा केंद्र
डीआरसी के इतुरी प्रांत में यह बीमारी सबसे तेज़ी से फैल रही है, जहाँ करीब 50 लाख लोग निवास करते हैं। टेड्रोस के अनुसार, यह क्षेत्र लंबे समय से सशस्त्र संघर्ष की चपेट में है। वहाँ हर चार में से एक व्यक्ति को मानवीय सहायता की आवश्यकता है और हर पाँच में से एक व्यक्ति विस्थापित हो चुका है।
चल रही हिंसा के कारण स्वास्थ्यकर्मी और राहत कर्मी भी पलायन करने पर मजबूर हो रहे हैं, जिससे मरीजों की पहचान और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग दोनों बाधित हो रही हैं। टेड्रोस ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी पोस्ट में कहा कि समय पर बीमारी की पहचान न हो पाने से उपचार और भी कठिन हो जाता है।
भरोसे की कमी और डर से काम हो रहा मुश्किल
WHO महानिदेशक ने बताया कि प्रभावित इलाकों में भय और असुरक्षा के कारण स्थानीय समुदायों का स्वास्थ्य तंत्र पर भरोसा कमज़ोर पड़ रहा है। इबोला जैसी बीमारी से लड़ने में सामुदायिक विश्वास एक निर्णायक कारक होता है — इसके बिना संपर्क ट्रेसिंग और टीकाकरण दोनों प्रभावी नहीं हो सकते।
यह ऐसे समय में आया है जब डीआरसी पहले से ही खसरा, हैज़ा और कुपोषण जैसी कई स्वास्थ्य चुनौतियों से जूझ रहा है। WHO और मानवीय स्वास्थ्य भागीदार अभी भी इतुरी के दूरदराज़ और असुरक्षित क्षेत्रों में कार्यरत हैं।
WHO का जोखिम आकलन और वैश्विक स्थिति
22 मई 2026 को WHO ने इस प्रकोप का जोखिम स्तर राष्ट्रीय स्तर पर 'बहुत अधिक', क्षेत्रीय स्तर पर 'उच्च' और वैश्विक स्तर पर 'कम' निर्धारित किया। गौरतलब है कि यह प्रकोप डीआरसी और युगांडा दोनों देशों में फैला हुआ है, जिसके चलते इसे PHEIC का दर्जा दिया गया।
WHO के अनुसार, इबोला एक गंभीर और अक्सर जानलेवा वायरल बीमारी है जो मनुष्यों के साथ-साथ कुछ जानवरों — जैसे बंदरों — को भी प्रभावित करती है। यह वायरस आमतौर पर चमगादड़, साही और कुछ बंदर जैसे जंगली जानवरों से इंसानों में पहुँचता है और फिर संक्रमित व्यक्ति के रक्त, पसीने या शारीरिक तरल पदार्थों के संपर्क से इंसान-से-इंसान में फैलता है।
व्यापक स्वास्थ्य सेवाएँ देना ज़रूरी
टेड्रोस ने ज़ोर देकर कहा कि प्रभावित क्षेत्रों में सिर्फ इबोला-केंद्रित प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं है — वहाँ सम्पूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करना ज़रूरी है ताकि तत्काल ज़रूरतें पूरी हों और स्थानीय समुदायों का भरोसा भी बने। यह भरोसा ही इबोला नियंत्रण की नींव है।
अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य समुदाय की नज़र अब इस बात पर है कि क्या संघर्षग्रस्त इलाकों में स्वास्थ्य अभियान को प्रभावी ढंग से चलाया जा सकता है — एक चुनौती जो डीआरसी में पिछले कई इबोला प्रकोपों में भी सामने आई है।