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300 साल पुरानी गुरु ग्रंथ साहिब पांडुलिपि के दर्शन की व्यवस्था, स्कॉटलैंड में भारतीय वाणिज्य दूतावास की अहम बैठक

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300 साल पुरानी गुरु ग्रंथ साहिब पांडुलिपि के दर्शन की व्यवस्था, स्कॉटलैंड में भारतीय वाणिज्य दूतावास की अहम बैठक

सारांश

300 साल पुरानी श्री गुरु ग्रंथ साहिब की पांडुलिपि — जो कभी सिख साम्राज्य के महाराजा खड़क सिंह की थी और 1848 में ब्रिटिश कब्जे के दौरान एडिनबर्ग पहुँची — अब ग्लासगो के सेंट्रल गुरुद्वारे में श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए उपलब्ध कराने की तैयारी है। भारतीय वाणिज्य दूतावास, विश्वविद्यालय और सिख समुदाय मिलकर इस साझा विरासत को जीवंत कर रहे हैं।

मुख्य बातें

भारतीय वाणिज्य दूतावास, स्कॉटलैंड ने 30 जून 2026 को यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग और सिख संजोग के साथ समन्वय बैठक की।
बैठक का उद्देश्य सेंट्रल गुरुद्वारा, ग्लासगो में 300 साल पुरानी गुरु ग्रंथ साहिब पांडुलिपि के दर्शन की व्यवस्था करना था।
यह पांडुलिपि 2020 में यूनिवर्सिटी के अभिलेखागार में मिली थी और मूलतः महाराजा खड़क सिंह की थी।
1848 में दुल्लेवाला किले पर कब्जे के दौरान इसे ले जाया गया; बाद में सर जॉन स्पेंसर लोगिन ने विश्वविद्यालय को दान किया।
पहली सार्वजनिक प्रस्तुति नवंबर 2025 में गुरु नानक गुरुद्वारा, एडिनबर्ग में हुई थी।
यह विश्वविद्यालय में संरक्षित तीन सिख धर्मग्रंथों में से एक है।

स्कॉटलैंड स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास की एक टीम ने मंगलवार, 30 जून 2026 को यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के अधिकारियों और एडिनबर्गग्लासगो के गुरुद्वारा प्रतिनिधियों के साथ एक समन्वय बैठक की। इस बैठक का केंद्रीय उद्देश्य 300 साल पुराने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी महाराज के हस्तलिखित स्वरूप के दर्शन की व्यवस्था को सुलभ बनाना था।

बैठक में कौन शामिल हुए

इस समन्वय बैठक में सिख संजोग की प्रतिनिधि तृष्णा सिंह और यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। वाणिज्य दूतावास ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी पोस्ट में बताया कि बैठक का लक्ष्य सेंट्रल गुरुद्वारा, ग्लासगो में इस पवित्र पांडुलिपि के दर्शन की व्यवस्था करना था। दूतावास ने कहा कि यह आस्था, विरासत और समुदाय को जोड़ने वाला एक यादगार कदम है।

पांडुलिपि का इतिहास और महत्व

यह पवित्र हस्तलिखित स्वरूप 2020 में यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के अभिलेखागार में खोजा गया था। वाणिज्य दूतावास के अनुसार, यह पांडुलिपि मूल रूप से पंजाब के महाराजा खड़क सिंह — सिख साम्राज्य के दूसरे महाराजा — की थी। 1848 में दुल्लेवाला किले पर कब्जे के दौरान इसे वहाँ से ले जाया गया था। इसके बाद सर जॉन स्पेंसर लोगिन ने इन धर्मग्रंथों को यूनिवर्सिटी को दान कर दिया — वही शख्स जो कोहिनूर हीरे को महारानी विक्टोरिया के पास लेकर गए थे।

गौरतलब है कि ये धर्मग्रंथ 175 वर्षों से अधिक समय से यूनिवर्सिटी में संरक्षित हैं, परंतु इनके इतिहास और महत्व को विस्तार से समझने की कोशिशें 2020 में ही आरंभ हुईं। खोज के बाद से इनकी गहन मरम्मत और संरक्षण का कार्य किया गया है।

पहली सार्वजनिक प्रस्तुति

इस हस्तलिखित स्वरूप को पहली बार नवंबर 2025 में गुरु नानक गुरुद्वारा, एडिनबर्ग में आम श्रद्धालुओं और समुदाय के लोगों के दर्शन के लिए प्रस्तुत किया गया था। वाणिज्य दूतावास ने बताया कि इस ऐतिहासिक अवसर पर वाणिज्य दूत ने स्वयं समुदाय के साथ मिलकर इस पहली सार्वजनिक प्रस्तुति में भाग लिया।

यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग की कॉर्पोरेट कम्युनिकेशंस मैनेजर जेराल्डिन डिक ने 25 नवंबर 2025 को प्रकाशित एक लेख में इस पांडुलिपि के ऐतिहासिक सफर का विस्तृत विवरण दिया। विश्वविद्यालय के अनुसार, यह श्री गुरु ग्रंथ साहिब वहाँ सुरक्षित रखे गए तीन सिख धर्मग्रंथों में से एक है।

साझा विरासत की दिशा में कदम

वाणिज्य दूतावास ने इस बैठक को एडिनबर्ग गुरुद्वारा, सिख संजोग और यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के संयुक्त प्रयासों का परिणाम बताया। दूतावास ने स्पष्ट किया कि वह स्कॉटलैंड में सिख समुदाय को सांस्कृतिक, विरासत और सामुदायिक सेवाओं के माध्यम से निरंतर सहयोग देता रहेगा। यह पहल भारत और स्कॉटलैंड के बीच साझा ऐतिहासिक विरासत को संजोने और उसका सम्मान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो कोहिनूर हीरे को ले जाने वाले उसी अधिकारी के हाथों एडिनबर्ग पहुँची थी। इस संदर्भ में भारतीय वाणिज्य दूतावास की सक्रिय भूमिका सराहनीय है, लेकिन यह सवाल भी उठता है कि क्या 'दर्शन की व्यवस्था' पर्याप्त है या इन धर्मग्रंथों की दीर्घकालिक वापसी अथवा साझा संरक्षण पर भी संवाद होना चाहिए। 175 वर्षों से अधिक समय बाद इनके महत्व को समझने की कोशिश 2020 में शुरू हुई — यह देरी खुद ब खुद बहुत कुछ कहती है।
RashtraPress
1 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एडिनबर्ग में मिली गुरु ग्रंथ साहिब की पांडुलिपि कितनी पुरानी है और यह वहाँ कैसे पहुँची?
यह पांडुलिपि लगभग 300 साल पुरानी है और मूल रूप से सिख साम्राज्य के महाराजा खड़क सिंह की थी। 1848 में दुल्लेवाला किले पर ब्रिटिश कब्जे के दौरान इसे वहाँ से ले जाया गया और बाद में सर जॉन स्पेंसर लोगिन ने इसे यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग को दान कर दिया।
30 जून 2026 की बैठक का उद्देश्य क्या था?
इस बैठक का उद्देश्य सेंट्रल गुरुद्वारा, ग्लासगो में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी महाराज के 300 साल पुराने हस्तलिखित स्वरूप के दर्शन की व्यवस्था को सुलभ बनाना था। इसमें भारतीय वाणिज्य दूतावास, यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग और सिख संजोग के प्रतिनिधि शामिल हुए।
इस पांडुलिपि को पहली बार सार्वजनिक दर्शन के लिए कब रखा गया था?
इस हस्तलिखित स्वरूप को पहली बार नवंबर 2025 में गुरु नानक गुरुद्वारा, एडिनबर्ग में आम श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए प्रस्तुत किया गया था। उस अवसर पर भारतीय वाणिज्य दूत ने भी समुदाय के साथ इस कार्यक्रम में भाग लिया।
यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग में कितने सिख धर्मग्रंथ संरक्षित हैं?
यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग में तीन सिख धर्मग्रंथ सुरक्षित रखे गए हैं, जिनमें से यह 300 साल पुरानी पांडुलिपि एक है। इन सभी के इतिहास और महत्व को विस्तार से जानने की कोशिशें 2020 में शुरू हुईं।
इस पांडुलिपि की खोज और संरक्षण की प्रक्रिया क्या रही?
यह पांडुलिपि 2020 में यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के अभिलेखागार में खोजी गई थी, हालाँकि यह 175 वर्षों से अधिक समय से वहाँ मौजूद थी। खोज के बाद इसकी गहन मरम्मत और दीर्घकालिक संरक्षण का कार्य किया गया।
राष्ट्र प्रेस
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