30 जून 2026
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बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक असुरक्षित: गाइबांधा मंदिर विवाद पर मानवाधिकार संगठन की चेतावनी

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बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक असुरक्षित: गाइबांधा मंदिर विवाद पर मानवाधिकार संगठन की चेतावनी

सारांश

बांग्लादेश के गाइबांधा में हिंदू मंदिर परिसर में राम प्रतिमा निर्माण रोके जाने के बाद HRCBM ने गंभीर चेतावनी जारी की है। संगठन का कहना है कि यह विवाद धार्मिक आस्था को 'सार्वजनिक खतरे' में बदलने की खतरनाक प्रवृत्ति को दर्शाता है और प्रशासन की जवाबदेही की असली परीक्षा है।

मुख्य बातें

HRCBM ने 30 जून 2025 को बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर बढ़ते दबाव को लेकर चेतावनी जारी की।
बांग्लादेशी प्रशासन ने गाइबांधा जिले के पलाशबाड़ी स्थित श्री श्री राधा गोविंद एवं काली मंदिर में राम प्रतिमा निर्माण रोकने का आदेश दिया।
संगठन के अनुसार, निर्माण मंदिर की निजी भूमि पर हो रहा था और इसे हिंदू समुदाय का समर्थन प्राप्त था।
HRCBM ने प्रशासन पर 'कट्टरपंथी लामबंदी' को नियंत्रित करने में विफलता का आरोप लगाया।
संगठन ने मंदिर संस्थापक हरिदास चंद्र तरणी दास और श्रद्धालुओं की सुरक्षा तथा धमकियों की जांच की मांग की।
संगठन ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साथ दोहरे मापदंड अपनाए जाने का आरोप लगाया।

ह्युमन राइट्स कांग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज (HRCBM) ने 30 जून 2025 को बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर बढ़ते दबाव को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। संगठन के अनुसार, गाइबांधा जिले के पलाशबाड़ी स्थित श्री श्री राधा गोविंद एवं काली मंदिर में भगवान राम की प्रतिमा निर्माण को लेकर उपजा विवाद अब धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों की व्यापक लड़ाई का प्रतीक बन चुका है। संगठन का कहना है कि गाइबांधा से लेकर चट्टोग्राम तक की घटनाएं बांग्लादेश में धार्मिक स्वतंत्रता पर बढ़ते खतरे की ओर इशारा करती हैं।

मुख्य घटनाक्रम

स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बांग्लादेशी प्रशासन ने पलाशबाड़ी उपजिला स्थित श्री श्री राधा गोविंद एवं काली मंदिर परिसर में भगवान राम की प्रतिमा के निर्माण कार्य को रोकने का आदेश दिया। HRCBM ने मंदिर के संस्थापक हरिदास चंद्र तरणी दास से फील्ड बातचीत का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि यह निर्माण मंदिर की निजी भूमि पर हिंदू श्रद्धालुओं और समुदाय के सहयोग से किया जा रहा था — न कि किसी सरकारी ज़मीन पर।

संगठन ने कहा, 'जो मामला मंदिर परिसर के भीतर अल्पसंख्यक समुदाय की वैध धार्मिक अभिव्यक्ति तक सीमित रहना चाहिए था, वह जल्द ही सार्वजनिक विरोध, सोशल मीडिया पर आक्रोश, प्रतिमा हटाने की मांग और धमकियों में बदल गया।'

सांप्रदायिक तनाव और प्रशासन की भूमिका

HRCBM का आरोप है कि बांग्लादेशी प्रशासन मंदिर परियोजना के विरुद्ध 'कट्टरपंथी लामबंदी' को पूरी तरह नियंत्रित करने में सफल नहीं रहा। संगठन के अनुसार, पुलिस की मौजूदगी और प्रशासनिक हस्तक्षेप के बावजूद कट्टरपंथी समूह और स्वार्थी तत्व अल्पसंख्यक समुदाय पर दबाव बनाए हुए हैं।

संगठन ने कहा, 'कुछ लोगों ने एक हिंदू प्रतिमा को देश की संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा या सामाजिक व्यवस्था के लिए खतरे के रूप में प्रस्तुत किया। इस तरह की सोच अल्पसंख्यक समुदाय की धार्मिक आस्था को सार्वजनिक खतरे में बदल देती है।' यह ऐसे समय में आया है जब गाइबांधा में भगवान राम की सबसे ऊंची प्रतिमा के निर्माण का विरोध कर रहे कट्टरपंथी इस्लामी समूहों के प्रदर्शन के दौरान भगवान राम की एक तस्वीर के कथित अपमान को लेकर विरोध प्रदर्शन और तेज हो गए थे।

दोहरे मापदंड का आरोप

HRCBM ने बांग्लादेश के सार्वजनिक जीवन में एक 'गहरे और खतरनाक दोहरे मापदंड' की ओर ध्यान दिलाया। संगठन का कहना है कि अल्पसंख्यकों पर ईशनिंदा के आरोप लगने पर गिरफ्तारी, भीड़ की हिंसा, विस्थापन और यहां तक कि मौत जैसी घटनाएं होती हैं, जबकि हिंदू देवी-देवताओं के सार्वजनिक अपमान को अक्सर 'राजनीतिक रूप से संभालने योग्य अव्यवस्था' के रूप में देखा जाता है।

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब बांग्लादेश में हिंदू धार्मिक स्थलों को लेकर तनाव उभरा हो — पिछले कुछ वर्षों में दुर्गा पूजा पंडालों और मंदिरों पर हमलों की घटनाएं भी रिपोर्ट हो चुकी हैं।

संगठन की मांगें

HRCBM ने बांग्लादेश प्रशासन से निम्नलिखित कदम उठाने की मांग की है:

मंदिर परिसर की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित करना; मंदिर संस्थापक हरिदास चंद्र तरणी दास और श्रद्धालुओं को संरक्षण देना; धमकियों और भड़काऊ गतिविधियों की निष्पक्ष जांच; तथा अल्पसंख्यक समुदाय को विभाजित करने वाले दबावपूर्ण तरीकों को समाप्त करना।

आगे क्या होगा

संगठन ने स्पष्ट किया कि 'गाइबांधा का यह मामला अब इस बात की परीक्षा बन गया है कि क्या प्रशासन वास्तव में संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करेगा, या फिर अशांति को नियंत्रित करने के नाम पर धमकियों का सामना कर रहे अल्पसंख्यक समुदाय से ही पीछे हटने की अपेक्षा करेगा।' अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और भारतीय पर्यवेक्षकों की नज़र अब बांग्लादेश प्रशासन के अगले कदम पर टिकी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो हर बार किसी धार्मिक प्रतीक या त्योहार के इर्द-गिर्द भड़कती है। असली सवाल यह है कि जब निर्माण निजी भूमि पर और कानूनी दायरे में हो रहा था, तो प्रशासन ने कट्टरपंथी दबाव में आकर रोक क्यों लगाई — न कि उन लोगों पर कार्रवाई की जो धमकियां दे रहे थे। HRCBM की रिपोर्ट में उठाया गया 'दोहरे मापदंड' का सवाल महज़ भावनात्मक नहीं, बल्कि कानूनी और संवैधानिक है: अगर बांग्लादेश का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, तो उसका क्रियान्वयन बहुसंख्यक दबाव पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
RashtraPress
30 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गाइबांधा मंदिर विवाद क्या है?
बांग्लादेश के गाइबांधा जिले के पलाशबाड़ी उपजिला स्थित श्री श्री राधा गोविंद एवं काली मंदिर परिसर में भगवान राम की एक विशाल प्रतिमा का निर्माण किया जा रहा था, जिसे बांग्लादेशी प्रशासन ने रोक दिया। कट्टरपंथी समूहों के विरोध और धमकियों के बाद यह मामला सांप्रदायिक विवाद बन गया।
HRCBM कौन सा संगठन है और इसने क्या मांग की है?
ह्युमन राइट्स कांग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज (HRCBM) बांग्लादेश में अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए काम करने वाला एक प्रमुख मानवाधिकार संगठन है। इसने मंदिर परिसर की सुरक्षा, मंदिर संस्थापक हरिदास चंद्र तरणी दास की सुरक्षा, धमकियों की जांच और सांप्रदायिक दबाव समाप्त करने की मांग की है।
क्या राम प्रतिमा का निर्माण कानूनी था?
HRCBM के अनुसार, मंदिर संस्थापक हरिदास चंद्र तरणी दास ने संगठन को बताया कि राम प्रतिमा का निर्माण मंदिर की निजी भूमि पर हो रहा था, न कि किसी सरकारी ज़मीन पर। यह कार्य हिंदू श्रद्धालुओं और समुदाय के सहयोग से किया जा रहा था।
बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की स्थिति क्यों चिंताजनक मानी जा रही है?
HRCBM का कहना है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के विरुद्ध दोहरे मापदंड अपनाए जाते हैं — ईशनिंदा के आरोपों पर अल्पसंख्यकों को गिरफ्तारी, हिंसा और विस्थापन का सामना करना पड़ता है, जबकि हिंदू देवी-देवताओं के सार्वजनिक अपमान को गंभीरता से नहीं लिया जाता। गाइबांधा से चट्टोग्राम तक की घटनाएं इस पैटर्न को दर्शाती हैं।
इस मामले में आगे क्या होने की संभावना है?
HRCBM ने इस मामले को बांग्लादेश प्रशासन की संवैधानिक जवाबदेही की परीक्षा बताया है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और पड़ोसी देशों के पर्यवेक्षकों की नज़र अब प्रशासन के अगले कदम पर है — विशेष रूप से यह देखने के लिए कि क्या धमकी देने वालों पर कार्रवाई होती है या नहीं।
राष्ट्र प्रेस
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