भारत की परमाणु ऊर्जा योजना: कजाकिस्तान से $4 बिलियन का यूरेनियम सौदा, मध्य एशिया से रणनीतिक साझेदारी की नई राह
सारांश
मुख्य बातें
भारत का तेज़ी से विस्तार हो रहा नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम मध्य एशियाई देशों के साथ रणनीतिक सहयोग को एक नई दिशा दे रहा है। जियोपॉलिटिकल मॉनिटर में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, यूरेनियम आपूर्ति में दीर्घकालिक साझेदारी, ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीतिक विविधीकरण की दृष्टि से कजाकिस्तान और उज़्बेकिस्तान भारत के लिए अपरिहार्य साझेदार बनते जा रहे हैं। 2026 में कजाकिस्तान की राष्ट्रीय परमाणु कंपनी कजाटोमप्रोम और भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग के बीच $4 बिलियन से अधिक मूल्य का यूरेनियम आपूर्ति समझौता हस्ताक्षरित हुआ है, जो इस सहयोग को महज़ कमोडिटी व्यापार से एक सुदृढ़ रणनीतिक ढाँचे में रूपांतरित करता है।
भारत की परमाणु महत्वाकांक्षा और लक्ष्य
भारत ने 2047 तक 100 गीगावॉट नागरिक परमाणु क्षमता हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है, जबकि 2031-32 तक 22,480 मेगावॉट का अंतरिम लक्ष्य रखा गया है। 2025-26 के केंद्रीय बजट में इस दिशा में $2 बिलियन से अधिक की राशि आवंटित की गई है। इसके अतिरिक्त, ₹20,000 करोड़ के परमाणु ऊर्जा मिशन के तहत 2033 तक कम-से-कम पाँच स्वदेश-निर्मित स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) विकसित करने का लक्ष्य भी रखा गया है।
कजाकिस्तान: भारत का आदर्श यूरेनियम साझेदार
विश्लेषण के अनुसार, कजाकिस्तान के पास वैश्विक यूरेनियम भंडार का लगभग 14 प्रतिशत है और यह दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम उत्पादक देश बना हुआ है। 2025 में कजाकिस्तान का कुल यूरेनियम उत्पादन 25,800 टन तक पहुँचा, जिसमें कजाटोमप्रोम का हिस्सा 13,500 टन रहा — जो वैश्विक प्राथमिक यूरेनियम उत्पादन का लगभग 20 प्रतिशत है। नई दिल्ली के लिए कजाकिस्तानी यूरेनियम ईंधन आधार को सुदृढ़ करता है और एकल आपूर्तिकर्ता पर निर्भरता को कम करता है।
चीन की बढ़ती उपस्थिति और भारत की भूमिका
विश्लेषण में रेखांकित किया गया है कि चीनी कंपनियाँ कजाकिस्तान के बड़े यूरेनियम परियोजनाओं में पहले से ही अपनी स्थिति मज़बूत कर रही हैं और रूस के रोसाटॉम से परिसंपत्तियाँ भी खरीद रही हैं। ऐसे में भारत एक वैकल्पिक और स्थिर बाज़ार के रूप में उभरता है। अस्ताना के लिए यह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे मध्य एशिया में चीन के एकाधिकार को संतुलित करने का अवसर मिलता है।
कनेक्टिविटी: सबसे बड़ी बाधा
हालाँकि, विश्लेषण स्पष्ट करता है कि इस साझेदारी की सबसे बड़ी चुनौती भूगोल है। कैस्पियन सागर, ईरान या अफगानिस्तान के रास्ते भरोसेमंद पारगमन मार्गों के अभाव में यूरेनियम कूटनीति उन्हीं कनेक्टिविटी अवरोधों से जूझती रहेगी, जिन्होंने दशकों से इस क्षेत्र में भारत की उपस्थिति को सीमित रखा है। यह मुद्दा अब केवल कच्चे माल की खरीद-फरोख्त तक सीमित नहीं रहा — इसमें भरोसेमंद आपूर्ति मार्गों का निर्माण, आपूर्ति बीमा और दीर्घकालिक व्यवस्थाएँ भी शामिल हैं।
आगे की राह
विश्लेषण का केंद्रीय प्रश्न यह है कि क्या परमाणु ईंधन वह माध्यम बन सकता है जिसके ज़रिये भारत मध्य एशिया में अपनी दीर्घकालिक और ठोस उपस्थिति दर्ज करा सके। यह सहयोग यदि कनेक्टिविटी की बाधाओं को पार कर सके, तो भारत-मध्य एशिया संबंध एक नए युग में प्रवेश कर सकते हैं।