1 सितंबर 2026
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हिंद-प्रशांत दृष्टि में प्रशांत क्षेत्र अभिन्न: पलाऊ में बोले विदेश राज्य मंत्री मार्गेरिटा

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हिंद-प्रशांत दृष्टि में प्रशांत क्षेत्र अभिन्न: पलाऊ में बोले विदेश राज्य मंत्री मार्गेरिटा

सारांश

पलाऊ के कोरोर में 55वें पीआईएफ सत्र में विदेश राज्य मंत्री मार्गेरिटा ने भारत की हिंद-प्रशांत दृष्टि को स्पष्ट किया — प्रशांत क्षेत्र 'दूरस्थ' नहीं, साझे भविष्य का हिस्सा है। एफआईपीआईसी, आईपीओआई और ग्लोबल साउथ मंचों के ज़रिए भारत इस साझेदारी को ठोस रूप दे रहा है।

मुख्य बातें

विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा ने 1 सितंबर 2026 को पलाऊ के कोरोर में 55वें पीआईएफ के 'डायलॉग पार्टनर सेशन' को संबोधित किया।
भारत ने प्रशांत क्षेत्र को हिंद-प्रशांत दृष्टि का अभिन्न हिस्सा घोषित किया; प्रशांत द्वीप-राष्ट्रों को 'बड़े महासागरीय राष्ट्र' माना।
एक्ट ईस्ट पॉलिसी और एफआईपीआईसी के ज़रिए द्विपक्षीय संबंध गहरे हो रहे हैं; 2019 में घोषित इंडो-पैसिफिक ओशंस इनिशिएटिव इसका आधार।
2023 के पापुआ न्यू गिनी एफआईपीआईसी शिखर सम्मेलन में घोषित स्वास्थ्य, शिक्षा, डिजिटल और नवीकरणीय ऊर्जा पहलों को लागू करने की प्रतिबद्धता दोहराई।
जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते जलस्तर को प्रशांत देशों के लिए अस्तित्व से जुड़ी चिंता बताया; आईएसए , सीडीआरआई और जीबीए से जुड़ने का आमंत्रण दिया।
भारत के तीन वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट में पीआईएफ सदस्यों की सक्रिय भागीदारी रही है।

विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा ने 1 सितंबर 2026 को पलाऊ के कोरोर में स्पष्ट किया कि भारत प्रशांत क्षेत्र को किसी दूरस्थ भूगोल के रूप में नहीं, बल्कि अपनी व्यापक हिंद-प्रशांत दृष्टि के अभिन्न अंग के रूप में देखता है। वे 55वें प्रशांत द्वीप समूह फोरम (पीआईएफ) के नेताओं की बैठक के 'डायलॉग पार्टनर सेशन' को संबोधित कर रहे थे।

मुख्य घोषणाएँ और भारत की स्थिति

मार्गेरिटा ने कहा, "हम प्रशांत क्षेत्र को किसी दूरस्थ क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि हमारे साझा हिंद-प्रशांत का अभिन्न हिस्सा मानते हैं।" उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार भारत प्रशांत द्वीपीय देशों को 'बड़े महासागरीय राष्ट्रों' के रूप में देखता है — एक ऐसी स्वीकृति जो इन छोटे द्वीप-राष्ट्रों की भू-रणनीतिक और पारिस्थितिक महत्ता को रेखांकित करती है।

उन्होंने बताया कि भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी के अंतर्गत प्रशांत देशों के साथ द्विपक्षीय संबंध गहरे हुए हैं। इसमें फोरम फॉर इंडिया-पैसिफिक आइलैंड्स कोऑपरेशन (एफआईपीआईसी) और पैसिफिक आइलैंड्स फोरम के साथ भारत का बढ़ता जुड़ाव प्रमुख है।

हिंद-प्रशांत दृष्टि की बुनियाद

मार्गेरिटा ने स्पष्ट किया कि भारत की हिंद-प्रशांत दृष्टि स्वतंत्र, खुले, शांतिपूर्ण और समृद्ध क्षेत्र की अवधारणा पर टिकी है। इसके मूल में अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, नौवहन और हवाई उड़ान की स्वतंत्रता, वैध व्यापार और विवादों का शांतिपूर्ण समाधान शामिल हैं।

उन्होंने 2019 में घोषित इंडो-पैसिफिक ओशंस इनिशिएटिव (आईपीओआई) का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य खुले और स्वतंत्र समुद्री क्षेत्र को सुनिश्चित करना और महासागरों के स्वास्थ्य को बनाए रखना है। यह ऐसे समय में आया है जब हिंद-प्रशांत में प्रमुख शक्तियों के बीच प्रभाव-विस्तार की प्रतिस्पर्धा तेज़ हो रही है।

ठोस सहयोग और एफआईपीआईसी की उपलब्धियाँ

2023 में पापुआ न्यू गिनी में आयोजित तीसरे एफआईपीआईसी शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, डिजिटल क्षमता निर्माण, जल और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्रों में कई व्यापक पहलों की घोषणा की थी। मार्गेरिटा ने कहा कि नई दिल्ली इन पहलों को जमीन पर उतारने के लिए प्रतिबद्ध है और इसके लिए इंडिया-यूएन डेवलपमेंट पार्टनरशिप फंड के माध्यम से माँग-आधारित परियोजनाएँ भी चलाई जा रही हैं।

गौरतलब है कि यह तीसरी एफआईपीआईसी बैठक थी जिसमें भारत ने सक्रिय रूप से भाग लिया, जो इस क्षेत्र में भारत की बढ़ती राजनयिक उपस्थिति का संकेत है।

जलवायु संकट और ग्लोबल साउथ की आवाज़

मार्गेरिटा ने जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते जलस्तर को प्रशांत देशों के लिए "मौजूदा और अस्तित्व से जुड़ी चिंताएँ" बताया और कहा कि भारत इस आकलन को पूरी तरह साझा करता है। उन्होंने इंटरनेशनल सोलर अलायंस (आईएसए), कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (सीडीआरआई) और ग्लोबल बायोफ्यूल अलायंस (जीबीए) जैसी पहलों का उल्लेख करते हुए प्रशांत देशों को इनसे जुड़ने का आमंत्रण दिया।

उन्होंने यह भी बताया कि भारत के तीन 'वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट' में पीआईएफ के सदस्यों की सक्रिय भागीदारी रही है, जो वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में प्रशांत देशों की प्राथमिकताओं को स्थान दिलाने का प्रयास है। मानवीय सहायता और आपदा राहत (एचएडीआर) के क्षेत्र में भी भारत के प्रयास — शुरुआती चेतावनी प्रणाली, आपदा-रोधी बुनियादी ढाँचा और समय पर राहत — इस साझेदारी को व्यावहारिक आधार दे रहे हैं।

आगे की राह

55वें पीआईएफ की थीम 'बी.ई.एल.ए.यू — बिल्डिंग इकोनॉमीज: लाइफ. एक्शन. यूनिटी' को मार्गेरिटा ने भारत की हिंद-प्रशांत दृष्टि से सुसंगत बताया। भारत-प्रशांत साझेदारी अब केवल राजनयिक घोषणाओं तक सीमित नहीं रही — विकास सहयोग, जलवायु कार्रवाई और आपदा प्रबंधन में ठोस सहयोग इसे नई गहराई दे रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसमें चीन पिछले एक दशक में इन द्वीप-राष्ट्रों में अपना प्रभाव तेज़ी से बढ़ा रहा है। एफआईपीआईसी जैसी पहलें सराहनीय हैं, लेकिन आलोचक यह भी पूछते हैं कि 2023 के पापुआ न्यू गिनी शिखर सम्मेलन की घोषणाएँ ज़मीन पर कितनी उतरी हैं। प्रशांत देशों की असली प्राथमिकता — जलवायु वित्त और अस्तित्व की गारंटी — के लिए केवल मंच-साझेदारी पर्याप्त नहीं; ठोस वित्तीय प्रतिबद्धता और समयबद्ध क्रियान्वयन ही इस साझेदारी को विश्वसनीय बनाएगा।
RashtraPress
1 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

55वें प्रशांत द्वीप समूह फोरम में भारत ने क्या रुख अपनाया?
भारत ने स्पष्ट किया कि वह प्रशांत क्षेत्र को अपनी हिंद-प्रशांत दृष्टि का अभिन्न हिस्सा मानता है, न कि कोई दूरस्थ भूगोल। विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा ने 1 सितंबर 2026 को पलाऊ के कोरोर में यह बात कही।
एफआईपीआईसी क्या है और भारत इसमें कैसे शामिल है?
फोरम फॉर इंडिया-पैसिफिक आइलैंड्स कोऑपरेशन (एफआईपीआईसी) भारत और प्रशांत द्वीपीय देशों के बीच सहयोग का प्रमुख बहुपक्षीय मंच है। 2023 में पापुआ न्यू गिनी में तीसरे एफआईपीआईसी शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने स्वास्थ्य, शिक्षा, डिजिटल और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों में कई पहलों की घोषणा की थी।
इंडो-पैसिफिक ओशंस इनिशिएटिव क्या है?
इंडो-पैसिफिक ओशंस इनिशिएटिव (आईपीओआई) 2019 में भारत द्वारा घोषित एक बहुपक्षीय ढाँचा है, जिसका उद्देश्य खुले और स्वतंत्र समुद्री क्षेत्र को सुनिश्चित करना और महासागरों के स्वास्थ्य की रक्षा करना है। यह सहयोगात्मक प्रयासों के माध्यम से साझा हितों को आगे बढ़ाने पर केंद्रित है।
प्रशांत देशों के लिए जलवायु परिवर्तन पर भारत की क्या प्रतिबद्धता है?
भारत ने जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते जलस्तर को प्रशांत देशों के लिए 'अस्तित्व से जुड़ी चिंता' माना है। भारत इंटरनेशनल सोलर अलायंस (आईएसए), कोएलिशन फॉर डिजास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (सीडीआरआई) और ग्लोबल बायोफ्यूल अलायंस (जीबीए) के ज़रिए प्रशांत देशों के साथ सहयोग कर रहा है।
वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट में प्रशांत देशों की क्या भूमिका रही है?
भारत द्वारा आयोजित तीन वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट में पीआईएफ के सदस्य देशों ने सक्रिय रूप से भाग लिया है। इन सम्मेलनों ने प्रशांत देशों को वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में अपनी प्राथमिकताएँ और चिंताएँ रखने का महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया है।
राष्ट्र प्रेस
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