भारत ने यूएन नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति की रिपोर्ट खारिज की, विदेश मंत्रालय ने कहा 'राजनीति से प्रेरित और दुर्भावनापूर्ण'
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली — भारत ने बुधवार, 26 अगस्त को संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति (CERD) द्वारा देश के संदर्भ में की गई टिप्पणियों को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया। विदेश मंत्रालय (MEA) ने इन टिप्पणियों को 'राजनीति से प्रेरित' और 'बेहद दुर्भावनापूर्ण' करार देते हुए कड़ी निंदा की।
समीक्षा की पृष्ठभूमि
11-12 अगस्त को जिनेवा में आयोजित भारत की 11वीं आवधिक समीक्षा के बाद CERD ने अपना बयान जारी किया था। इस समीक्षा में 2023 में सौंपी गई भारत की 12वीं और 21वीं संयुक्त आवधिक रिपोर्टों पर चर्चा हुई। MEA ने स्पष्ट किया कि यह एक सामान्य संधि-निकाय समीक्षा थी और भारत ने इसमें 'रचनात्मक जुड़ाव की भावना' के साथ भाग लिया।
गौरतलब है कि जिनेवा में भारत के स्थायी मिशन के अनुसार, चर्चा में ICERD को लागू करने के लिए संस्थागत ढाँचे, वंचित समूहों की प्रगति और पूर्वाग्रह व असहिष्णुता से निपटने के उपायों सहित कई विषयों को शामिल किया गया।
भारतीय प्रतिनिधिमंडल का रुख
भारत की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के नेतृत्व में एक अंतर-मंत्रालयी प्रतिनिधिमंडल ने समीक्षा बैठक में हिस्सा लिया। MEA के अनुसार, इस प्रतिनिधिमंडल ने बैठक के दौरान ही 'व्यापक सामान्यीकरण, निराधार आरोपों और कन्वेंशन के अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने की प्रवृत्ति' को खारिज कर दिया था।
प्रतिनिधिमंडल ने भारत के बहुलवाद, विविधता, संवैधानिक एवं कानूनी ढाँचे, सकारात्मक कदमों, लोकतांत्रिक जवाबदेही, न्यायिक उपायों और निरंतर सामाजिक-आर्थिक विकास को रेखांकित किया।
समिति की चिंताएँ और भारत का जवाब
CERD — जो स्वतंत्र विशेषज्ञों का एक निकाय है और सदस्य देशों द्वारा 'सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव उन्मूलन कन्वेंशन' के क्रियान्वयन की निगरानी करता है — ने कानून प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा जातीय एवं जातीय-धार्मिक समूहों, अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति (विशेषकर दलित) और गैर-नागरिकों के खिलाफ 'बड़े पैमाने पर उल्लंघनों' की खबरों पर चिंता व्यक्त की थी।
MEA ने अपने आधिकारिक बयान में कहा, "भारत रिपोर्ट में की गई किसी भी राजनीति से प्रेरित और बेहद दुर्भावनापूर्ण टिप्पणी को पूरी तरह से खारिज करता है और इसकी कड़ी निंदा करता है।" मंत्रालय ने यह भी जोड़ा कि स्थापित प्रक्रिया के माध्यम से समिति की टिप्पणियों का औपचारिक उत्तर दिया जाएगा।
भारत की ऐतिहासिक प्रतिबद्धता
यह ऐसे समय में आया है जब भारत की ICERD के साथ दीर्घकालिक संलग्नता का उल्लेख किया जा रहा है। 1960 के दशक में ICERD की वार्ता और मसौदा तैयार करने में भारत सक्रिय रूप से शामिल था — वह दौर जब विकासशील देश उपनिवेशवाद, रंगभेद और नस्लीय भेदभाव का सामना कर रहे थे। MEA ने इस ऐतिहासिक संदर्भ का हवाला देते हुए कहा कि नस्लीय भेदभाव से निपटने के प्रति भारत की प्रतिबद्धता 'अटूट' है।
आगे क्या होगा
भारत ने संकेत दिया है कि वह CERD की टिप्पणियों का जवाब स्थापित संधि-प्रक्रिया के तहत देगा। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार ढाँचे के साथ जुड़ाव जारी रखने और अपने सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने की प्रतिबद्धता सरकार ने दोहराई है। यह विवाद भारत और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार तंत्रों के बीच बढ़ते तनाव की व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है।