26 अगस्त 2026
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भारत ने यूएन नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति की रिपोर्ट खारिज की, विदेश मंत्रालय ने कहा 'राजनीति से प्रेरित और दुर्भावनापूर्ण'

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भारत ने यूएन नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति की रिपोर्ट खारिज की, विदेश मंत्रालय ने कहा 'राजनीति से प्रेरित और दुर्भावनापूर्ण'

सारांश

भारत ने यूएन की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति (CERD) की टिप्पणियों को सिरे से खारिज कर दिया — इसे 'राजनीति से प्रेरित' और 'दुर्भावनापूर्ण' बताया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के नेतृत्व में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने जिनेवा में ही निराधार आरोपों को नकार दिया था।

मुख्य बातें

विदेश मंत्रालय (MEA) ने 26 अगस्त को CERD की टिप्पणियों को 'राजनीति से प्रेरित और बेहद दुर्भावनापूर्ण' बताकर कड़ी निंदा की।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के नेतृत्व में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने 11-12 अगस्त को जिनेवा में हुई समीक्षा बैठक में निराधार आरोपों को वहीं खारिज किया।
CERD ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (दलित सहित) और गैर-नागरिकों के खिलाफ 'बड़े पैमाने पर उल्लंघनों' की खबरों पर चिंता जताई थी।
भारत ने 2023 में सौंपी गई 12वीं और 21वीं संयुक्त आवधिक रिपोर्टों के आधार पर यह 11वीं आवधिक समीक्षा में भाग लिया।
MEA ने कहा कि भारत स्थापित संधि-प्रक्रिया के तहत समिति की टिप्पणियों का औपचारिक जवाब देगा।

नई दिल्ली — भारत ने बुधवार, 26 अगस्त को संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति (CERD) द्वारा देश के संदर्भ में की गई टिप्पणियों को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया। विदेश मंत्रालय (MEA) ने इन टिप्पणियों को 'राजनीति से प्रेरित' और 'बेहद दुर्भावनापूर्ण' करार देते हुए कड़ी निंदा की।

समीक्षा की पृष्ठभूमि

11-12 अगस्त को जिनेवा में आयोजित भारत की 11वीं आवधिक समीक्षा के बाद CERD ने अपना बयान जारी किया था। इस समीक्षा में 2023 में सौंपी गई भारत की 12वीं और 21वीं संयुक्त आवधिक रिपोर्टों पर चर्चा हुई। MEA ने स्पष्ट किया कि यह एक सामान्य संधि-निकाय समीक्षा थी और भारत ने इसमें 'रचनात्मक जुड़ाव की भावना' के साथ भाग लिया।

गौरतलब है कि जिनेवा में भारत के स्थायी मिशन के अनुसार, चर्चा में ICERD को लागू करने के लिए संस्थागत ढाँचे, वंचित समूहों की प्रगति और पूर्वाग्रह व असहिष्णुता से निपटने के उपायों सहित कई विषयों को शामिल किया गया।

भारतीय प्रतिनिधिमंडल का रुख

भारत की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के नेतृत्व में एक अंतर-मंत्रालयी प्रतिनिधिमंडल ने समीक्षा बैठक में हिस्सा लिया। MEA के अनुसार, इस प्रतिनिधिमंडल ने बैठक के दौरान ही 'व्यापक सामान्यीकरण, निराधार आरोपों और कन्वेंशन के अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने की प्रवृत्ति' को खारिज कर दिया था।

प्रतिनिधिमंडल ने भारत के बहुलवाद, विविधता, संवैधानिक एवं कानूनी ढाँचे, सकारात्मक कदमों, लोकतांत्रिक जवाबदेही, न्यायिक उपायों और निरंतर सामाजिक-आर्थिक विकास को रेखांकित किया।

समिति की चिंताएँ और भारत का जवाब

CERD — जो स्वतंत्र विशेषज्ञों का एक निकाय है और सदस्य देशों द्वारा 'सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव उन्मूलन कन्वेंशन' के क्रियान्वयन की निगरानी करता है — ने कानून प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा जातीय एवं जातीय-धार्मिक समूहों, अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति (विशेषकर दलित) और गैर-नागरिकों के खिलाफ 'बड़े पैमाने पर उल्लंघनों' की खबरों पर चिंता व्यक्त की थी।

MEA ने अपने आधिकारिक बयान में कहा, "भारत रिपोर्ट में की गई किसी भी राजनीति से प्रेरित और बेहद दुर्भावनापूर्ण टिप्पणी को पूरी तरह से खारिज करता है और इसकी कड़ी निंदा करता है।" मंत्रालय ने यह भी जोड़ा कि स्थापित प्रक्रिया के माध्यम से समिति की टिप्पणियों का औपचारिक उत्तर दिया जाएगा।

भारत की ऐतिहासिक प्रतिबद्धता

यह ऐसे समय में आया है जब भारत की ICERD के साथ दीर्घकालिक संलग्नता का उल्लेख किया जा रहा है। 1960 के दशक में ICERD की वार्ता और मसौदा तैयार करने में भारत सक्रिय रूप से शामिल था — वह दौर जब विकासशील देश उपनिवेशवाद, रंगभेद और नस्लीय भेदभाव का सामना कर रहे थे। MEA ने इस ऐतिहासिक संदर्भ का हवाला देते हुए कहा कि नस्लीय भेदभाव से निपटने के प्रति भारत की प्रतिबद्धता 'अटूट' है।

आगे क्या होगा

भारत ने संकेत दिया है कि वह CERD की टिप्पणियों का जवाब स्थापित संधि-प्रक्रिया के तहत देगा। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार ढाँचे के साथ जुड़ाव जारी रखने और अपने सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने की प्रतिबद्धता सरकार ने दोहराई है। यह विवाद भारत और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार तंत्रों के बीच बढ़ते तनाव की व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन निष्कर्षों को नकार दिया — यह द्विविधा अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही की सीमाओं को उजागर करती है। CERD की चिंताएँ — दलितों, आदिवासियों और गैर-नागरिकों से जुड़ी — वे मुद्दे हैं जिन पर घरेलू स्तर पर भी बहस जारी है; इन्हें केवल 'दुर्भावनापूर्ण' कहकर खारिज करना उस बहस को बंद नहीं करता। असली कसौटी यह होगी कि भारत स्थापित प्रक्रिया में जो 'औपचारिक जवाब' देने का वादा करता है, वह कितना पारदर्शी और तथ्य-आधारित होता है।
RashtraPress
26 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूएन की CERD समिति क्या है और इसने भारत पर क्या टिप्पणी की?
CERD (नस्लीय भेदभाव उन्मूलन समिति) स्वतंत्र विशेषज्ञों का एक संयुक्त राष्ट्र निकाय है जो सदस्य देशों द्वारा नस्लीय भेदभाव उन्मूलन कन्वेंशन के क्रियान्वयन की निगरानी करता है। समिति ने भारत में कानून प्रवर्तन द्वारा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, दलितों और गैर-नागरिकों के खिलाफ 'बड़े पैमाने पर उल्लंघनों' की खबरों पर चिंता जताई।
भारत ने CERD रिपोर्ट को क्यों खारिज किया?
विदेश मंत्रालय ने रिपोर्ट में की गई टिप्पणियों को 'राजनीति से प्रेरित और बेहद दुर्भावनापूर्ण' बताया। भारतीय प्रतिनिधिमंडल का कहना था कि समिति ने व्यापक सामान्यीकरण किया, निराधार आरोप लगाए और अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने की प्रवृत्ति दिखाई।
जिनेवा में भारत की 11वीं आवधिक समीक्षा कब और कैसे हुई?
यह समीक्षा 11-12 अगस्त को जिनेवा में आयोजित हुई, जिसमें 2023 में सौंपी गई भारत की 12वीं और 21वीं संयुक्त आवधिक रिपोर्टों पर चर्चा हुई। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के नेतृत्व में भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने रचनात्मक जुड़ाव की भावना के साथ भाग लिया।
आगे क्या होगा — भारत CERD की टिप्पणियों का जवाब कैसे देगा?
MEA ने कहा है कि भारत स्थापित संधि-प्रक्रिया के माध्यम से समिति की टिप्पणियों का औपचारिक उत्तर देगा। हालाँकि इसकी समयसीमा अभी घोषित नहीं की गई है।
ICERD के साथ भारत का ऐतिहासिक संबंध क्या रहा है?
भारत 1960 के दशक में ICERD की वार्ता और मसौदा तैयार करने में सक्रिय रूप से शामिल था, जब विकासशील देश उपनिवेशवाद और रंगभेद का सामना कर रहे थे। MEA ने इस ऐतिहासिक भूमिका का उल्लेख करते हुए नस्लीय भेदभाव से निपटने की भारत की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।
राष्ट्र प्रेस
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