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भारत का यूपीआई दक्षिण अफ्रीका के कैशलेस भविष्य का आदर्श मॉडल, रिजर्व बैंक गवर्नर ने सराहा

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भारत का यूपीआई दक्षिण अफ्रीका के कैशलेस भविष्य का आदर्श मॉडल, रिजर्व बैंक गवर्नर ने सराहा

सारांश

दक्षिण अफ्रीकी रिजर्व बैंक के गवर्नर ने भारत के यूपीआई को कैशलेस भविष्य का रास्ता बताया है — लेकिन 43% वयस्कों की बैंकिंग से दूरी और 12,000 मेगावाट की बिजली कटौती जैसी चुनौतियाँ इस सफर को आसान नहीं बनातीं।

मुख्य बातें

दक्षिण अफ्रीकी रिजर्व बैंक के गवर्नर लेसेत्जा कन्यागो ने यूपीआई को कैशलेस अर्थव्यवस्था का आदर्श मॉडल बताया।
यूपीआई दुनिया के लगभग आधे रियल-टाइम ट्रांजैक्शन को संभालता है और सिंगापुर, यूएई, मॉरिशस, फ्रांस तक पहुँच चुका है।
दक्षिण अफ्रीका का डिजिटल वॉलेट बाजार 2024 में 11.8 अरब डॉलर से बढ़कर 2029 तक 21.2 अरब डॉलर होने का अनुमान।
देश में 43% वयस्कों के पास बैंकिंग सुविधा नहीं; ग्रामीण इंटरनेट पहुँच 70% से कम।
2024 में 12,000 मेगावाट से अधिक अनियोजित बिजली कटौती से डिजिटल प्रणालियों की विश्वसनीयता पर सवाल।

दक्षिण अफ्रीकी रिजर्व बैंक के गवर्नर लेसेत्जा कन्यागो ने भारत की यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) प्रणाली को एक त्वरित, कम लागत वाले डिजिटल भुगतान का आदर्श उदाहरण करार दिया है। दक्षिण अफ्रीकी मीडिया हाउस आईओएल की एक रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण अफ्रीका अपनी नकद-निर्भर अर्थव्यवस्था को डिजिटल रूप देने की दिशा में यूपीआई को एक सफल वैश्विक उदाहरण के रूप में देख रहा है।

यूपीआई को क्यों बताया आदर्श मॉडल

गवर्नर कन्यागो ने कहा कि कई देश कैशलेस अर्थव्यवस्था की दिशा में दक्षिण अफ्रीका से काफी आगे निकल चुके हैं। उन्होंने यूपीआई की विशेषता बताते हुए कहा कि यह महंगे पॉइंट-ऑफ-सेल (पीओएस) टर्मिनल की आवश्यकता के बिना केवल मोबाइल नंबर या क्यूआर कोड के जरिए भुगतान की सुविधा देता है। यह प्रणाली छोटे व्यापारियों और आम नागरिकों दोनों के लिए सुलभ है।

दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने भी स्वीकार किया कि भारत और अन्य देशों ने अलग-अलग विभागीय प्रणालियाँ बनाने की बजाय एक साझा तकनीकी ढाँचे को अपनाया, जिसका उपयोग कई सरकारी विभाग विभिन्न सेवाओं के लिए कर सकते हैं।

यूपीआई की वैश्विक पहचान

आईओएल की रिपोर्ट में कहा गया कि यूपीआई दुनिया के लगभग आधे रियल-टाइम ट्रांजैक्शन को संभालता है और यह भारत के पेमेंट इकोसिस्टम की रीढ़ बन चुका है। एनपीसीआई इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड (एनआईपीएल) की साझेदारी के जरिए यूपीआई अब सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, मॉरिशस और फ्रांस तक पहुँच चुका है। नेपाल और भूटान ने पहले ही यूपीआई को अपना लिया है, जबकि एशिया, अफ्रीका और यूरोप के केंद्रीय बैंकों और फिनटेक कंपनियों के साथ बातचीत जारी है।

दक्षिण अफ्रीका की डिजिटल भुगतान योजना

दक्षिण अफ्रीकी सरकार एक निःशुल्क, रियल-टाइम राष्ट्रीय भुगतान प्रणाली विकसित कर रही है, जिसका उद्देश्य नकद लेनदेन को कम करना है। रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रस्ताव दक्षिण अफ्रीका को उन विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बराबर लाना चाहता है जो तेजी से कैशलेस लेनदेन की ओर बढ़ रही हैं। आँकड़ों के अनुसार, देश में प्रीपेड कार्ड और डिजिटल वॉलेट बाजार 2024 में 11.8 अरब डॉलर से बढ़कर 2029 तक 21.2 अरब डॉलर होने का अनुमान है।

सामने की चुनौतियाँ

हालाँकि, दक्षिण अफ्रीका के सामने कैशलेस अर्थव्यवस्था की राह में कई बाधाएँ हैं। देश के लगभग 43 प्रतिशत वयस्कों के पास बैंकिंग सुविधाएँ नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की पहुँच 70 प्रतिशत से कम है और प्रति व्यक्ति आय की तुलना में मोबाइल डेटा की लागत अधिक है।

इसके अतिरिक्त, 2024 में दक्षिण अफ्रीका में 12,000 मेगावाट से अधिक की अनियोजित बिजली कटौती दर्ज की गई, जिसने डिजिटल प्रणालियों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए। गवर्नर ने यह भी कहा कि नकदी पर अत्यधिक निर्भरता से महिलाओं को परिवार की वित्तीय जरूरतें, विशेषकर बच्चों के लिए मिलने वाली सहायता राशि, प्रबंधित करने में अधिक कठिनाई होती है।

आगे की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण अफ्रीका के लिए यूपीआई जैसी प्रणाली को अपनाना तभी सफल होगा जब बैंकिंग समावेश, डिजिटल बुनियादी ढाँचे और बिजली आपूर्ति की समस्याओं का समाधान किया जाए। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर डिजिटल भुगतान की स्वीकार्यता तेजी से बढ़ रही है और भारत का यूपीआई मॉडल एक वैश्विक बेंचमार्क के रूप में स्थापित हो रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या एक ऐसे देश में यह मॉडल काम करेगा जहाँ 43% वयस्क अभी भी बैंकिंग प्रणाली से बाहर हैं। भारत में यूपीआई की सफलता स्मार्टफोन की व्यापक पहुँच, सस्ते डेटा और जन-धन जैसी वित्तीय समावेश योजनाओं की नींव पर खड़ी है — जिनमें से कोई भी दक्षिण अफ्रीका में फिलहाल उस पैमाने पर मौजूद नहीं है। 12,000 मेगावाट की बिजली कटौती की समस्या तो डिजिटल भुगतान के लिए बुनियादी खतरा है। बिना इन संरचनात्मक खामियों को दूर किए, यूपीआई की नकल महज एक नीतिगत आकांक्षा बनकर रह सकती है।
RashtraPress
30 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दक्षिण अफ्रीका भारत के यूपीआई को क्यों अपनाना चाहता है?
दक्षिण अफ्रीकी रिजर्व बैंक के गवर्नर लेसेत्जा कन्यागो के अनुसार, यूपीआई एक त्वरित, कम लागत वाली भुगतान प्रणाली है जो महंगे पीओएस टर्मिनल की बजाय मोबाइल नंबर या क्यूआर कोड से काम करती है। दक्षिण अफ्रीका इसे अपनी नकद-निर्भर अर्थव्यवस्था को डिजिटल बनाने के लिए एक सफल मॉडल मानता है।
भारत का यूपीआई अब तक कितने देशों में पहुँच चुका है?
एनपीसीआई इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड की साझेदारी के जरिए यूपीआई सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, मॉरिशस और फ्रांस में उपलब्ध है। नेपाल और भूटान ने पहले ही यूपीआई को अपना लिया है, और एशिया, अफ्रीका व यूरोप के केंद्रीय बैंकों से बातचीत जारी है।
दक्षिण अफ्रीका में कैशलेस अर्थव्यवस्था की राह में क्या चुनौतियाँ हैं?
देश में लगभग 43 प्रतिशत वयस्कों के पास बैंकिंग सुविधाएँ नहीं हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की पहुँच 70 प्रतिशत से कम है। इसके अलावा, 2024 में 12,000 मेगावाट से अधिक की अनियोजित बिजली कटौती ने डिजिटल प्रणालियों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
दक्षिण अफ्रीका का डिजिटल भुगतान बाजार कितना बड़ा होने का अनुमान है?
रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण अफ्रीका में प्रीपेड कार्ड और डिजिटल वॉलेट बाजार 2024 में 11.8 अरब डॉलर से बढ़कर 2029 तक 21.2 अरब डॉलर होने का अनुमान है। यह वृद्धि देश में बढ़ती डिजिटल भुगतान की माँग को दर्शाती है।
यूपीआई भारत की अर्थव्यवस्था में कितना महत्वपूर्ण है?
यूपीआई भारत के पेमेंट इकोसिस्टम की रीढ़ बन चुका है और दुनिया के लगभग आधे रियल-टाइम ट्रांजैक्शन को संभालता है। इसने भारत को एक नकद-प्रधान अर्थव्यवस्था से दुनिया के सबसे बड़े रियल-टाइम डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम में बदल दिया है।
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