अमेरिकी संसद में भारत के यूपीआई मॉडल की तारीफ, पेमेंट सुधार बहस में बना मिसाल
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी संसद की हाउस फाइनेंशियल सर्विसेज कमेटी की फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स सब-कमेटी ने 25 जून 2025 को वाशिंगटन में पेमेंट सुधार पर एक अहम सुनवाई आयोजित की, जिसमें भारत के यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) को आधुनिक सार्वजनिक पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर का एक सफल उदाहरण बताया गया। अमेरिकी सांसदों ने इस बात पर विचार-विमर्श किया कि क्या अमेरिका को अपने नियामक ढाँचे को इस तरह आधुनिक बनाना चाहिए कि योग्य गैर-बैंक पेमेंट कंपनियों को फेडरल रिज़र्व के पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर तक सीधी पहुँच मिल सके।
सुनवाई में क्या हुआ
इस सुनवाई में फिनटेक कंपनियों ने अमेरिकी कांग्रेस से पेमेंट नेटवर्क तक पहुँच को नियंत्रित करने वाले नियमों में व्यापक बदलाव की माँग की। मुख्य सवाल यह था कि क्या गैर-बैंक पेमेंट कंपनियों को पारंपरिक बैंकिंग मध्यस्थों पर निर्भर रहने के बजाय फेडरल रिज़र्व के सिस्टम से सीधे जोड़ा जाए।
स्ट्राइप की दलील और यूपीआई की मिसाल
स्ट्राइप की वाइस चेयर एलीन ओमारा ने सांसदों के सामने तर्क रखा कि जिन देशों ने पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर तक खुली पहुँच दी है, वहाँ उल्लेखनीय नवाचार हुए हैं। उन्होंने ब्राज़ील और भारत दोनों का उदाहरण दिया। ओमारा ने कहा, "ब्रिटेन ने 2017 में ऐसा किया, यूरोपीय संघ ने 2024 में और नतीजे वास्तविक हैं। हमने भारत में यूपीआई के साथ भी ठीक यही चीज़ और भी बड़े पैमाने पर होते देखा है।"
ओमारा ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका में फेडनाउ इंस्टेंट पेमेंट सिस्टम तो मौजूद है, लेकिन उसके ऊपर एक उत्पाद परत (प्रोडक्ट लेयर) की कमी है — ठीक वैसी जो स्ट्राइप जैसी कंपनियाँ बना सकती हैं — और इसके लिए प्रत्यक्ष पहुँच ज़रूरी है ताकि इसे व्यापक स्तर पर अपनाया जा सके।
सांसदों की प्रतिक्रिया
कांग्रेस सदस्य रशीदा तलीब ने भारत की डिजिटल पेमेंट सफलता को रेखांकित किया। यूपीआई का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि इसे नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) संचालित करता है और यह प्रणाली हर महीने अरबों लेनदेन प्रसंस्कृत करती है। दोनों दलों के सदस्य इस बात पर सहमत थे कि डिजिटल वाणिज्य के विस्तार के साथ तेज़ और कुशल पेमेंट प्रणाली की ज़रूरत बढ़ रही है, हालाँकि फेडरल रिज़र्व के सिस्टम तक पहुँच की सीमा पर मतभेद बने रहे।
उपभोक्ता सुरक्षा पर चिंता
नेशनल कम्युनिटी रीइन्वेस्टमेंट कोएलिशन की तारा फ्लिन ने कानून-निर्माताओं से आग्रह किया कि बैंकिंग और पेमेंट सिस्टम तक पहुँच पाने वाली किसी भी गैर-बैंक संस्था को मज़बूत उपभोक्ता संरक्षण, सामुदायिक निवेश की ज़िम्मेदारियों और कड़े नियामक निगरानी के दायरे में लाया जाना चाहिए। यह चेतावनी इस बात की ओर इशारा करती है कि सुधार की राह में सुरक्षा उपायों को कमज़ोर किए बिना संतुलन बनाना होगा।
नियामक ढाँचे पर बड़ा सवाल
ओमारा ने यह भी कहा कि मौजूदा नियामक ढाँचा इस आधार पर बना है कि कोई संस्था 'बैंक है या नहीं', जबकि पेमेंट कंपनियाँ एक अलग व्यावसायिक मॉडल पर काम करती हैं। उनके शब्दों में, "हम न तो लोगों की जमा राशि स्वीकार करते हैं और न ही ऋण देते हैं। हमारी माँग केवल इतनी है कि जिस प्रकार का काम हम करते हैं — यानी पेमेंट प्रोसेसिंग — उसी के अनुरूप हमारा नियमन किया जाए।" यह बहस आने वाले महीनों में अमेरिकी पेमेंट नीति की दिशा तय कर सकती है।