अजित डोभाल ने BRICS में किया अमेरिका-ईरान MOU का स्वागत, ऊर्जा सुरक्षा और नेविगेशन पर जताई उम्मीद
सारांश
मुख्य बातें
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने 23 जून 2026 को 16वीं BRICS राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बैठक में स्पष्ट किया कि भारत, अमेरिका और ईरान के बीच हुए ज्ञापन समझौते (MOU) का खुले मन से स्वागत करता है और इसे क्षेत्रीय व वैश्विक स्थिरता की दिशा में एक सकारात्मक कदम मानता है। डोभाल ने कहा कि यह समझौता ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला और समुद्री नेविगेशन की स्वतंत्रता — तीनों मोर्चों पर भारत के हितों के अनुकूल है।
BRICS मंच पर डोभाल का बयान
बैठक में डोभाल ने कहा, 'भारत अमेरिका और ईरान के बीच हुए ज्ञापन समझौते का स्वागत करता है। हमें उम्मीद है कि यह काम करेगा। इससे ऊर्जा सुरक्षा में मदद मिलेगी। बेघरों के लिए राज्य चुनना एक बहुत अच्छा विकास है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस समझौते से सप्लाई चेन की रुकावटें दूर होंगी और उर्वरक तथा रसायन जैसे क्षेत्रों में मौजूद कमियाँ भी पूरी हो सकेंगी।
डोभाल ने आगाह करते हुए कहा, 'इस इलाके और उससे आगे के देशों को जो नेविगेशन की आज़ादी मिलेगी, उससे शायद हमारी आर्थिक खुशहाली भी बहुत बढ़ेगी। दोस्तों, हमें नए सुरक्षा खतरों और चुनौतियों के बारे में सतर्क रहना चाहिए।'
MOU की पृष्ठभूमि
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने 17 जून 2026 को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से इस MOU पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते में अंतिम शर्तों पर बातचीत के लिए युद्धविराम को 60 दिन के लिए बढ़ाने का प्रावधान है। यह MOU दोनों देशों के बीच लगभग चार महीने से जारी सैन्य तनाव को विराम देता है और तेहरान के परमाणु कार्यक्रम तथा क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दों पर बातचीत के लिए समय-सीमा निर्धारित करता है।
भारत की आधिकारिक स्थिति
गौरतलब है कि भारत ने MOU घोषित होने के तुरंत बाद ही इसका स्वागत किया था। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में रेखांकित किया था कि निरंतर कूटनीतिक संवाद ही पश्चिम एशिया में स्थायी शांति का एकमात्र रास्ता है। मंत्रालय ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य से निर्बाध नेविगेशन और वैश्विक व्यापार प्रवाह की बहाली को भारत की प्राथमिकता बताया।
भारत ने लगातार तनाव कम करने, वार्ता और कूटनीति की पैरवी की है — यह रुख BRICS मंच पर डोभाल के बयान में भी स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित हुआ।
भारत के लिए रणनीतिक महत्व
यह समझौता भारत के लिए कई कारणों से महत्वपूर्ण है। ईरान भारत के लिए एक प्रमुख ऊर्जा स्रोत रहा है और चाबहार बंदरगाह के ज़रिए मध्य एशिया तक पहुँच का रणनीतिक द्वार भी। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक तेल बाज़ार में अनिश्चितता और खाद्य-उर्वरक आपूर्ति पर दबाव बना हुआ है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रने वाले व्यापारिक मार्गों की बहाली भारतीय आयात लागत को सीधे प्रभावित करती है।
आने वाले 60 दिनों में होने वाली वार्ता के नतीजे यह तय करेंगे कि यह MOU एक स्थायी समझौते में तब्दील होता है या नहीं — और उसी पर भारत की ऊर्जा व व्यापार नीति की अगली दिशा भी निर्भर करेगी।