ईरानी राजदूत की चेल्डियन चर्च प्रमुख मार पॉलस तृतीय से मुलाकात, धार्मिक अल्पसंख्यकों के समर्थन और ईरान दौरे के निमंत्रण की पुष्टि
सारांश
मुख्य बातें
इराक में ईरान के राजदूत मोहम्मद काजम अल-सादिक ने हाल ही में चेल्डियन चर्च के नवनियुक्त प्रमुख मार पॉलस तृतीय नोना से मुलाकात की और क्षेत्रीय स्थिरता तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति तेहरान की प्रतिबद्धता को दोहराया। इस बैठक में राजदूत ने चर्च प्रमुख को ईरान आने और वहाँ के ईसाई समुदाय से मिलने का औपचारिक निमंत्रण भी दिया।
बैठक में कौन-कौन शामिल रहे
इस मुलाकात में ईरानी संसद में असीरियन और चेल्डियन ईसाइयों के प्रतिनिधि चार्ली अनुयेह तक्के भी उपस्थित थे। मार पॉलस तृतीय नोना को हाल ही में इराक और विश्वभर में चेल्डियन चर्च का नया प्रमुख नियुक्त किया गया है, जो इस पद पर उनकी नई जिम्मेदारी को और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है।
राजदूत का संदेश: एकता और बलिदान
राजदूत अल-सादिक ने चर्च प्रमुख को उनकी नई जिम्मेदारी के लिए बधाई दी और सामाजिक संबंधों को मज़बूत करने तथा धार्मिक शांति को बढ़ावा देने की शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने कहा कि इलाके की मौजूदा सुरक्षा, शांति और स्थिरता — तथा पवित्र धार्मिक स्थलों की सुरक्षा — मुस्लिम और ईसाई दोनों समुदायों के साझा बलिदानों का परिणाम है।
राजदूत ने रेजिस्टेंस फ्रंट की उपलब्धियों की सराहना करते हुए कहा कि आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में लेफ्टिनेंट जनरल कासिम सुलेमानी और अबू महदी अल-मुहांदिस की भूमिका निर्णायक रही।
ईरान की नीति: अल्पसंख्यकों की पहचान और एकता की रक्षा
राजदूत ने स्पष्ट किया कि ईरान का दीर्घकालिक सिद्धांत चेल्डियन ईसाई समुदाय की एकता और ऐतिहासिक पहचान की रक्षा करना है, और इस समुदाय को इराकी समाज का अभिन्न अंग माना जाता है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब मध्य-पूर्व में अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंताएँ बनी हुई हैं।
चर्च प्रमुख की प्रतिक्रिया
मार पॉलस तृतीय नोना ने ईरान की धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति समर्थन वाली नीति को सराहनीय बताया। उन्होंने पूजा स्थलों पर हमलों पर गहरा दुख व्यक्त किया और कहा कि क्षेत्र में आतंकवाद को समाप्त करने तथा अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा में जो सहयोग मिला, वह अत्यंत महत्वपूर्ण और सकारात्मक रहा है।
आगे क्या
राजदूत के औपचारिक निमंत्रण के बाद अब यह देखना होगा कि मार पॉलस तृतीय कब ईरान की यात्रा करते हैं और वहाँ के ईसाई समुदाय से उनकी मुलाकात किस रूप लेती है। यह यात्रा मध्य-पूर्व में अंतर-धार्मिक संवाद की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।