कुमामोटो भूकंप में मृतक संख्या 39 हुई, 6,500 से अधिक लोग अब भी राहत शिविरों में
सारांश
मुख्य बातें
दक्षिण-पश्चिमी जापान के कुमामोटो प्रांत में 28 जुलाई को आए 7.1 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप में मृतकों की संख्या बढ़कर 39 हो गई है। प्रांतीय सरकार ने 8 अगस्त को जानकारी दी कि 6,500 से अधिक विस्थापित लोग अभी भी राहत और निकासी केंद्रों में शरण लिए हुए हैं।
मृतकों का ब्यौरा और हताहतों की संख्या
अधिकारियों के अनुसार, 39 मृतकों में से 36 की मौत सीधे तौर पर भूकंप के झटकों के कारण हुई। एक अन्य व्यक्ति की मृत्यु कथित तौर पर लू लगने से हुई, जिसे आपदा से संबद्ध माना जा रहा है। वहीं दो अन्य लोगों की मौत के कारणों और उनके भूकंप से संभावित संबंध की जाँच अभी जारी है। रिपोर्टों के अनुसार, इस भूकंप में कुमामोटो प्रांत में कुल 205 लोग हताहत हुए हैं, जिनमें 23 गंभीर रूप से घायल हैं।
भूकंप की तीव्रता और तबाही का पैमाना
भूकंप से सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में जापान के भूकंपीय तीव्रता पैमाने पर अधिकतम स्तर 7 दर्ज किया गया — यह उस पैमाने का सर्वोच्च स्तर है जिसमें लोगों के लिए खड़े रहना या बिना रेंगे आगे बढ़ना असंभव हो जाता है और वे झटकों के कारण हवा में उछल भी सकते हैं। सार्वजनिक प्रसारक एनएचके के हेलीकॉप्टर से 28 जुलाई को लिए गए हवाई फुटेज में इमारतों को हुए भारी नुकसान का पता चला — एक इमारत की बाहरी दीवार के कई हिस्से ढह गए, जिससे अंदर का स्टील ढाँचा उजागर हो गया, और छत पर बड़े छेद दिखाई दिए।
प्रधानमंत्री का दौरा और सरकार की प्रतिक्रिया
जापान की प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची ने सोमवार को भूकंप प्रभावित इलाकों का दौरा किया और राहत एवं पुनर्वास कार्यों का जायजा लिया। आपदा प्रतिक्रिया की वर्दी पहने ताकाइची ने हिकावा शहर के एक निकासी केंद्र में पीड़ितों से मुलाकात की और कहा, "सरकार वह सब कुछ करेगी जो वह कर सकती है।" इसके बाद उन्होंने हेलीकॉप्टर से काशिमा शहर स्थित एयॉन शॉपिंग मॉल का हवाई निरीक्षण किया, जहाँ भूकंप के बाद हुए एक विस्फोट में सात लोगों की जान गई थी। यत्सुशिरो स्थित एक पेपर प्लांट का भी हवाई निरीक्षण किया गया, जहाँ नौ लोगों की मृत्यु हुई थी।
आगे की चुनौतियाँ
अधिकारियों के सामने अब 6,500 से अधिक विस्थापित लोगों को स्थायी आश्रय उपलब्ध कराने, क्षतिग्रस्त बुनियादी ढाँचे की बहाली और प्रभावित इलाकों में सामान्य जनजीवन लौटाने की तिहरी चुनौती है। यह ऐसे समय में आया है जब जापान पहले से ही मानसून-संबंधी आपदाओं से जूझ रहा है, जिससे राहत अभियान और भी जटिल हो गया है।