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नेपाल बाढ़ राहत: रसुवा सुरंग में फंसे लोगों को बचाना सबसे बड़ी चुनौती — राजन भट्टराई

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नेपाल बाढ़ राहत: रसुवा सुरंग में फंसे लोगों को बचाना सबसे बड़ी चुनौती — राजन भट्टराई

सारांश

नेपाल में बाढ़ और भूस्खलन के पाँच दिन बाद भी रसुवा की हाइड्रोपावर सुरंग में फंसे लोगों को निकालना सबसे बड़ी चुनौती है। हजारों लापता, हेलीकॉप्टरों की कमी, और ध्वस्त सड़कें राहत अभियान को जटिल बना रही हैं। नेपाल ने भारत और चीन से विशेषज्ञ सहायता माँगी है।

मुख्य बातें

रसुवा जिले की हाइड्रोपावर परियोजना की सुरंग में फंसे लोगों को बाहर निकालना बचाव दल की सर्वोच्च प्राथमिकता है।
आपदा के पाँचवें दिन भी हजारों लोग लापता हैं और उनका पता लगाना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
बागमती प्रशासन द्वारा सड़कें बनाए जाने के बाद करीब 2,000 लोग रसुवा से निकलने में सफल हुए।
नेपाल सरकार ने भारत और चीन से विशेषज्ञ तथा आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है।
पर्याप्त हेलीकॉप्टरों की कमी , शवों का निपटान, घायलों का उपचार और आश्रय व्यवस्था प्रमुख चुनौतियाँ हैं।
पूर्व नीति सलाहकार राजन भट्टराई के अनुसार नेपाल की पूर्व चेतावनी प्रणाली इस बाढ़ में बह गई और आपदा का पैमाना 'अकल्पनीय' था।

नेपाल में भीषण बाढ़ और भूस्खलन के बाद पाँचवें दिन भी राहत एवं बचाव अभियान जारी है, और विशेषज्ञों के अनुसार अभी तक स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। रसुवा जिले में एक हाइड्रोपावर परियोजना की सुरंग में फंसे लोगों को जीवित बाहर निकालना बचाव दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के विदेश नीति सलाहकार रहे राजन भट्टराई ने यह जानकारी दी।

सुरंग में फंसे लोग — सर्वोच्च प्राथमिकता

भट्टराई ने कहा, "त्रासदी के पाँच दिन हो गए हैं। अभी भी बड़ी संख्या में लोगों के सुरंग के भीतर फंसे होने की आशंका है। ऐसे में उन्हें जीवित बाहर निकालना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है।" उन्होंने स्पष्ट किया कि बचाव अभियान की पहली चुनौती उन लोगों को सुरक्षित निकालना है जिनके सुरंग के अंदर होने की आशंका है।

भट्टराई के अनुसार, नेपाल सरकार ने इस कठिन अभियान में सहायता के लिए पड़ोसी देशों भारत और चीन से विशेषज्ञ तथा अन्य आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है।

रसुवा जिले की स्थिति और 2,000 लोगों की निकासी

रसुवा जिले में हजारों लोग अभी भी प्रभावित हैं। भट्टराई ने बताया कि आपदा के बाद सड़क मार्ग पूरी तरह तबाह हो गए थे, जिससे वहाँ फंसे तीर्थयात्रियों सहित अनेक लोग निकल नहीं पा रहे थे। बागमती प्रशासन द्वारा कुछ सड़कों का पुनर्निर्माण कराए जाने के बाद करीब 2,000 लोग वहाँ से निकलने में सफल हुए।

उन्होंने यह भी बताया कि उच्च स्थानों पर गंभीर रूप से घायल लोग अभी भी फंसे हैं क्योंकि उन्हें निकालने के लिए पर्याप्त हेलीकॉप्टर उपलब्ध नहीं हैं।

बहुआयामी चुनौतियाँ — हेलीकॉप्टर की कमी से लेकर आश्रय तक

भट्टराई ने कई गंभीर चुनौतियों का उल्लेख किया — हेलीकॉप्टरों की अपर्याप्त संख्या, शवों का निपटान, घायलों का उपचार और विस्थापित लोगों को आश्रय देना। उन्होंने कहा, "बड़ी संख्या में लोग बुनियादी जरूरतों से वंचित हैं। वे पाँच दिनों से खुले आसमान के नीचे हैं और उनके पास जीवित रहने तथा वहाँ से आगे बढ़ने के लिए जरूरी चीजें नहीं हैं।"

उन्होंने यह भी कहा कि हजारों लोग अभी भी लापता हैं और यह पता लगाना एक बड़ी चुनौती है कि वे कहाँ हैं।

पूर्व चेतावनी प्रणाली की विफलता

नेपाल की आपदा प्रबंधन और पूर्व चेतावनी व्यवस्था पर भट्टराई ने स्वीकार किया कि देश के पास इतनी मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली नहीं है, और जो प्रणाली थी वह भी इस बार की बाढ़ में बह गई। उन्होंने कहा, "इस बार बाढ़ और नुकसान का पैमाना अकल्पनीय था। हमारे विशेषज्ञों ने भी पहले इस तरह की स्थिति का अनुमान नहीं लगाया था। चीनी और भारतीय विशेषज्ञ भी इस स्तर की आपदा की कल्पना नहीं कर सके थे।"

क्षेत्रीय सहयोग की जरूरत

भट्टराई ने जोर देकर कहा कि नेपाल, भारत और चीन के बीच आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने की आवश्यकता है, क्योंकि प्राकृतिक आपदाएँ राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रहतीं। यह ऐसे समय में आया है जब दक्षिण एशिया में मानसूनी आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ रही हैं। आने वाले दिनों में बचाव अभियान की गति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की प्रभावशीलता ही तय करेगी कि कितने और लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि नीतिगत उपेक्षा का प्रतीक है। यह ऐसे समय में और भी चिंताजनक है जब हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ बढ़ रही हैं। भारत और चीन से सहायता माँगना तत्काल आवश्यकता है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या इस त्रासदी के बाद तीनों देश मिलकर एक स्थायी बहुपक्षीय आपदा चेतावनी तंत्र बनाएँगे — या यह अपील भी पिछली आपदाओं की तरह राहत के बाद भुला दी जाएगी।
RashtraPress
30 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नेपाल बाढ़ में रसुवा सुरंग बचाव अभियान क्या है?
रसुवा जिले में एक हाइड्रोपावर परियोजना की सुरंग में बड़ी संख्या में लोगों के फंसे होने की आशंका है। नेपाल सरकार उन्हें जीवित बाहर निकालने को सर्वोच्च प्राथमिकता मान रही है और इसके लिए भारत व चीन से विशेषज्ञ सहायता भी माँगी गई है।
नेपाल बाढ़ राहत अभियान में सबसे बड़ी चुनौतियाँ कौन सी हैं?
सुरंग में फंसे लोगों को निकालना, पर्याप्त हेलीकॉप्टरों की कमी, ध्वस्त सड़कें, शवों का निपटान, घायलों का उपचार और विस्थापितों को आश्रय देना — ये सभी प्रमुख चुनौतियाँ हैं। हजारों लोग अभी भी लापता हैं।
नेपाल ने भारत और चीन से क्या सहायता माँगी है?
नेपाल सरकार ने भारत और चीन से सुरंग बचाव अभियान के लिए विशेषज्ञ और अन्य आवश्यक तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है। राजन भट्टराई ने यह भी कहा कि तीनों देशों के बीच आपदा प्रबंधन सहयोग को और मजबूत करने की जरूरत है।
रसुवा जिले से कितने लोग निकाले जा सके हैं?
बागमती प्रशासन द्वारा कुछ सड़कों का पुनर्निर्माण कराए जाने के बाद करीब 2,000 लोग रसुवा से निकलने में सफल हुए। इससे पहले आपदा के कारण सड़क मार्ग पूरी तरह बाधित थे।
नेपाल की पूर्व चेतावनी प्रणाली इस बाढ़ में क्यों विफल रही?
राजन भट्टराई के अनुसार नेपाल के पास पहले से ही पर्याप्त मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली नहीं थी, और जो थी वह भी इस बाढ़ में बह गई। उन्होंने कहा कि इस बार आपदा का पैमाना इतना अकल्पनीय था कि भारतीय और चीनी विशेषज्ञ भी इसका पूर्वानुमान नहीं लगा सके थे।
राष्ट्र प्रेस
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