बीआरआई समझौते के नौ साल: नेपाल में एक भी चीनी परियोजना धरातल पर नहीं, कर्ज-अनुदान विवाद बना रोड़ा
सारांश
मुख्य बातें
नेपाल और चीन के बीच 12 मई 2017 को हस्ताक्षरित बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) समझौता ज्ञापन को नौ वर्ष पूरे हो चुके हैं, फिर भी काठमांडू में इस महत्वाकांक्षी पहल के तहत एक भी बड़ी परियोजना ज़मीन पर नहीं उतरी है। वित्तपोषण शर्तों पर अस्पष्टता, भू-राजनीतिक दबाव और नेपाल की अपनी तैयारी की कमी — तीनों मिलकर इस ठहराव के लिए ज़िम्मेदार हैं।
नौ साल, शून्य परियोजनाएं
जून 2023 में तत्कालीन विदेश मंत्री एन. पी. सऊद ने नेपाल की संसद को स्पष्ट रूप से बताया था कि हिमालयी देश में एक भी बीआरआई परियोजना क्रियान्वित नहीं हुई है। 2026 में भी यह स्थिति नहीं बदली है। 2017 में नेपाली पक्ष ने 35 परियोजनाओं का प्रस्ताव रखा था, जिसे चीन के आग्रह पर घटाकर 9 कर दिया गया। दिसंबर 2024 में तत्कालीन प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली की चीन यात्रा के दौरान बीआरआई कार्यान्वयन योजना पर हस्ताक्षर हुए और परियोजनाओं की संख्या पुनः संशोधित होकर 10 हो गई, जिसमें सीमा-पार रेलवे परियोजना भी शामिल की गई।
पोखरा एयरपोर्ट और 'डेब्ट ट्रैप' विवाद
चीन ने पश्चिमी नेपाल में निर्मित पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को बीआरआई की बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया, किंतु नेपाल सरकार ने इसे बीआरआई परियोजना मानने से इनकार किया। नेपाल का तर्क है कि इस पर बातचीत 2013 में राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा बीआरआई की घोषणा से पहले ही शुरू हो चुकी थी। आलोचकों के अनुसार, उद्घाटन के तीन वर्ष बाद भी कोई नियमित अंतरराष्ट्रीय उड़ान न मिलना इस हवाई अड्डे को चीन की कथित 'डेब्ट ट्रैप' कूटनीति का प्रतीक बना देता है — ठीक वैसे जैसे श्रीलंका के हम्बनटोटा पोर्ट को 99 वर्ष की लीज़ पर चीनी कंपनी को सौंपना पड़ा था।
वित्तपोषण शर्तों पर गतिरोध
पूर्व विदेश मंत्री प्रकाश शरण महत — जिनके कार्यकाल में 2017 का बीआरआई एमओयू हस्ताक्षरित हुआ था — ने बताया कि परियोजनाएं न होने का मूल कारण कार्यान्वयन शर्तों पर भ्रम था। उन्होंने कहा, यह स्पष्ट होना ज़रूरी था कि बीआरआई परियोजनाओं के लिए चीन से अनुदान मिलेगा या कर्ज़, अगर कर्ज़ लिया गया तो ब्याज दर क्या होगी, और निर्माण में कितनी चीनी मानवशक्ति और सामग्री शामिल होगी।
महत ने यह भी कहा, हमारी कर्ज़ स्तर पहले से ही उच्च है, इसलिए हम किसी भी देश से उच्च-ब्याज वाले कर्ज़ नहीं ले सकते।
दिसंबर 2024 की वार्ता में नेपाल ने ग्रांट सहायता वित्तपोषण
का प्रस्ताव रखा। चीनी पक्ष ने ग्रांट
शब्द हटाकर सहायता वित्तपोषण
सुझाया — जो वाणिज्यिक कर्ज़ का संकेत भी दे सकता था। अंततः दोनों पक्ष सहायता अनुदान वित्तपोषण
पर सहमत हुए, जिसमें अनुदान, सॉफ्ट लोन और तकनीकी सहायता — तीनों की गुंजाइश रखी गई।
नेपाल की अपनी तैयारी पर सवाल
पूर्व नेपाली राजदूत बिष्णु पुकार श्रेष्ठ ने स्पष्ट किया कि समस्या केवल चीन की ओर से नहीं, बल्कि मुख्यतः नेपाल की अपनी तैयारी की कमी से है। उन्होंने कहा, सरकार को उन परियोजनाओं की सूची प्रस्तुत करनी चाहिए जिनकी व्यवहार्यता अध्ययन पूरी हो चुका हो, साथ ही यह विवरण भी देना चाहिए कि नेपाल चीन से कितनी वित्तीय मदद चाहता है और स्वयं क्या योगदान देगा।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि द्विपक्षीय समझौतों के ज़रिए बीआरआई के व्यापक ढांचे के बिना भी व्यक्तिगत परियोजनाएं विकसित की जा सकती हैं।
फिलहाल केरुंग-काठमांडू रेलवे परियोजना और कुछ औद्योगिक परियोजनाओं पर प्रारंभिक काम जारी है। बीआरआई के तहत प्रस्तावित फुकोट करनाली जलविद्युत परियोजना (480 मेगावाट) की कमान भारत की एनएचपीसी लिमिटेड और विद्युत उत्पादन कंपनी लिमिटेड (वीयूसीएल) ने संयुक्त रूप से संभाली है। वहीं, 2020 में नेपाल की हाइड्रोइलेक्ट्रिसिटी इन्वेस्टमेंट एंड डेवलपमेंट कंपनी और पावरचाइना के बीच तमोर स्टोरेज जलविद्युत परियोजना (756 मेगावाट) के विस्तृत अध्ययन के लिए ज्ञापन हस्ताक्षरित हुआ था, लेकिन अधिकारियों के अनुसार इसमें भी दोनों पक्षों के बीच विकास को लेकर मतभेद बने हुए हैं।
भू-राजनीतिक दबाव: भारत और अमेरिका का प्रभाव
विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल की बीआरआई रणनीति उसके दो प्रमुख साझेदारों — भारत और अमेरिका — की धारणाओं से गहरे रूप से प्रभावित है। भारत बीआरआई को दक्षिण एशिया में अपनी प्रभावशीलता को चुनौती देने वाली रणनीतिक पहल के रूप में देखता है और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) से गुज़रने के कारण शुरू से इसका विरोध करता रहा है। अमेरिकी अधिकारियों ने नेपाल को बार-बार चेताया है कि चीन की ऋण-आधारित परियोजनाएं पर्याप्त पारदर्शिता नहीं देतीं और देश को 'डेब्ट ट्रैप' में फंसा सकती हैं।
प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की नई सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 की नीतियों में चीन के साथ सीमा-पार रेलवे विकसित करने की प्रतिबद्धता दोहराई है — यह संकेत है कि बीआरआई की कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है, बल्कि अगला अध्याय लिखा जाना बाकी है।