पाकिस्तान में मिलिटेंट हिंसा 27% बढ़ी, सेना के 14 ऑपरेशन भी नाकाम — PICSS रिपोर्ट
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट एंड सिक्योरिटी स्टडीज (PICSS) की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, मई 2026 में पाकिस्तान में हथियारबंद उग्रवादी हिंसा में 27 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह आँकड़ा ऐसे समय में सामने आया है जब फील्ड मार्शल असीम मुनीर के नेतृत्व में पाकिस्तानी सेना ने देश की घरेलू और विदेश नीति पर खुला दबदबा बना रखा है। सुरक्षा एजेंसियों की लगातार विफलता पाकिस्तानी सेना की परिचालन क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
बिगड़ती सुरक्षा स्थिति और सेना की भूमिका
पाकिस्तान में हथियारबंद हमलों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। विश्लेषकों के अनुसार, सुरक्षा की यह बदहाली उस दौर में और गहरी हुई है जब नागरिक नेतृत्व की भूमिका सेना के फैसलों को मंजूरी देने या उन्हें वैधता देने तक सिमट गई है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के कार्यकाल में सरकार सेना की भूमिका को उजागर करने की बजाय उसे वैध ठहराने पर केंद्रित दिखती है।
रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि पाकिस्तान में 'गवर्नेंस का एक हाइब्रिड मॉडल' लागू है। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि यह 'आदर्श लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं है', लेकिन यह 'चमत्कार कर रहा है' — हालाँकि इन दावों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया है।
अफगानिस्तान पर दोषारोपण की रणनीति
आसिफ लगातार हथियारबंद हमलों को अफगानिस्तान से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं और तालिबान सरकार पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) की गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगा रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यह रणनीति बलूचिस्तान में बलूच राष्ट्रवादियों और खैबर पख्तूनख्वा (KP) में धार्मिक कट्टरपंथियों से निपटने में सेना की विफलता से ध्यान भटकाने का प्रयास है। क्वेटा में दिए एक बयान में प्रधानमंत्री शरीफ ने चेतावनी दी कि अफगान तालिबान के 'आतंकवादी प्रॉक्सी' के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रहेगी।
दूसरी ओर, इस्लामिक अमीरात (तालिबान सरकार) के उप-प्रवक्ता हमदुल्ला फितरत ने कहा कि TTP का मामला पाकिस्तान का अंदरूनी मामला है और अमीरात यह सुनिश्चित करने को तैयार है कि अफगान ज़मीन का इस्तेमाल किसी देश के खिलाफ न हो — लेकिन साथ ही यह भी कहा कि पाकिस्तान की कुछ माँगें 'असलियत से परे' हैं।
14 ऑपरेशन, फिर भी कोई नतीजा नहीं
पिछले दो दशकों में अकेले KP में हथियारबंद उग्रवादियों के खिलाफ 14 सैन्य अभियान चलाए जा चुके हैं। इसके अलावा, 2014 में 'ऑपरेशन रद्द-उल-फसाद' और 2024 में 'ऑपरेशन अज्म-ए-इस्तेहकाम' जैसे देशव्यापी अभियान भी हुए। इनमें से कोई भी अपना घोषित लक्ष्य हासिल नहीं कर सका — बल्कि इन अभियानों के कारण मानवाधिकार उल्लंघन और लाखों लोगों का विस्थापन हुआ।
जनवरी 2026 में KP की तिराह वैली में एक और प्रस्तावित ऑपरेशन की खबर से 70,000 से अधिक लोग — जिनमें अधिकांश महिलाएँ और बच्चे थे — इलाका छोड़कर जाने को मजबूर हो गए। रक्षा मंत्री आसिफ ने किसी ऑपरेशन की योजना से इनकार किया, लेकिन स्थानीय लोगों ने सरकारी आश्वासन पर भरोसा नहीं किया — पिछले अभियानों की तबाही की याद अभी ताज़ा है। इससे पहले, अगस्त 2025 में उत्तर-पश्चिम बाजौर ज़िले में एक सैन्य अभियान के कारण भी हज़ारों लोग विस्थापित हो चुके थे।
आर्थिक मोर्चे पर भी विफलता
पाकिस्तान अभी भी अंतरराष्ट्रीय बेलआउट और वित्तीय सहायता पर निर्भर है। विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए सेना को केंद्र में रखकर स्पेशल इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल (SIFC) बनाई गई, लेकिन आँकड़ों के अनुसार विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) में रुचि बढ़ने की बजाय घटी है। 'हाइब्रिड मॉडल' के कथित चमत्कारों को साबित करने के लिए कोई ठोस प्रमाण अब तक सामने नहीं आया है।
पाक-अफगान संबंध: गतिरोध की स्थिति
अफगान तालिबान सैन्य तनाव से बचने की कोशिश में इस्लामाबाद के साथ बातचीत जारी रखे हुए है, लेकिन वह पाकिस्तान को अपनी घरेलू और विदेश नीति निर्धारित करने की अनुमति देने को तैयार नहीं है। विश्लेषकों का मानना है कि अफगानिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का कोई रणनीतिक औचित्य नहीं है — यह मुख्यतः आंतरिक आलोचना से ध्यान हटाने का प्रयास है। जब तक पाकिस्तान अपने अंदरूनी सुरक्षा और राजनीतिक संकट का यथार्थवादी समाधान नहीं खोजता, यह गतिरोध बना रहेगा।