पाकिस्तान में MDCAT आवेदन 32% घटे: महंगी फीस और कम वेतन से मेडिकल शिक्षा संकट में
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान में मेडिकल एंड डेंटल कॉलेज एडमिशन टेस्ट (MDCAT) के लिए पंजीकरण कराने वाले छात्रों की संख्या में चिंताजनक गिरावट दर्ज की गई है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, 2022 में जहाँ 2,04,253 छात्रों ने पंजीकरण कराया था, वहीं 2026 में यह संख्या घटकर 1,38,158 रह गई — यानी लगभग 32 प्रतिशत की गिरावट। विशेषज्ञों का कहना है कि यह महज़ एक सांख्यिकीय बदलाव नहीं, बल्कि पाकिस्तान की मेडिकल शिक्षा प्रणाली में जड़ें जमा चुकी गहरी संरचनात्मक समस्याओं का प्रतिबिंब है।
गिरावट के मुख्य कारण
पाकिस्तान मेडिकल एसोसिएशन (PMA) ने इस गिरावट के लिए मुख्य रूप से दो कारण गिनाए हैं — मेडिकल शिक्षा की बढ़ती लागत और डॉक्टरों को मिलने वाला अपर्याप्त वेतन। संस्था ने चेतावनी दी है कि इन दोनों कारकों के मेल से युवा पीढ़ी चिकित्सा पेशे से मुँह मोड़ रही है।
वहीं पाकिस्तान मेडिकल एंड डेंटल काउंसिल (PMDC) ने एक अलग पहलू उजागर किया है — मेडिकल स्नातकों की संख्या और उन्हें उपलब्ध पोस्टग्रेजुएट प्रशिक्षण के अवसरों के बीच बड़ा असंतुलन। अर्थात् डिग्री मिलने के बाद भी विशेषज्ञ बनने का रास्ता बेहद संकरा है।
सामाजिक प्रतिष्ठा से मोहभंग
ब्रिटिश समाचारपत्र 'एशियन लाइट' की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में कई पीढ़ियों से डॉक्टर बनना केवल एक करियर विकल्प नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान, आर्थिक स्थिरता और समाज सेवा का प्रतीक माना जाता रहा है। लेकिन MDCAT पंजीकरण में आई इस तीव्र गिरावट से स्पष्ट है कि युवाओं की यह धारणा बदल रही है।
यह ऐसे समय में आया है जब डॉक्टर बनने के इच्छुक छात्रों को कड़ी प्रतिस्पर्धा, भारी शैक्षणिक खर्च, प्रवेश परीक्षाओं को लेकर बार-बार उठने वाले विवाद और पोस्टग्रेजुएट प्रशिक्षण को लेकर गहरी अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है।
आर्थिक बोझ और परिवारों की दुविधा
मेडिकल डिग्री हासिल करना एक लंबी और महंगी प्रक्रिया है — विशेष रूप से निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिला लेने वाले परिवारों के लिए। ट्यूशन फीस के अतिरिक्त आवास, परिवहन, पाठ्यपुस्तकें, परीक्षा तैयारी और दैनिक खर्चों को जोड़ने पर कुल लागत कई गुना बढ़ जाती है।
रिपोर्ट के अनुसार, कई परिवारों के लिए यह वित्तीय दबाव और भी असहनीय हो जाता है क्योंकि वर्षों तक निवेश करने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि स्नातक होने के बाद उनके बच्चे को अच्छी नौकरी या पर्याप्त आमदनी मिलेगी। गौरतलब है कि जो छात्र सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सीट नहीं पा पाते, उनके सामने प्रायः दो ही विकल्प बचते हैं — निजी कॉलेजों की भारी फीस वहन करना या किसी अन्य क्षेत्र में करियर बनाना।
संसदीय हस्तक्षेप और फीस असमानता
अगस्त 2026 में पाकिस्तान की नेशनल असेंबली की स्थायी समिति ने संबंधित मंत्रालय और PMDC को निर्देश दिया कि वे मेडिकल कॉलेजों में रिक्त सीटों, विभिन्न संस्थानों की फीस में अंतर और अधिक शुल्क वसूलने वाले कॉलेजों की निगरानी व्यवस्था की समीक्षा करें। इस हस्तक्षेप ने एक बड़े विरोधाभास को उजागर किया — एक ओर मेडिकल कॉलेजों में सीटें उपलब्ध हैं, दूसरी ओर बड़ी संख्या में छात्र और उनके परिवार इतनी महंगी शिक्षा का खर्च उठाने में असमर्थ हैं या उसे उचित नहीं मानते।
आगे क्या होगा
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि अब छात्रों के सामने सवाल सिर्फ मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पाने का नहीं रह गया — बल्कि यह भी है कि वर्षों का समय और धन लगाकर डॉक्टर बनना वास्तव में फायदेमंद रहेगा या नहीं। यदि पाकिस्तान सरकार फीस नियमन, डॉक्टरों के वेतनमान और पोस्टग्रेजुएट अवसरों के मोर्चे पर ठोस कदम नहीं उठाती, तो आने वाले वर्षों में देश को स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में गंभीर मानव संसाधन संकट का सामना करना पड़ सकता है।