क्या मिडिल ईस्ट संकट के चलते पाकिस्तान में आम जनता पर पड़ेगा आर्थिक बोझ?
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नई दिल्ली, 17 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव का प्रत्यक्ष प्रभाव अब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। ईंधन की कीमतों में वृद्धि के चलते, सरकार ने दो महीने के लिए कठोर मितव्ययिता पैकेज लागू करने का ऐलान किया है। एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि इस कदम का असर कार्यपालिका, विधायिका या न्यायपालिका पर नहीं, बल्कि सामान्य जनता पर अधिक पड़ेगा।
पाकिस्तान के प्रसिद्ध दैनिक बिजनेस रिकॉर्डर की रिपोर्ट में कहा गया है, "सरकार को अपने खर्चों में कटौती करनी चाहिए ताकि वह अपने मितव्ययिता के वादों को पूरा कर सके।" ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी के बीच सरकार का अस्टेरिटी पैकेज घोषित करना महत्वपूर्ण है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस आर्थिक दबाव का असली बोझ कौन उठाएगा: सरकार या आम जनता?
प्रधानमंत्री द्वारा घोषित यह पैकेज सभी मंत्रालयों, विभागों, स्वायत्त संस्थाओं, रक्षा संगठनों, न्यायपालिका और संसद पर लागू होगा। हालांकि, इन उपायों से कुल कितनी बचत होगी, इसका स्पष्ट अनुमान नहीं दिया गया है। केवल एक मद में "लगभग 4.5 अरब रुपये की बचत" का उल्लेख किया गया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सरकार को उम्मीद है कि सख्त निगरानी (जिसकी जिम्मेदारी इशाक डार की अध्यक्षता वाली समिति को दी गई है) से पर्याप्त बचत होगी, या फिर यह दर्शाता है कि योजना बनाने में पूरी तैयारी नहीं की गई।
ईंधन कीमतों में वृद्धि का सीधा असर आम लोगों पर पड़ता है। इससे महंगाई बढ़ती है और लोगों की आय की वास्तविक कीमत घट जाती है। घर चलाने वाले व्यक्ति के लिए यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि सीमित आय में किन जरूरतों को प्राथमिकता दी जाए।
आईएमएफ, यानी विश्व मुद्रा कोष, ने हाल ही में 157 अरब रुपये की लेवी कलेक्शन में कमी का अनुमान जताया है। रिपोर्ट के अनुसार, 7 मार्च को लेवी बढ़ाने का फैसला आईएमएफ के साथ बातचीत के दौरान ही लिया गया था, जो एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी (ईएफएफ) और रिसिलिएंस एंड सस्टेनेबिलिटी फैसिलिटी (आरएसएफ) के तहत हुई थी।
वैश्विक स्तर पर भी इस संकट का असर दिखने की आशंका है। ऊर्जा कीमतों में उछाल, महंगाई और क्षेत्रीय अस्थिरता से जीडीपी ग्रोथ प्रभावित हो सकती है—और पाकिस्तान भी इससे अछूता नहीं रहेगा।