पाकिस्तान-सऊदी अरब गुप्त रक्षा समझौता उजागर, ईरान मध्यस्थता के बीच दोहरी भूमिका पर सवाल
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान ने इस साल अप्रैल में जब अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई, ठीक उसी दौरान सऊदी अरब ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि पाकिस्तानी सैन्य बल और विमान किंग अब्दुलअजीज एयर बेस पर एक रक्षा समझौते के तहत तैनात किए गए हैं। एक जाँच रिपोर्ट के अनुसार, यह तैनाती एक गुप्त द्विपक्षीय रक्षा संधि का हिस्सा है, जिसे न तो पाकिस्तान की संसद के सामने रखा गया और न ही आम जनता को इसकी जानकारी दी गई।
गुप्त समझौते का खुलासा
मालदीव के मीडिया आउटलेट ईट्रुथ एमवी ने ड्रोप साइट न्यूज की जाँच का हवाला देते हुए दावा किया है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के बीच 2025 में एक स्ट्रैटजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट हुआ था। इस समझौते में स्पष्ट किया गया है कि किसी एक देश पर हमले को दोनों देशों पर हमला माना जाएगा।
रिपोर्ट के अनुसार, लीक दस्तावेजों और आंतरिक आकलनों से पता चलता है कि यह समझौता पूरी तरह संतुलित नहीं है — पाकिस्तान पर सऊदी अरब की रक्षा करने की बाध्यता अधिक है, जबकि भारत के संदर्भ में पाकिस्तान की सुरक्षा को लेकर सऊदी अरब की प्रतिबद्धता उतनी स्पष्ट नहीं बताई गई है।
मध्यस्थता और सैन्य तैनाती का टकराव
यह ऐसे समय में आया है जब अप्रैल 2025 में इस्लामाबाद में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी ईरानी अधिकारियों के साथ वार्ता में शामिल थे। पाकिस्तान खुद को एक तटस्थ मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत कर रहा था, लेकिन ठीक उसी दौरान सऊदी अरब द्वारा पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती की सार्वजनिक घोषणा ने उसकी कूटनीतिक स्थिति को संदिग्ध बना दिया।
गौरतलब है कि पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान तनाव के बीच किसी देश का एक साथ मध्यस्थ और किसी एक पक्ष के सहयोगी के रूप में कार्य करना कूटनीतिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है।
पाकिस्तान की कूटनीतिक स्थिति पर असर
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन घटनाओं ने पाकिस्तान की रणनीतिक कमजोरियों और सऊदी अरब के प्रति उसकी सैन्य प्रतिबद्धताओं को उजागर कर दिया है। जाँच के अनुसार, पाकिस्तान और सऊदी अरब के रिश्ते सार्वजनिक रूप से स्वीकार किए जाने से कहीं अधिक गहरे और बाध्यकारी हैं।
आलोचकों का कहना है कि यह रक्षा समझौता पाकिस्तान को ऐसे सैन्य दायित्वों में बाँध सकता है जो उसकी स्वतंत्र विदेश नीति, घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा हितों के विपरीत जा सकते हैं।
संसदीय पारदर्शिता पर सवाल
रिपोर्ट में विशेष रूप से यह रेखांकित किया गया है कि यह समझौता पाकिस्तान की संसद के समक्ष कभी नहीं रखा गया। लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अनदेखी करते हुए किए गए इस कथित समझौते पर पाकिस्तान सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
आगे यह देखना होगा कि इस खुलासे के बाद पाकिस्तान की संसद और विपक्षी दल क्या रुख अपनाते हैं, और क्या इस्लामाबाद इस रिपोर्ट का खंडन करता है।