SCO समिट में मोदी-पेजेश्कियन मुलाकात: 'शांति है भारत की विदेश नीति का मूल' — पूर्व MOS एमजे अकबर
सारांश
मुख्य बातें
किर्गिस्तान में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से पहली द्विपक्षीय बैठक हुई। विदेश मामलों के पूर्व राज्यमंत्री एमजे अकबर ने इस मुलाकात को भारत की शांति-केंद्रित कूटनीति का स्पष्ट संकेत बताया। रिपोर्टों के अनुसार, दोनों नेताओं के बीच चाबहार बंदरगाह और होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा सहित कई अहम द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा हुई।
मुलाकात का संदेश और पृष्ठभूमि
एमजे अकबर ने कहा, 'किर्गिस्तान में प्रधानमंत्री मोदी के एजेंडा में सबसे ज़रूरी ईरानी राष्ट्रपति के साथ उनकी पहली मीटिंग थी। इस मीटिंग से उन्होंने एक बहुत मज़बूत संदेश दिया क्योंकि मुलाकात खुद मक्का पैक्ट के बैकग्राउंड में थी और इसने असल में यह संदेश दिया कि समस्याओं का हल युद्ध और गठबंधन नहीं हैं — समस्याओं का हल बातचीत में है। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे अपनी नीति का मुख्य हिस्सा माना है, जो शांति है।'
अकबर के अनुसार, भारत और ईरान ने इस बैठक में कूटनीति के 'लचीले यथार्थवाद' का सहारा लिया — एक ऐसा दृष्टिकोण जो व्यावहारिक सहयोग को वैचारिक मतभेदों से ऊपर रखता है। यह ऐसे समय में आया है जब अमेरिका ने ईरान पर 'बाह्य प्रतिबंध' और नए टैरिफ लगाने के प्रयास तेज़ किए हैं।
चाबहार बंदरगाह: रणनीतिक महत्व
अकबर ने चाबहार बंदरगाह को इस बैठक का सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय तत्व बताया। उन्होंने कहा कि यह बंदरगाह वर्तमान क्षेत्रीय संकट में अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। गौरतलब है कि चाबहार परियोजना लंबे समय से भारत-ईरान एजेंडे का हिस्सा रही है और प्रधानमंत्री मोदी के पहले कार्यकाल में इसे व्यावहारिक रूप मिला था। अकबर के अनुसार, 'भारत और ईरान सभ्यताओं के आधार पर बने राष्ट्र हैं, जो समझते हैं कि द्विपक्षीय संबंध युद्ध के लिए बने पैक्ट से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।'
बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने होर्मुज जलडमरूमध्य को जहाज़ों की आवाजाही के लिए सुरक्षित रखने पर भी जोर दिया — जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक अत्यंत संवेदनशील मार्ग है।
भारत-चीन समीकरण और डोभाल की यात्रा
एमजे अकबर ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की हालिया चीन यात्रा को भी भारत-चीन संबंधों में सकारात्मक मोड़ बताया। उन्होंने कहा कि इस यात्रा का सीमा प्रबंधन पर 'असाधारण रूप से सकारात्मक प्रभाव' पड़ा है — एक ऐसा मुद्दा जो 1962 के युद्ध के बाद से दोनों देशों के बीच तनाव का स्रोत रहा है।
अकबर के अनुसार, 1988 में सीमा पर बनी सहमति की मूल भावना यह थी कि 'समाधान न करने में ही समाधान है' — अर्थात, यथास्थिति को स्वीकार कर सहयोग के नए रास्ते खोजे जाएं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि चीनी सेना के शीर्ष कमान में एक प्रमुख 'हॉक' को हाल ही में हटाए जाने की अटकलें हैं, हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि 'चीनी व्यवस्था अपारदर्शी बनी हुई है।'
शी जिनपिंग की दिल्ली यात्रा की संभावना
अकबर ने बताया कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग जल्द ही ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए नई दिल्ली आ सकते हैं। उनके अनुसार, दोनों पक्ष यह सुनिश्चित करने के प्रयास में हैं कि यह यात्रा ब्रिक्स के बैनर तले होने के बावजूद एक मज़बूत द्विपक्षीय आयाम लिए हो। उन्होंने उम्मीद जताई कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी के बीच यह बैठक 'मौजूदा अशांति को समाप्त करेगी और निकट भविष्य में सहयोग का मार्ग प्रशस्त करेगी।'
कुल मिलाकर, SCO समिट के इतर हुई ये कूटनीतिक गतिविधियाँ भारत की बहु-आयामी विदेश नीति को रेखांकित करती हैं — जो एक साथ ईरान, चीन और पश्चिमी देशों के साथ संतुलित संवाद बनाए रखने का प्रयास करती है।