ट्रंप का बड़ा ऐलान: समुद्री हमलों का नुकसान ईरानी संपत्तियों से वसूला जाएगा
सारांश
मुख्य बातें
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 23 जुलाई को घोषणा की कि भविष्य में जहाजों, कार्गो या उससे जुड़ी किसी भी संपत्ति को होने वाले नुकसान की भरपाई अमेरिका के नियंत्रण में रखे गए ईरानी फंड से की जाएगी। यह बयान मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और अमेरिका द्वारा ईरान पर जारी सैन्य कार्रवाई के बीच आया है।
ट्रंप का सीधा संदेश
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा, 'कृपया, इस बयान का मतलब है कि अगली सूचना तक, अब से जहाजों, कार्गो या उससे जुड़ी किसी भी चीज को हुए किसी भी नुकसान की भरपाई ईरानी पैसे से की जाएगी, जो अमेरिका के पास है और जिसे वह नियंत्रित करता है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि 'ये नुकसान बहुत ज्यादा हो सकते हैं, लेकिन फिर भी यह सही और बराबरी का काम है।'
हालाँकि, रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप ने यह स्पष्ट नहीं किया कि किस प्रकार की घटनाओं में ईरानी संपत्तियों का उपयोग किया जाएगा।
ईरान-अमेरिका तनाव की पृष्ठभूमि
यह ऐसे समय में आया है जब अमेरिका ईरान पर लगातार हवाई हमले कर रहा है। ट्रंप पहले भी कह चुके हैं कि ईरान भारी सैन्य दबाव झेलने के बावजूद अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर किसी समझौते के लिए तैयार नहीं है। उनके अनुसार, तेहरान बातचीत में अपनी स्थिति बदलता रहा, जबकि अमेरिका उसे परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए दृढ़ संकल्पित है।
जॉर्जिया रैली में सैन्य टकराव का बचाव
ट्रंप ने बुधवार को जॉर्जिया में आयोजित एक रैली में ईरान के साथ लड़ाई में मारे गए चार अमेरिकी सैनिकों को श्रद्धांजलि दी। इस मौके पर उन्होंने तेहरान को लेकर अपनी सरकार के राजनीतिक और कूटनीतिक रुख का बचाव करते हुए इस टकराव को विदेश में अमेरिकी शक्ति की पुनर्स्थापना की व्यापक कोशिश का हिस्सा बताया।
ट्रंप ने कहा, 'स्टॉक मार्केट में गिरावट आई है और इसी वजह से हमारी झड़प चल रही है। इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के साथ हमारी यह झड़प इसी वजह से हो रही है।' उन्होंने यह भी दावा किया कि चुनाव के बाद से शेयर बाजार 73 ऑल-टाइम हाई पर पहुँच चुका है और सैन्य टकराव के बावजूद अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भरोसा बना हुआ है।
आगे क्या होगा
गौरतलब है कि अमेरिका के नियंत्रण में रखी ईरानी संपत्तियों के उपयोग की यह नीति अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीतिक संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण सवाल खड़े करती है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस कदम से मध्य पूर्व में तनाव और गहरा हो सकता है तथा वैश्विक शिपिंग मार्गों पर असर पड़ने की आशंका है।