22 सितंबर 2026
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अमेरिका-इटली में क्रिटिकल मिनरल्स पर ऐतिहासिक MOU, रीसाइक्लिंग और सप्लाई चेन सुरक्षा पर जोर

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अमेरिका-इटली में क्रिटिकल मिनरल्स पर ऐतिहासिक MOU, रीसाइक्लिंग और सप्लाई चेन सुरक्षा पर जोर

सारांश

अमेरिका और इटली ने UNGA के मंच पर क्रिटिकल मिनरल्स पर साझा वर्किंग ग्रुप बनाने का समझौता किया। रीसाइक्लिंग पर जोर देकर दोनों देश विरोधी राष्ट्रों पर खनिज निर्भरता घटाने की रणनीति पर एकजुट हुए हैं — एक कदम जो बैटरी से लेकर रक्षा तकनीक तक की सप्लाई चेन को नया आकार दे सकता है।

मुख्य बातें

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने 22 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में क्रिटिकल मिनरल्स पर MOU पर हस्ताक्षर किए।
समझौते के तहत साझा वर्किंग ग्रुप बनाया जाएगा जो खनिजों की रीसाइक्लिंग और पुनः प्राप्ति पर ध्यान केंद्रित करेगा।
बातचीत में सप्लाई चेन विविधीकरण और रणनीतिक उद्योगों को विरोधी देशों से बचाने के उपाय भी शामिल रहे।
सहयोग बैटरी, सेमीकंडक्टर, रक्षा प्रणालियाँ और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों को कवर कर सकता है।
समझौते का वास्तविक प्रभाव वर्किंग ग्रुप द्वारा तय की जाने वाली परियोजनाओं और निवेश पर निर्भर करेगा।
भारत भी इस समझौते पर नज़र रखेगा, क्योंकि वह भी घरेलू खनिज प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाने पर काम कर रहा है।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और इटली के उप प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने 22 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान क्रिटिकल मिनरल्स यानी रणनीतिक रूप से अहम खनिजों पर द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने के लिए एक समझौता ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते में खनिजों की रीसाइक्लिंग और उन्हें पुनः प्राप्त करने की प्रक्रिया पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है, ताकि दोनों देश विरोधी राष्ट्रों पर अपनी खनिज निर्भरता कम कर सकें।

समझौते का मुख्य ढाँचा

इस MOU के तहत एक साझा वर्किंग ग्रुप का गठन किया जाएगा, जिसमें दोनों देशों के अधिकारी और तकनीकी विशेषज्ञ शामिल होंगे। इस ग्रुप का प्राथमिक उद्देश्य क्रिटिकल मिनरल्स की रीसाइक्लिंग और पुनः प्राप्ति के क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर ठोस सहयोग को आगे बढ़ाना होगा। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, इस ग्रुप का मुख्य ध्यान महज राजनयिक चर्चाओं तक सीमित न रहकर व्यावहारिक परियोजनाओं, नीतियों और निवेश पर होगा।

रुबियो और ताजानी ने बैठक के दौरान दोनों देशों के बीच व्यापक आर्थिक सहयोग के अन्य अवसरों पर भी विचार-विमर्श किया। विदेश विभाग के मुताबिक, बातचीत में सप्लाई चेन विविधीकरण और रणनीतिक उद्योगों को विरोधी देशों या उनसे संबद्ध संस्थाओं द्वारा अधिग्रहण से बचाने के उपायों पर भी चर्चा हुई।

रीसाइक्लिंग पर जोर क्यों

रीसाइक्लिंग को प्राथमिकता दिए जाने से स्पष्ट है कि अमेरिका और इटली केवल नई खदानों से खनिज उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहना चाहते। दोनों देश इस्तेमाल हो चुके उत्पादों, औद्योगिक कचरे और अन्य स्रोतों से कीमती खनिजों को पुनः प्राप्त कर उन्हें उत्पादन चक्र में लौटाने पर भी ध्यान देना चाहते हैं। इससे नए खनन पर निर्भरता घटेगी और घरेलू या क्षेत्रीय स्तर पर खनिजों का एक वैकल्पिक स्रोत तैयार होगा।

गौरतलब है कि लिथियम, कोबाल्ट, दुर्लभ मृदा तत्व (Rare Earth Elements) जैसे खनिजों की प्रोसेसिंग आज भी कुछ ही देशों में केंद्रित है। रीसाइक्लिंग-आधारित रणनीति इस भौगोलिक केंद्रीकरण के जोखिम को कम कर सकती है।

किन क्षेत्रों में होगा सहयोग

यह सहयोग बैटरी, सेमीकंडक्टर, रक्षा प्रणालियाँ, विद्युत अवसंरचना और अन्य आधुनिक प्रौद्योगिकियों में उपयोग होने वाले खनिजों को कवर कर सकता है। हालाँकि, अमेरिकी विदेश विभाग ने अभी तक विस्तार से यह नहीं बताया कि समझौते में किन-किन विशिष्ट क्षेत्रों को शामिल किया गया है। इस समझौते का वास्तविक प्रभाव मुख्यतः इस बात पर निर्भर करेगा कि वर्किंग ग्रुप आगे किन परियोजनाओं और निवेश का मार्ग प्रशस्त करता है।

वैश्विक संदर्भ और भारत पर नज़र

यह ऐसे समय में आया है जब इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा, डिजिटल अवसंरचना और रक्षा प्रौद्योगिकी के तेज़ विस्तार ने क्रिटिकल मिनरल्स की वैश्विक माँग में तेज़ बढ़ोतरी की है। पश्चिमी देशों में इन खनिजों की सप्लाई चेन को सुरक्षित करने की होड़ तेज़ हो गई है।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत भी इस समझौते पर करीबी नज़र रखेगा, क्योंकि भारत भी अहम खनिजों पर अन्य देशों के साथ साझेदारी बढ़ाने और घरेलू प्रोसेसिंग क्षमता विकसित करने की दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहा है। यह समझौता भविष्य में क्वाड या G20 जैसे बहुपक्षीय मंचों पर खनिज सुरक्षा की चर्चा को और गति दे सकता है।

आगे क्या होगा

साझा वर्किंग ग्रुप के गठन के बाद दोनों देशों के विशेषज्ञ उन क्षेत्रों की पहचान करेंगे जहाँ ठोस सहयोग संभव है। आमतौर पर MOU एक रूपरेखा तय करता है और असली परखाई तब होती है जब उससे बाध्यकारी समझौते, परियोजनाएँ और निवेश जन्म लेते हैं। अब दुनिया की नज़र इस बात पर होगी कि यह वर्किंग ग्रुप कितनी जल्दी और कितने प्रभावी तरीके से काम करना शुरू करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

उससे उपजने वाले बाध्यकारी समझौतों और निवेश में होती है। रीसाइक्लिंग पर जोर एक व्यावहारिक सोच है, पर अकेले रीसाइक्लिंग से प्राथमिक खनन की जरूरत खत्म नहीं होगी — यह सप्लाई का पूरक स्रोत बन सकता है, विकल्प नहीं। भारत के लिए सबक यह है कि खनिज सुरक्षा अब केवल व्यापार का मसला नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक पुनर्संरेखण का हथियार बन चुकी है।
RashtraPress
22 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अमेरिका और इटली के बीच क्रिटिकल मिनरल्स MOU क्या है?
यह 22 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में UNGA के 81वें सत्र के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी द्वारा हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन है। इसका उद्देश्य क्रिटिकल मिनरल्स की रीसाइक्लिंग और पुनः प्राप्ति पर द्विपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाना है।
इस समझौते में रीसाइक्लिंग पर क्यों जोर दिया गया है?
रीसाइक्लिंग पर ध्यान देने से दोनों देश केवल नई खदानों पर निर्भर न रहकर इस्तेमाल हो चुके उत्पादों और औद्योगिक कचरे से कीमती खनिज पुनः प्राप्त कर सकते हैं। इससे विदेशी प्रोसेसिंग नेटवर्क पर निर्भरता घटेगी और घरेलू स्तर पर खनिजों का वैकल्पिक स्रोत तैयार होगा।
साझा वर्किंग ग्रुप का काम क्या होगा?
साझा वर्किंग ग्रुप में दोनों देशों के अधिकारी और तकनीकी विशेषज्ञ शामिल होंगे। यह ग्रुप उन क्षेत्रों की पहचान करेगा जहाँ ठोस सहयोग संभव है और जमीनी स्तर पर परियोजनाओं, नीतियों तथा निवेश को आगे बढ़ाने पर काम करेगा।
इस MOU का भारत पर क्या असर पड़ सकता है?
भारत भी क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर अन्य देशों के साथ साझेदारी बढ़ाने और घरेलू प्रोसेसिंग क्षमता विकसित करने पर सक्रिय है। विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका-इटली का यह समझौता भविष्य में बहुपक्षीय खनिज सुरक्षा चर्चाओं को और गति दे सकता है, जिस पर भारत की करीबी नज़र रहेगी।
क्रिटिकल मिनरल्स किन उद्योगों के लिए ज़रूरी हैं?
क्रिटिकल मिनरल्स इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, रक्षा प्रणालियाँ और डिजिटल अवसंरचना जैसे अनेक रणनीतिक क्षेत्रों के लिए अपरिहार्य हैं। इनकी सप्लाई में बाधा किसी देश की अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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