यासुकुनी मंदिर दर्शन पर चीन का कड़ा जवाब: जापानी सैन्यवाद का प्रतीक, टोक्यो ट्रायल की 80वीं वर्षगांठ पर चेतावनी
सारांश
मुख्य बातें
चीनी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता च्यांग पिन ने 15 अगस्त 2026 को जापानी राजनीतिज्ञों द्वारा यासुकुनी मंदिर के दर्शन पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह मंदिर जापानी सैन्यवाद के वैदेशिक आक्रमण का आध्यात्मिक उपकरण और प्रतीक है, जहाँ एशिया एवं प्रशांत क्षेत्र की जनता के रक्त से सने जापानी युद्ध अपराधियों की पूजा होती है। बीजिंग की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई है जब वर्तमान वर्ष टोक्यो ट्रायल की शुरुआत की 80वीं वर्षगांठ है।
मुख्य घटनाक्रम
प्रवक्ता च्यांग पिन ने एक प्रेस वार्ता में कहा कि जापानी राजनीतिज्ञों की इस कार्रवाई ने खुलेआम ऐतिहासिक न्याय का अपमान किया है और पीड़ित देशों की जनता की भावनाओं को गंभीर ठेस पहुँचाई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस कदम का मर्म आक्रमण की जिम्मेदारी को छिपाकर द्वितीय विश्व युद्ध में फासिस्ट-विरोधी गठबंधन की जीत की उपलब्धियों और युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को चुनौती देना है।
चीन की चेतावनी और ऐतिहासिक संदर्भ
च्यांग पिन ने कहा कि आक्रमण के इतिहास का सामना कर युद्ध अपराधों का गहरा आत्म-निरीक्षण करना ही जापान द्वारा एशियाई पड़ोसी देशों के साथ संबंध विकसित करने का आधार है। उन्होंने टोक्यो ट्रायल की 80वीं वर्षगांठ का उल्लेख करते हुए जापान से ऐतिहासिक सबक लेकर ऐसी 'गलत कार्रवाइयाँ' बंद करने का अनुरोध किया।
गौरतलब है कि यासुकुनी मंदिर में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दोषी ठहराए गए जापानी युद्ध अपराधियों को भी सम्मानित किया जाता है, जिसके कारण यह मंदिर चीन, दक्षिण कोरिया और अन्य एशियाई देशों के साथ राजनयिक तनाव का स्थायी केंद्र बना हुआ है।
क्षेत्रीय शांति पर असर की चेतावनी
च्यांग पिन ने यह भी कहा कि यदि जापान 'तथाकथित नई किस्म के सैन्यवाद' को बढ़ावा देता रहा और क्षेत्रीय शांति को नुकसान पहुँचाने का स्रोत बनता रहा, तो उसे 'न्याय की सुनवाई का सामना करना पड़ेगा।' यह बयान ऐसे समय में आया है जब जापान अपनी रक्षा नीति में व्यापक बदलाव कर रहा है और रक्षा बजट को सकल घरेलू उत्पाद के 2% तक बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
विश्लेषकों के अनुसार, यासुकुनी दर्शन का मुद्दा चीन-जापान और दक्षिण कोरिया-जापान संबंधों में दशकों से संवेदनशील बिंदु रहा है। यह ऐसी Nवीं घटना है जिसमें जापानी नेताओं के मंदिर दर्शन के बाद बीजिंग और सियोल ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। आलोचकों का कहना है कि इस मुद्दे पर जापान की घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय कूटनीति के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है।
क्या होगा आगे
चीन के इस बयान के बाद जापान-चीन राजनयिक संबंधों पर असर की आशंका जताई जा रही है। यह देखना होगा कि जापान सरकार इस पर औपचारिक प्रतिक्रिया देती है या नहीं। टोक्यो ट्रायल की वर्षगांठ के संदर्भ में बीजिंग का यह कदम क्षेत्रीय स्मृति-राजनीति को फिर से केंद्र में लाता है।