आचार्य प्रशांत का NEET आंदोलनकारी युवाओं को संदेश: 'पहले दर्पण, फिर मार्च'
सारांश
मुख्य बातें
आचार्य प्रशांत — दार्शनिक, लेखक और प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक — ने 24 जुलाई को NEET पेपर लीक के विरोध में सड़कों पर उतरे युवाओं के नाम एक विस्तृत संदेश जारी किया, जिसमें उन्होंने आंदोलन की दिशा को सही मानते हुए उसके क्रम पर गंभीर प्रश्न उठाए। उनका केंद्रीय तर्क यह था कि जब आंदोलन का शोर इतना ऊँचा हो जाए कि आंदोलनकर्ता की स्वयं की जाँच ही न हो सके, तो क्रांति की दिशा उलट जाती है।
पेपर लीक पर राज्य की जवाबदेही
आचार्य प्रशांत ने आंदोलन के दौरान हुई युवा मौतों पर शोक व्यक्त किया और NEET पेपर लीक को विद्यार्थियों के वर्षों की मेहनत की चोरी बताया। उन्होंने कहा, 'जिस प्रशासन में प्रश्नपत्र न्याय से अधिक तेज़ी से यात्रा करते हों, वह अपने सबसे प्राथमिक दायित्व में विफल हो चुका है।' उन्होंने बच्चों का भविष्य नकद में बेचने वाले गिरोहों पर कठोरतम कार्रवाई और उन्हें पनपने देने वाली एजेंसियों की जाँच की माँग भी की।
साथ ही उन्होंने एक असुविधाजनक प्रश्न भी रखा — पेपर लीक हुआ, किसी ने बेचा, तो किसी ने खरीदा भी होगा। उन्होंने कहा, 'मुझे उस मार्च में एक ऐसा खरीदार दिखा दो, एक भी युवा, जिसने लीक हुआ पेपर खरीदा, उससे अपना लाभ लिया और आज सड़क पर खड़े होकर चिल्ला रहा है कि व्यवस्था सड़ी हुई है।'
आंकड़े जो लीक से पहले के हैं
आचार्य प्रशांत ने उन वर्षों के आँकड़ों की ओर ध्यान दिलाया जब परीक्षाएँ पूरी तरह साफ थीं। 2022 में देश में लगभग 14 हज़ार छात्र आत्महत्याएँ दर्ज हुईं, जो 2011 की तुलना में 80 प्रतिशत से अधिक थीं। 2021 में 30 वर्ष से कम आयु के 1,500 से अधिक युवाओं की मृत्यु का दर्ज कारण 'परीक्षा में असफलता' था।
उनका तर्क था कि 'पेपर लीक ने उस मशीन को नहीं बनाया जो रैंक को जीवन के बराबर मानती है — लीक ने केवल उसे बेनकाब किया है।' वर्षों से पूरी सभ्यता सत्रह वर्ष के बच्चों से कह रही है कि उनका आत्म-मूल्य स्कोरकार्ड से तय होगा, और 'परिणाम ढहता है तो युवा निष्कर्ष निकालता है कि मैं ही ढह गया हूँ — यही निष्कर्ष असली हत्यारा है।'
मतदाता की जवाबदेही और राजनीतिक पक्षधरता
आचार्य प्रशांत ने एक रूपक के ज़रिए मतदाता की भूमिका को रेखांकित किया — यदि एक बंदर घर में घुसकर सब कुछ तहस-नहस कर दे, तो माँ उस बच्चे को भी थप्पड़ लगाएगी जिसने दरवाज़ा खुला छोड़ा था। 'जिन्हें आज कुर्सियों से हटाने की माँग हो रही है, उन्हें वहाँ तक पहुँचाने वाले मतदाता स्वयं हैं' — यह याद दिलाते हुए उन्होंने पूछा कि 'मतदान केंद्र में तुम कर क्या रहे थे?'
राजनीतिक पक्षधरता पर उन्होंने कहा कि बायाँ और दायाँ, दोनों शासन कर चुके हैं और दोनों एक ही तरह से विफल हुए — 'वे विरोधी नहीं हैं, वे एक ही अहंकार के दो हाथ हैं।'
इतिहास के आईने में आंदोलन
आचार्य प्रशांत ने याद दिलाया कि आधी सदी पहले भ्रष्टाचार के विरुद्ध उठे सबसे बड़े छात्र आंदोलन के नायक बाद में स्वयं उन्हीं आरोपों में घिरे, और पंद्रह वर्ष पहले राजधानी में उठी भ्रष्टाचार-विरोधी लहर का नायक शासन में आकर स्वयं मुकदमों का सामना करता रहा। उनका निष्कर्ष था: 'ये यह सिद्ध नहीं करते कि मार्च करना बेकार है — ये सिद्ध करते हैं कि बिना भीतर की तैयारी के मार्च करने वाले बेकार हैं।'
उन्होंने विधवा-दाह प्रथा के उन्मूलन का उदाहरण भी दिया — जिस व्यक्ति ने इसमें निर्णायक भूमिका निभाई, वह शिक्षक था, मार्च निकालने वाला नहीं। पर उन्होंने यह भी जोड़ा कि केवल कानून बदलने से केंद्र नहीं बदला, इसीलिए दहेज के लिए रसोई में जलाई जाने वाली स्त्रियों की संख्या चिता पर जलने वालों से कहीं अधिक रही।
क्रांति का प्रस्तावित क्रम
आचार्य प्रशांत ने अंत में एक व्यावहारिक क्रम सुझाया: पहले स्वयं को जानने की शिक्षा, फिर आसपास के मतदाता को शिक्षित करना, फिर मतदान, फिर संगठित होना, फिर चुनाव, और फिर मार्च। उन्होंने कहा, 'जाग्रत लोगों का मार्च केवल स्वीकार्य नहीं है, उसकी प्रतीक्षा की जा रही है।'
अपने केंद्रीय तर्क में उन्होंने गीता का संदर्भ दिया — कृष्ण ने अर्जुन को युद्धभूमि में पहले स्पष्टता दी, फिर युद्ध का आदेश दिया। 'कसौटी ईमानदारी है, और ईमानदारी में वर्षों नहीं लगते।' उनका अंतिम संदेश था: 'पहले दर्पण, फिर मार्च। पहले आँखें, फिर सड़क — असली क्रांति किसी मंत्रालय या मैदान में नहीं बसती, वह पहले तुम्हारे भीतर रहती है।'
गौरतलब है कि आचार्य प्रशांत IIT दिल्ली और IIM अहमदाबाद के पूर्व छात्र हैं और उनका कार्य सोशल मीडिया पर 10 करोड़ से अधिक सब्सक्राइबर्स तक पहुँचता है। हाल ही में उन्हें वाटकिन्स 2026 सूची में विश्व के सर्वाधिक प्रभावशाली जीवित विचारकों में सम्मिलित किया गया है।