अमरेली में देश का पहला लॉयन अंडरपास तैयार, एशियाई शेरों को रेल हादसों से मिलेगी सुरक्षा
सारांश
मुख्य बातें
गुजरात के अमरेली जिले में पश्चिम रेलवे और गुजरात वन विभाग की संयुक्त पहल से देश का पहला लॉयन अंडरपास बनकर तैयार हो गया है, जो एशियाई शेरों को रेलवे ट्रैक पार करते समय होने वाली जानलेवा दुर्घटनाओं से बचाने के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया है। 22 जुलाई 2026 को सामने आई इस खबर को वन्यजीव संरक्षण और रेल अवसंरचना के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
परियोजना का विस्तार और लागत
₹9.42 करोड़ की लागत वाली इस परियोजना के तहत कुल पाँच लॉयन अंडरपास बनाए जाने हैं। इनमें से पहला अंडरपास भेराई क्षेत्र में पूरी तरह तैयार हो चुका है, जबकि शेष चार पर काम जारी है। ये अंडरपास ढसा-राजुला और राजुला-पीपावाव रेलखंडों पर बनाए जा रहे हैं — वही मार्ग जहाँ शेरों और अन्य वन्यजीवों के ट्रेन की चपेट में आने की घटनाएँ बार-बार दर्ज होती रही हैं।
क्यों ज़रूरी था यह कदम
गुजरात का गीर वन्यजीव अभयारण्य दुनिया में एशियाई शेरों का एकमात्र प्राकृतिक आवास है और इसका बड़ा हिस्सा अमरेली जिले में फैला हुआ है। इसी क्षेत्र से पश्चिम रेलवे की व्यस्त रेल लाइन गुजरती है, जिस पर शेर और अन्य वन्यजीव अक्सर ट्रैक पार करते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब वन्यजीव-रेल टकराव की घटनाएँ संरक्षणवादियों के लिए गंभीर चिंता का विषय बनी हुई हैं।
अधिकारियों की प्रतिक्रिया
भावनगर मंडल के मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) दिनेश वर्मा ने कहा, 'यदि अमरेली में यह मॉडल सफल रहता है और वन्यजीव दुर्घटनाओं में कमी आती है तो भविष्य में इसे देश के अन्य वन्यजीव बहुल क्षेत्रों से गुजरने वाले रेलवे मार्गों पर भी लागू किया जाएगा। यह परियोजना वन्यजीव संरक्षण और आधुनिक रेल अवसंरचना के बीच बेहतर संतुलन का उदाहरण है।' रेलवे ने इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य 'जीरो एक्सीडेंट' के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ना बताया है।
स्थानीय समुदाय की राय
अमरेली के किसान महेंद्र खुमान ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा, 'जिले में एशियाई शेरों की संख्या काफी अधिक है और रेलवे ट्रैक उनके लिए बड़ा खतरा बन जाता है। भेराई क्षेत्र में बनाया गया यह अंडरपास शेरों की सुरक्षा के लिए एक ऐतिहासिक पहल है।' उन्होंने यह भी कहा कि सभी पाँच अंडरपास पूरे होने पर वन्यजीवों को सुरक्षित मार्ग मिलेगा और दुर्घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आएगी।
आगे की राह
रेलवे, वन विभाग और स्थानीय प्रशासन के समन्वित प्रयास से शुरू हुई यह पहल न केवल एशियाई शेरों के संरक्षण को मज़बूती देगी, बल्कि देश में वन्यजीव सुरक्षा के लिए एक नए मॉडल के रूप में भी स्थापित हो सकती है। यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो भारत के अन्य वन्यजीव-संवेदनशील रेल गलियारों पर इसी तर्ज़ पर अंडरपास बनाए जाने की संभावना है।