14 अगस्त 2026
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अमृतसर में 31वाँ हिंद-पाक दोस्ती सम्मेलन: 20 राज्यों के 400 प्रतिनिधियों ने शांति और भाईचारे का संकल्प लिया

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अमृतसर में 31वाँ हिंद-पाक दोस्ती सम्मेलन: 20 राज्यों के 400 प्रतिनिधियों ने शांति और भाईचारे का संकल्प लिया

सारांश

अमृतसर में 31वें हिंद-पाक दोस्ती सम्मेलन में 20 राज्यों के 400 प्रतिनिधि एकजुट हुए। डॉ. सुनील ने बर्लिन की दीवार और यूरोपीय एकीकरण की मिसाल देते हुए कहा कि भारत-पाकिस्तान के बीच भी शांति और सहयोग संभव है — बशर्ते संसाधन हथियारों की जगह जनकल्याण पर खर्च हों।

मुख्य बातें

अमृतसर में 14 अगस्त 2026 को 31वाँ हिंद-पाक दोस्ती सम्मेलन आयोजित हुआ।
देश के करीब 20 राज्यों से लगभग 400 प्रतिनिधि सम्मेलन में शामिल हुए।
बांग्लादेश-भारत-पाकिस्तान पीपुल्स फोरम के वर्किंग प्रेसीडेंट डॉ.
सुनील ने शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को सैन्य खर्च पर प्राथमिकता देने की माँग की।
पार्टीशन म्यूजियम की विभाजन-कालीन कहानियों ने प्रतिभागियों को शांति की जरूरत का गहरा एहसास कराया।
वक्ताओं ने बर्लिन की दीवार और यूरोपीय संघ का उदाहरण देते हुए भारत-पाकिस्तान के बीच सहयोग की संभावनाएँ रेखांकित कीं।
सम्मेलन में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के बीच शांतिपूर्ण संबंधों की अपील की गई।

अमृतसर में 14 अगस्त 2026 को आयोजित 31वें हिंद-पाक दोस्ती सम्मेलन में भारत और पाकिस्तान के बीच जन-स्तरीय संवाद, शांति और आपसी विश्वास को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। देश के करीब 20 राज्यों से लगभग 400 प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में हिस्सा लिया, जिनका साझा संदेश था — नफरत की दीवारें तोड़कर भाईचारे की नींव रखना।

मुख्य घटनाक्रम

सम्मेलन में बांग्लादेश-भारत-पाकिस्तान पीपुल्स फोरम के वर्किंग प्रेसीडेंट और मध्य प्रदेश के पूर्व विधायक डॉ. सुनील ने कहा कि दोनों देशों के बीच तनाव और नफरत को कम करने का एकमात्र टिकाऊ रास्ता आम नागरिकों के बीच संवाद और दोस्ती को बढ़ावा देना है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि युद्ध किसी भी देश की जनता के लिए स्थायी समाधान नहीं है।

डॉ. सुनील ने पार्टीशन म्यूजियम में दर्ज विभाजन की दर्दनाक कहानियों का उल्लेख करते हुए कहा कि 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन ने करोड़ों आम लोगों को भारी मानवीय त्रासदी झेलने पर मजबूर किया था। उनके अनुसार, इतिहास यह सिखाता है कि युद्ध और हिंसा की सबसे बड़ी कीमत हमेशा आम परिवारों को चुकानी पड़ती है।

संसाधनों के पुनर्आवंटन की माँग

डॉ. सुनील ने तर्क दिया कि यदि हथियारों और सैन्य तैयारियों पर खर्च होने वाले संसाधनों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे क्षेत्रों में लगाया जाए, तो दोनों देशों के करोड़ों नागरिकों के जीवन में सकारात्मक बदलाव संभव है। उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान को अपने राष्ट्रीय संसाधनों का बड़ा हिस्सा जनकल्याण के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।

उन्होंने बर्लिन की दीवार के गिरने और यूरोपीय संघ के गठन का उदाहरण देते हुए कहा कि इतिहास और संस्कृति से जुड़े समाज दशकों की दुश्मनी के बाद भी सहयोग की राह अपना सकते हैं। उनके अनुसार, भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच साझा इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को दुश्मनी के बजाय आपसी समझ का आधार बनाया जा सकता है।

युवाओं की भूमिका

डॉ. सुनील ने युवाओं की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि जिस तरह विभिन्न आंदोलनों में नई पीढ़ी ने अपनी आवाज प्रभावी ढंग से उठाई है, उसी तरह दोनों देशों में शांति चाहने वाले युवाओं को एकजुट होकर सामने आना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकारें भी जनता की शांति की इच्छा को समझेंगी।

प्रतिभागियों की प्रतिक्रिया

सम्मेलन में शामिल राज स्मृति ने कहा कि आज की पीढ़ी ने विभाजन की भयावहता को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा है। पार्टीशन म्यूजियम की दर्दनाक कहानियाँ देखने के बाद उन्हें यह गहराई से महसूस हुआ कि समाज और देशों को शांति की कितनी जरूरत है।

राज स्मृति ने यह भी कहा कि भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान को पुरानी दुश्मनी और आपसी अविश्वास से बाहर निकलकर शांतिपूर्ण रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए। उनके अनुसार, आधुनिक हथियारों की आपूर्ति करने वाले देशों को आर्थिक लाभ हो सकता है, लेकिन संघर्ष में शामिल देशों की जनता को महंगाई, असुरक्षा और विस्थापन जैसी पीड़ाएँ झेलनी पड़ती हैं।

आगे की राह

सम्मेलन का उद्देश्य शांति का संदेश फैलाना और दोनों देशों में मौजूद उन आवाजों को मजबूती देना है जो आपसी सम्मान और दोस्ती की पक्षधर हैं। यह ऐसे समय में आयोजित हुआ जब भारत-पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक तनाव का दौर जारी है, और जन-स्तरीय संवाद की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह ऐसे समय में हो रहा है जब दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संवाद लगभग ठप है — जो इस आयोजन की प्रासंगिकता और सीमाएँ दोनों को एक साथ उजागर करता है। जन-स्तरीय संवाद का इतिहास बताता है कि ट्रैक-2 कूटनीति तभी असरदार होती है जब सरकारें उसे नीतिगत स्थान देती हैं — जो फिलहाल दिखता नहीं। बर्लिन की दीवार का उदाहरण प्रेरक है, परंतु यूरोपीय एकीकरण के पीछे दशकों की संस्थागत इच्छाशक्ति थी, केवल नागरिक भावना नहीं। असली सवाल यह है कि क्या ऐसे सम्मेलनों का संदेश सीमाओं के पार पहुँचता है, या केवल उन्हीं तक सीमित रहता है जो पहले से शांति के पक्षधर हैं।
RashtraPress
14 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

31वाँ हिंद-पाक दोस्ती सम्मेलन क्या है और यह कहाँ आयोजित हुआ?
यह भारत-पाकिस्तान के बीच जन-स्तरीय शांति और संवाद को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित एक वार्षिक सम्मेलन है, जिसका 31वाँ संस्करण 14 अगस्त 2026 को अमृतसर में हुआ। इसमें देश के 20 राज्यों से लगभग 400 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
सम्मेलन में किन मुख्य मुद्दों पर चर्चा हुई?
सम्मेलन में भारत-पाकिस्तान के बीच शांति, आपसी विश्वास और नागरिक संवाद को मजबूत करने पर जोर दिया गया। वक्ताओं ने सैन्य खर्च की जगह शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को प्राथमिकता देने की माँग की और विभाजन की मानवीय त्रासदी से सबक लेने का आह्वान किया।
डॉ. सुनील ने बर्लिन की दीवार का उदाहरण क्यों दिया?
डॉ. सुनील ने यह दर्शाने के लिए बर्लिन की दीवार के गिरने और यूरोपीय संघ के गठन का उदाहरण दिया कि दशकों की दुश्मनी के बाद भी साझा इतिहास और संस्कृति वाले समाज सहयोग की राह अपना सकते हैं। उनका तर्क था कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच भी ऐसी संभावनाएँ मौजूद हैं।
सम्मेलन में युवाओं की भूमिका को लेकर क्या कहा गया?
डॉ. सुनील ने कहा कि शांति चाहने वाले युवाओं को एकजुट होकर सड़कों और सामाजिक मंचों पर अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों देशों की सरकारें जनता की इस शांति की इच्छा को समझेंगी और नीतिगत स्तर पर उसे स्थान देंगी।
राज स्मृति ने सम्मेलन में क्या कहा?
राज स्मृति ने कहा कि आज की पीढ़ी ने विभाजन की भयावहता प्रत्यक्ष नहीं देखी, लेकिन पार्टीशन म्यूजियम की कहानियों ने उन्हें शांति की जरूरत का गहरा एहसास कराया। उन्होंने यह भी कहा कि युद्ध से आम जनता को कोई लाभ नहीं, बल्कि परिवारों और कमजोर वर्गों को सबसे अधिक नुकसान होता है।
राष्ट्र प्रेस
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