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अन्ना हजारे: भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जन लोकपाल' की लड़ाई और 'मैं भी अन्ना हूं' की क्रांति

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अन्ना हजारे: भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जन लोकपाल' की लड़ाई और 'मैं भी अन्ना हूं' की क्रांति

सारांश

किसान के बेटे से देश के सबसे बड़े भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के नायक तक — अन्ना हजारे की यात्रा सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। 'मैं भी अन्ना हूं' की टोपियों ने 2011 में पूरे भारत को एकजुट किया और अंततः 2014 में लोकपाल कानून की नींव रखी।

मुख्य बातें

अन्ना हजारे का जन्म 15 जून 1937 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में हुआ; असली नाम किसान बाबूराव हजारे ।
1991 में 'भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन' की स्थापना; जुलाई 2003 के अनशन ने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की राह खोली।
5 अप्रैल 2011 को जंतर-मंतर पर अनशन; गिरफ्तारी के बाद देशभर में 'मैं भी अन्ना हूं' आंदोलन भड़का।
रामलीला मैदान में 13 दिनों के अनशन के बाद संसद ने 'सेंस ऑफ द हाउस' प्रस्ताव पारित किया।
1 जनवरी 2014 को 'लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम' लागू हुआ।
हजारे पद्म भूषण से सम्मानित; अब भी रालेगन सिद्धि में सादा जीवन व्यतीत करते हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे — जिनका असली नाम किसान बाबूराव हजारे है — का जन्म 15 जून 1937 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में हुआ था। दशकों की निरंतर सक्रियता के बाद आज वे भारत के सबसे प्रभावशाली जन-आंदोलनकारियों में गिने जाते हैं, जिन्होंने ग्रामीण विकास, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार-विरोधी संघर्ष को नई दिशा दी।

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की नींव

हजारे ने 1991 में 'भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन' की शुरुआत की। उनका मत था कि सरकारी गोपनीयता ही भ्रष्टाचार की असली जड़ है। इसी विचार को आधार बनाकर उन्होंने महाराष्ट्र में सूचना के अधिकार के लिए ऐतिहासिक संघर्ष छेड़ा। जुलाई 2003 में उनके आमरण अनशन ने राज्य सरकार को झुकने पर मजबूर किया — और यही आंदोलन आगे चलकर केंद्र के सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की आधारशिला बना। इस संघर्ष के दौरान उन्हें यरवदा जेल भी जाना पड़ा।

'जन लोकपाल' और रामलीला मैदान की क्रांति

5 अप्रैल 2011 को हजारे ने जंतर-मंतर, नई दिल्ली पर 'जन लोकपाल विधेयक' के समर्थन में आमरण अनशन शुरू किया। इस विधेयक में भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच के लिए एक स्वतंत्र लोकपाल की नियुक्ति और कड़े भ्रष्टाचार-रोधी कानून का प्रस्ताव था। जब सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेजा, तो पूरे देश की सड़कें 'मैं भी अन्ना हूं' की टोपियों और तिरंगों से भर गईं।

यह ऐसे समय में आया जब देश में भ्रष्टाचार के बड़े घोटालों को लेकर जनआक्रोश अपने चरम पर था। रामलीला मैदान में 13 दिनों के अनशन ने संसद को 'सेंस ऑफ द हाउस' प्रस्ताव पारित करने पर विवश किया, जिसके परिणामस्वरूप 1 जनवरी 2014 को 'लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम' लागू हुआ।

राजनीति से दूरी और नैतिक अडिगता

आंदोलन के बाद उनके कई साथियों ने चुनावी राजनीति की राह चुनी, किंतु हजारे अपनी वैचारिक शुचिता पर अडिग रहे। 2015 में वे भूमि अधिग्रहण विधेयक के खिलाफ किसानों के पक्ष में खड़े हुए। बाद में उन्होंने अपनी ही पुरानी टीम की दिल्ली आबकारी नीति पर भी तीखी आलोचना की। आलोचकों का कहना है कि यह नैतिक स्वतंत्रता ही उन्हें दलगत राजनेताओं से अलग करती है।

सादा जीवन, बड़ी विरासत

पद्म भूषण और अनेक वैश्विक पुरस्कारों से सम्मानित हजारे आज भी महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में अपने पैतृक गाँव रालेगन सिद्धि के संत यादवबाबा मंदिर से सटे एक छोटे से कमरे में अत्यंत सादा जीवन व्यतीत करते हैं। गौरतलब है कि रालेगन सिद्धि स्वयं एक मॉडल गाँव के रूप में विकसित हुआ, जो हजारे के समग्र विकास के दर्शन का जीता-जागता उदाहरण है।

आगे की राह

लोकपाल अधिनियम के लागू होने के वर्षों बाद भी इसके प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल बने हुए हैं। हजारे का संघर्ष यह याद दिलाता है कि कानून बनना और उसका वास्तविक अनुपालन — दोनों के बीच की खाई पाटना अभी बाकी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि लोकपाल कानून बनने के एक दशक बाद भी भ्रष्टाचार के बड़े मामलों में दोषसिद्धि की दर क्यों निराशाजनक बनी हुई है। कानून बनाना और उसे दाँत देना — दोनों अलग-अलग लड़ाइयाँ हैं, और दूसरी लड़ाई अभी अधूरी है। हजारे की वैचारिक शुचिता प्रेरणादायक है, किंतु संस्थागत बदलाव के बिना व्यक्तिगत नैतिकता की सीमाएँ भी स्पष्ट हो जाती हैं।
RashtraPress
30 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अन्ना हजारे कौन हैं और उनका असली नाम क्या है?
अन्ना हजारे का असली नाम किसान बाबूराव हजारे है। उनका जन्म 15 जून 1937 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में हुआ था और वे भारत के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता एवं भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलनकारी हैं।
जन लोकपाल विधेयक क्या था और इसकी माँग क्यों उठी?
जन लोकपाल विधेयक में भारत में भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच के लिए एक स्वतंत्र लोकपाल की नियुक्ति और कड़े भ्रष्टाचार-रोधी कानून बनाने का प्रस्ताव था। अन्ना हजारे ने 5 अप्रैल 2011 को इसी माँग को लेकर जंतर-मंतर पर आमरण अनशन शुरू किया, जो देशव्यापी आंदोलन बन गया।
'मैं भी अन्ना हूं' आंदोलन कैसे शुरू हुआ?
जब सरकार ने अन्ना हजारे को गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेजा, तो देशभर में जनाक्रोश फूट पड़ा और लोग 'मैं भी अन्ना हूं' की टोपियाँ पहनकर सड़कों पर उतर आए। रामलीला मैदान में 13 दिनों के अनशन के बाद संसद ने 'सेंस ऑफ द हाउस' प्रस्ताव पारित किया।
लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम कब लागू हुआ?
2011 के जन आंदोलन के दबाव में संसद ने कानून बनाने की प्रतिबद्धता जताई और 1 जनवरी 2014 को 'लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम' लागू हुआ।
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 में अन्ना हजारे की क्या भूमिका थी?
अन्ना हजारे ने महाराष्ट्र में सूचना के अधिकार के लिए ऐतिहासिक संघर्ष किया और जुलाई 2003 में आमरण अनशन से राज्य सरकार को झुकने पर मजबूर किया। यह आंदोलन केंद्र के सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की नींव बना।
राष्ट्र प्रेस
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