अन्ना हजारे: भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जन लोकपाल' की लड़ाई और 'मैं भी अन्ना हूं' की क्रांति
सारांश
मुख्य बातें
सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे — जिनका असली नाम किसान बाबूराव हजारे है — का जन्म 15 जून 1937 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में हुआ था। दशकों की निरंतर सक्रियता के बाद आज वे भारत के सबसे प्रभावशाली जन-आंदोलनकारियों में गिने जाते हैं, जिन्होंने ग्रामीण विकास, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार-विरोधी संघर्ष को नई दिशा दी।
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की नींव
हजारे ने 1991 में 'भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन' की शुरुआत की। उनका मत था कि सरकारी गोपनीयता ही भ्रष्टाचार की असली जड़ है। इसी विचार को आधार बनाकर उन्होंने महाराष्ट्र में सूचना के अधिकार के लिए ऐतिहासिक संघर्ष छेड़ा। जुलाई 2003 में उनके आमरण अनशन ने राज्य सरकार को झुकने पर मजबूर किया — और यही आंदोलन आगे चलकर केंद्र के सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की आधारशिला बना। इस संघर्ष के दौरान उन्हें यरवदा जेल भी जाना पड़ा।
'जन लोकपाल' और रामलीला मैदान की क्रांति
5 अप्रैल 2011 को हजारे ने जंतर-मंतर, नई दिल्ली पर 'जन लोकपाल विधेयक' के समर्थन में आमरण अनशन शुरू किया। इस विधेयक में भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच के लिए एक स्वतंत्र लोकपाल की नियुक्ति और कड़े भ्रष्टाचार-रोधी कानून का प्रस्ताव था। जब सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेजा, तो पूरे देश की सड़कें 'मैं भी अन्ना हूं' की टोपियों और तिरंगों से भर गईं।
यह ऐसे समय में आया जब देश में भ्रष्टाचार के बड़े घोटालों को लेकर जनआक्रोश अपने चरम पर था। रामलीला मैदान में 13 दिनों के अनशन ने संसद को 'सेंस ऑफ द हाउस' प्रस्ताव पारित करने पर विवश किया, जिसके परिणामस्वरूप 1 जनवरी 2014 को 'लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम' लागू हुआ।
राजनीति से दूरी और नैतिक अडिगता
आंदोलन के बाद उनके कई साथियों ने चुनावी राजनीति की राह चुनी, किंतु हजारे अपनी वैचारिक शुचिता पर अडिग रहे। 2015 में वे भूमि अधिग्रहण विधेयक के खिलाफ किसानों के पक्ष में खड़े हुए। बाद में उन्होंने अपनी ही पुरानी टीम की दिल्ली आबकारी नीति पर भी तीखी आलोचना की। आलोचकों का कहना है कि यह नैतिक स्वतंत्रता ही उन्हें दलगत राजनेताओं से अलग करती है।
सादा जीवन, बड़ी विरासत
पद्म भूषण और अनेक वैश्विक पुरस्कारों से सम्मानित हजारे आज भी महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में अपने पैतृक गाँव रालेगन सिद्धि के संत यादवबाबा मंदिर से सटे एक छोटे से कमरे में अत्यंत सादा जीवन व्यतीत करते हैं। गौरतलब है कि रालेगन सिद्धि स्वयं एक मॉडल गाँव के रूप में विकसित हुआ, जो हजारे के समग्र विकास के दर्शन का जीता-जागता उदाहरण है।
आगे की राह
लोकपाल अधिनियम के लागू होने के वर्षों बाद भी इसके प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल बने हुए हैं। हजारे का संघर्ष यह याद दिलाता है कि कानून बनना और उसका वास्तविक अनुपालन — दोनों के बीच की खाई पाटना अभी बाकी है।