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मोहन भागवत का संदेश: अनुभव की शिक्षा कठिन, पर जीवनभर साथ देती है — मातृत्व सृष्टि का आधार

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मोहन भागवत का संदेश: अनुभव की शिक्षा कठिन, पर जीवनभर साथ देती है — मातृत्व सृष्टि का आधार

सारांश

आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने नई दिल्ली में मातृत्व को सृष्टि का मूल आधार बताया। उन्होंने कहा कि अनुभव से मिलने वाली शिक्षा कठिन होती है, फिर भी जीवनभर साथ रहती है — और माँ का स्नेह किसी भी उम्र में व्यक्ति की सबसे बड़ी शक्ति है।

मुख्य बातें

मोहन भागवत ने 24 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में मातृत्व और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों पर संबोधन दिया।
उन्होंने कहा कि मातृत्व केवल पारिवारिक भूमिका नहीं, बल्कि सृष्टि के निर्माण, विकास और पालन-पोषण का मूल आधार है।
भागवत के अनुसार, अनुभव से मिलने वाली शिक्षा कठिन होती है, फिर भी वह जीवनभर साथ रहती है।
उन्होंने भारत पर विदेशी आक्रमणों के दौर में हुए सामाजिक परिवर्तनों का उल्लेख करते हुए मूल सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण पर जोर दिया।
भागवत ने कहा कि माँ का भावनात्मक सहयोग बचपन से परे, जीवन के हर चरण में आवश्यक रहता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 24 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में एक संबोधन के दौरान मातृत्व, भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं और जीवन में अनुभव से मिलने वाली शिक्षा के महत्व पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने स्पष्ट किया कि मातृत्व केवल एक पारिवारिक भूमिका नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के निर्माण, विकास और पालन-पोषण की आधारशिला है।

मातृत्व पर पुरुष के बोलने का विरोधाभास

भागवत ने अपने संबोधन की शुरुआत एक स्वीकारोक्ति से की। उन्होंने कहा, 'मातृत्व जैसे विषय पर पुरुषों का बोलना अपने आप में एक विरोधाभास है, क्योंकि यह मूल रूप से महिलाओं के अनुभव और अधिकार से जुड़ा विषय है।' इसके बावजूद उन्होंने कहा कि इस विषय को बार-बार समझना और स्वीकार करना समाज के लिए आवश्यक है। उनके अनुसार, मातृत्व के महत्व को लेकर विभिन्न मंचों पर पहले भी चर्चा हो चुकी है, लेकिन इसकी प्रासंगिकता कभी कम नहीं होती।

मनुष्य की विचार-शक्ति और सृष्टि में उसकी भूमिका

सरसंघचालक ने कहा कि 'मातृत्व के बिना सृष्टि की रचना, उसका विकास और पालन-पोषण संभव नहीं है।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि प्रकृति ने सभी जीवों को जीवन दिया है, किंतु मनुष्य को सोचने-विचारने की विशेष क्षमता प्रदान की है। भागवत के अनुसार यही विचार-शक्ति मनुष्य को अन्य प्रजातियों से अलग करती है और चुनौतियों का समाधान खोजने में सक्षम बनाती है — इसी के बल पर मनुष्य समाज और सभ्यता के विकास का नेतृत्व कर रहा है।

भारतीय इतिहास, विदेशी आक्रमण और सांस्कृतिक संरक्षण

भागवत ने भारतीय इतिहास का संदर्भ देते हुए कहा कि समय के साथ देश को अनेक विदेशी आक्रमणों का सामना करना पड़ा। इन विषम परिस्थितियों में समाज को सुरक्षा के लिए कई ऐसे बदलाव अपनाने पड़े जो मूल भारतीय परंपराओं का हिस्सा नहीं थे। उनके अनुसार, 'कुछ परिवर्तन परिस्थितियों की मजबूरी में हुए, जबकि कुछ बाहरी प्रभावों के कारण समाज में आए।' उन्होंने आग्रह किया कि इतिहास की इन घटनाओं को समझते हुए अपनी मूल सांस्कृतिक सोच और मूल्यों को संरक्षित रखना अनिवार्य है।

अनुभव से मिलने वाली शिक्षा — कठिन, पर स्थायी

इस संबोधन का केंद्रीय संदेश देते हुए भागवत ने कहा, 'सीखने के कई माध्यम होते हैं। यदि मार्गदर्शन उपलब्ध हो तो व्यक्ति सहज रूप से आगे बढ़ता है, लेकिन कई बार अनुभव ही सबसे बड़ा शिक्षक बनता है। हालांकि अनुभव से मिलने वाली शिक्षा कठिन होती है, फिर भी वह जीवनभर साथ रहती है।' उन्होंने इसे मातृत्व के एक महत्वपूर्ण पहलू से भी जोड़ा — यह कि जीवन में परिवर्तन स्वाभाविक है और मनुष्य अपने अनुभवों से लगातार सीखता रहता है।

माँ का स्नेह — बचपन से परे, जीवनभर का सहारा

भागवत ने कहा कि माँ का भावनात्मक सहयोग केवल बचपन तक सीमित नहीं रहता। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, वह कभी-कभी माँ की बातों का विरोध भी करता है, लेकिन माँ का रिश्ता सबसे अलग और स्थायी रहता है। उनके अनुसार, 'जीवन में एक समय ऐसा आता है जब औपचारिक शिक्षा की आवश्यकता कम हो जाती है, लेकिन भावनात्मक मार्गदर्शन और अपनापन हमेशा जरूरी रहता है।' माँ का स्नेह व्यक्ति को मानसिक शांति, आत्मविश्वास और कठिन परिस्थितियों से उबरने की शक्ति देता है।

अपने संबोधन के अंत में भागवत ने कहा कि समाज को मातृत्व को केवल पारिवारिक भूमिका तक सीमित नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे मानवीय मूल्यों, संवेदनशीलता और सामाजिक संतुलन के आधार के रूप में स्वीकार करना चाहिए। परिवार और समाज दोनों की मजबूती में मातृत्व की भूमिका सर्वोपरि है — यह संदेश देकर उन्होंने अपनी बात समाप्त की।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसकी परतें गहरी हैं — विदेशी आक्रमणों के संदर्भ में 'मूल भारतीय परंपराओं' की पुनर्स्थापना का आग्रह आरएसएस के व्यापक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेंडे से सीधे जुड़ता है। उल्लेखनीय है कि भागवत ने स्वयं स्वीकार किया कि पुरुष का मातृत्व पर बोलना 'विरोधाभास' है — यह दुर्लभ आत्म-स्वीकृति मुख्यधारा की कवरेज में प्रायः नजरअंदाज हो जाती है। 'अनुभव सबसे बड़ा शिक्षक' वाला संदेश व्यक्तिगत स्तर पर सार्वभौमिक है, लेकिन सामूहिक स्तर पर यह प्रश्न उठता है कि क्या संस्थागत मार्गदर्शन — जैसा आरएसएस प्रदान करने का दावा करता है — अनुभव की जगह ले सकता है या नहीं।
RashtraPress
25 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मोहन भागवत ने मातृत्व के बारे में क्या कहा?
भागवत ने कहा कि मातृत्व केवल परिवार तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि यह सृष्टि के निर्माण, विकास और पालन-पोषण का मूल आधार है। उन्होंने इसे मानवीय मूल्यों और सामाजिक संतुलन की बुनियाद बताया।
भागवत ने अनुभव से मिलने वाली शिक्षा पर क्या विचार रखे?
उन्होंने कहा कि यदि मार्गदर्शन उपलब्ध हो तो व्यक्ति सहज रूप से आगे बढ़ता है, लेकिन कई बार अनुभव ही सबसे बड़ा शिक्षक बनता है। अनुभव से मिलने वाली शिक्षा कठिन होती है, फिर भी वह जीवनभर साथ रहती है।
भागवत ने भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं पर क्या कहा?
उन्होंने कहा कि विदेशी आक्रमणों के दौर में समाज को कई ऐसे बदलाव अपनाने पड़े जो मूल भारतीय परंपराओं का हिस्सा नहीं थे। उनका आग्रह था कि इतिहास को समझते हुए अपनी मूल सांस्कृतिक सोच और मूल्यों को संरक्षित रखना आवश्यक है।
भागवत के अनुसार माँ का स्नेह क्यों महत्वपूर्ण है?
भागवत ने कहा कि माँ का भावनात्मक सहयोग केवल बचपन तक सीमित नहीं होता — जीवन के हर चरण में व्यक्ति को भावनात्मक सहारे की जरूरत होती है और माँ वह स्थान है जहाँ बिना संकोच भावनाएं व्यक्त की जा सकती हैं। उनके अनुसार माँ का स्नेह मानसिक शांति और आत्मविश्वास देता है।
यह संबोधन कब और कहाँ हुआ?
आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने यह संबोधन 24 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में दिया, जिसमें उन्होंने मातृत्व, भारतीय संस्कृति और जीवन में अनुभव के महत्व पर विस्तार से विचार रखे।
राष्ट्र प्रेस
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