28 जुलाई 2026
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उज्जैन: आषाढ़ चतुर्दशी पर महाकालेश्वर मंदिर में भव्य भस्म आरती, भांग-चंदन से सजे राजाधिराज महाकाल

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उज्जैन: आषाढ़ चतुर्दशी पर महाकालेश्वर मंदिर में भव्य भस्म आरती, भांग-चंदन से सजे राजाधिराज महाकाल

सारांश

आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी पर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में बाबा महाकाल भांग और चंदन से सुसज्जित राजाधिराज स्वरूप में विराजे। पंचामृत अभिषेक और भस्म आरती के इस अलौकिक दृश्य के साक्षी बनने के लिए श्रद्धालु रात से ही कतारबद्ध रहे।

मुख्य बातें

28 जुलाई 2026 को आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी पर श्री महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन में भव्य भस्म आरती संपन्न हुई।
बाबा महाकाल का भांग और चंदन से शृंगार कर राजाधिराज स्वरूप में दर्शन दिए गए।
जलाभिषेक के बाद दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से बने पंचामृत से अभिषेक किया गया।
अब भस्म आरती में श्मशान की राख की जगह कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार भस्म का उपयोग होता है।
भस्म आरती में पुरुषों के लिए धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है।
श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर परिसर में बड़े पैमाने पर पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई।

उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में 28 जुलाई 2026 को आषाढ़ शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर बाबा महाकाल की भव्य भस्म आरती संपन्न हुई। भांग और चंदन से सुसज्जित राजाधिराज स्वरूप में विराजे बाबा के दर्शन पाने के लिए देश के कोने-कोने से श्रद्धालु रात से ही मंदिर के बाहर कतारबद्ध खड़े रहे।

मुख्य घटनाक्रम

मंगलवार की तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के पश्चात ढोल-नगाड़ों की गूँज के साथ बाबा महाकाल के कपाट खोले गए। मंत्रोच्चार के मध्य जलाभिषेक किया गया और इसके उपरांत दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस से निर्मित पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। बाबा को भांग और चंदन से श्रृंगारित कर राजाधिराज स्वरूप में भक्तों के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

जैसे ही दर्शन का क्षण आया, पूरा मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष, घंटियों की झंकार और शंखध्वनि से गुंजायमान हो उठा। मंदिर के पुजारी ने महाआरती संपन्न कराई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु साक्षी बने।

भस्म आरती की विशेषता

गौरतलब है कि महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती देश-विदेश में अपनी अलौकिकता के लिए प्रसिद्ध है। परंपरागत रूप से पहले श्मशान की राख से यह आरती संपन्न होती थी, किंतु अब विशेष रूप से कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार भस्म का उपयोग किया जाता है। यह बदलाव धार्मिक शुद्धता और आधुनिक स्वास्थ्य मानकों के बीच संतुलन का प्रयास माना जाता है।

भस्म आरती में सम्मिलित होने के लिए पुरुषों के लिए पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना अनिवार्य है — यह नियम मंदिर की धार्मिक गरिमा बनाए रखने हेतु लागू है।

श्रद्धालुओं की उपस्थिति और व्यवस्था

आषाढ़ चतुर्दशी के इस पावन अवसर पर मंदिर परिसर में असाधारण भीड़ उमड़ी। अपने आराध्य के दर्शन की लालसा में श्रद्धालु बीती रात से ही कतार में खड़े थे। मंदिर के आसपास व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़े पैमाने पर पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी।

यह ऐसे समय में आया है जब सावन माह की निकटता के कारण महाकालेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है। बाबा महाकाल की आरती को देखने के लिए जनसामान्य के साथ-साथ著名 हस्तियाँ भी उज्जैन आती रही हैं।

आगे क्या

आषाढ़ माह की समाप्ति और सावन के आगमन के साथ श्री महाकालेश्वर मंदिर में भक्तों का तांता और बढ़ने की संभावना है। मंदिर प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए विशेष प्रबंध जारी रहेंगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान का केंद्रबिंदु बन चुकी है — जहाँ आस्था और पर्यटन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। श्मशान भस्म से कपिला गाय के गोबर की भस्म तक का परिवर्तन परंपरा और आधुनिकता के बीच के उस तनाव को दर्शाता है जिसे मंदिर प्रशासन लगातार साधने की कोशिश कर रहा है। सावन के आगमन से पहले इस आरती में उमड़ी भीड़ यह भी संकेत देती है कि मंदिर प्रशासन और स्थानीय प्रशासन को भीड़ प्रबंधन के लिए और अधिक सुव्यवस्थित तंत्र की आवश्यकता है।
RashtraPress
28 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती क्या है?
भस्म आरती उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में प्रतिदिन तड़के होने वाला एक अनूठा धार्मिक अनुष्ठान है, जिसमें भगवान महाकाल को भस्म अर्पित कर आरती की जाती है। पहले यह भस्म श्मशान की राख से तैयार होती थी, अब कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से बनाई जाती है।
आषाढ़ चतुर्दशी पर महाकाल का शृंगार कैसे किया गया?
28 जुलाई 2026 को आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी पर बाबा महाकाल का भांग और चंदन से विशेष शृंगार किया गया। जलाभिषेक के बाद पंचामृत — दूध, दही, घी, शक्कर और फलों के रस — से अभिषेक संपन्न हुआ और बाबा को राजाधिराज स्वरूप में सजाया गया।
भस्म आरती में शामिल होने के लिए क्या नियम हैं?
भस्म आरती में सम्मिलित होने के लिए पुरुषों को पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं को साड़ी पहनना अनिवार्य है। यह नियम मंदिर की धार्मिक गरिमा और परंपरा को बनाए रखने के उद्देश्य से लागू किया गया है।
महाकाल की भस्म आरती देखने कब जाना चाहिए?
भस्म आरती प्रतिदिन तड़के होती है और इसके लिए पूर्व पंजीकरण की सुविधा उपलब्ध है। आषाढ़ और सावन माह में भीड़ विशेष रूप से अधिक होती है, इसलिए श्रद्धालुओं को रात से ही कतार में आना पड़ता है।
महाकालेश्वर मंदिर में भीड़ प्रबंधन कैसे होता है?
भस्म आरती और विशेष तिथियों पर मंदिर परिसर में बड़े पैमाने पर पुलिसकर्मियों की तैनाती की जाती है। मंदिर प्रशासन श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधा के लिए विशेष व्यवस्था करता है।
राष्ट्र प्रेस
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