उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती: आषाढ़ कृष्ण सप्तमी पर उमड़े हजारों श्रद्धालु
सारांश
मुख्य बातें
उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर में 7 जुलाई 2026 को आषाढ़ कृष्ण पक्ष सप्तमी के पावन अवसर पर बाबा महाकाल की भव्य भस्म आरती संपन्न हुई। इस अलौकिक अनुष्ठान के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु देर रात से ही मंदिर परिसर में कतारबद्ध हो गए थे। ढोल-नगाड़ों की गूंज और 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से समूचा मंदिर परिसर आस्था के रंग में रंग गया।
मुख्य अनुष्ठान क्रम
मंगलवार तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के पश्चात परंपरागत विधि से बाबा महाकाल के कपाट खोले गए। इसके उपरांत मंत्रोच्चार के बीच जलाभिषेक किया गया और दूध, दही, घी, शक्कर तथा फलों के रस से निर्मित पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ। बाबा को हरि ओम का जल अर्पित किया गया और कपूर आरती के बाद ढोल, झांझ एवं शंखध्वनि के मध्य पवित्र भस्म से भव्य शृंगार किया गया।
भस्म की विशेषता और परंपरा
जानकारों के अनुसार, परंपरागत रूप से पहले महाकाल को श्मशान की राख अर्पित की जाती थी, किंतु अब कपिला गाय के गोबर और औषधीय जड़ी-बूटियों से विशेष रूप से तैयार भस्म का उपयोग किया जाता है। यह परिवर्तन धार्मिक परंपरा को आधुनिक स्वच्छता मानकों के अनुरूप ढालने का प्रयास माना जाता है। भस्म आरती में सम्मिलित होने के लिए पुरुष श्रद्धालुओं को धोती-सोला और महिलाओं को साड़ी पहनना अनिवार्य है।
श्रद्धालुओं की आस्था और व्यवस्था
मंदिर के पुजारी ने महाआरती संपन्न कराई, जिसके बाद जैसे ही भक्तों को बाबा के दर्शन हुए, मंदिर परिसर घंटियों, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार से गुंजायमान हो उठा। बाबा महाकाल की भस्म आरती देश-विदेश में प्रसिद्ध है और इसे देखने के लिए सामान्य जनमानस के साथ-साथ著名 हस्तियाँ भी उज्जैन पहुँचती हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति को देखते हुए मंदिर परिसर एवं आसपास के क्षेत्र में पुलिस बल की व्यापक तैनाती की गई।
धार्मिक महत्व
महाकालेश्वर मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और उज्जैन को हिंदू धर्म के सात पवित्र नगरों — सप्तपुरियों — में गिना जाता है। आषाढ़ मास में भगवान शिव की उपासना का विशेष महत्व माना जाता है, यही कारण है कि इस माह में मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना बढ़ जाती है। आने वाले सावन माह में यह संख्या और अधिक बढ़ने की संभावना है।