बाल अपहरण पर सख्त कानून की मांग: सुप्रीम कोर्ट में वकील अश्विनी उपाध्याय की PIL दाखिल
सारांश
मुख्य बातें
देश में बाल अपहरण और चाइल्ड ट्रैफिकिंग के बढ़ते मामलों पर अंकुश लगाने के लिए कठोर कानूनी ढाँचे की माँग करते हुए वकील अश्विनी उपाध्याय ने बुधवार, 2 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की। याचिका में संगठित अपहरण माफिया, गैर-कानूनी गोद लेने के रैकेट और अंतरराज्यीय तस्करी नेटवर्क को जड़ से उखाड़ने के लिए तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की अपील की गई है।
याचिका में क्या आरोप लगाए गए हैं
याचिका के अनुसार देश में गैर-कानूनी गोद लेने का संगठित रैकेट सक्रिय है और अंतरराज्यीय चाइल्ड ट्रैफिकिंग नेटवर्क बेरोकटोक काम कर रहे हैं। इसमें दावा किया गया है कि बच्चों को यौन शोषण, अंग-तस्करी और मेडिकल ट्रायल जैसे अपराधों के लिए किडनैप किया जाता है। याचिका में यह भी कहा गया है कि पुलिस लापता और अगवा बच्चों के मामलों में तत्काल FIR दर्ज नहीं करती और जाँच की गति भी अत्यंत धीमी रहती है, जिससे अपराधियों को फलने-फूलने का अवसर मिलता है।
चौंकाने वाले आँकड़े
याचिका में उद्धृत आँकड़ों के अनुसार 1 जून 2026 तक उपलब्ध डेटा दर्शाता है कि वर्ष 2013 से बिहार में प्रतिवर्ष लगभग 15,000 लापता बच्चों के मामले दर्ज होते हैं, जिनमें से मुश्किल से 50 प्रतिशत बच्चे ही बरामद हो पाते हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के हवाले से याचिका में बताया गया है कि मानव तस्करी के सर्वाधिक मामले ओडिशा, बिहार, तेलंगाना और महाराष्ट्र में दर्ज हुए हैं। नाबालिग लड़कों की तस्करी में ओडिशा शीर्ष पर है, जबकि नाबालिग लड़कियों की तस्करी में राजस्थान सबसे आगे है। इन बच्चों को कथित तौर पर भीख मांगने, बाल मजदूरी और वेश्यावृत्ति जैसे गैर-कानूनी कामों में धकेला जाता है।
हालिया मामले का संदर्भ
याचिका में 5 जून 2026 को दिल्ली पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई का उल्लेख किया गया है, जिसमें 13 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस के अनुसार यह गिरोह दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात — पाँच राज्यों में सक्रिय था। गिरोह पर आरोप है कि वह EWS और BPL परिवारों के नवजात शिशुओं को अगवा कर उन्हें ₹8 से 10 लाख में बेच देता था।
याचिका में प्रमुख माँगें
याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय से निम्नलिखित निर्देश जारी करने की अपील की है:
पहली माँग यह है कि बाल अपहरण के मामलों की जाँच ACP या SHO स्तर के अधिकारियों द्वारा की जाए। दूसरी माँग में MLA-MP कोर्ट की तर्ज पर विशेष न्यायालय गठित करने की बात कही गई है, ताकि ऐसे मामले एक वर्ष के भीतर निपटाए जा सकें। तीसरी माँग में अपहरणकर्ताओं के परिजनों की संपत्ति जब्त करने का प्रावधान बनाने की अपील की गई है।
आगे क्या होगा
यह याचिका अभी सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल की गई है और सुनवाई की तारीख तय होना बाकी है। गौरतलब है कि बाल सुरक्षा से जुड़े मामलों में सर्वोच्च न्यायालय पहले भी सरकार को दिशा-निर्देश जारी कर चुका है। यह PIL उस व्यापक बहस को और तेज कर सकती है जो देश में POCSO अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन और बाल संरक्षण तंत्र को मजबूत करने को लेकर चल रही है।