2 सितंबर 2026
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बाल अपहरण पर सख्त कानून की मांग: सुप्रीम कोर्ट में वकील अश्विनी उपाध्याय की PIL दाखिल

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बाल अपहरण पर सख्त कानून की मांग: सुप्रीम कोर्ट में वकील अश्विनी उपाध्याय की PIL दाखिल

सारांश

वकील अश्विनी उपाध्याय की PIL सुप्रीम कोर्ट में दाखिल — बिहार में हर साल 15,000 लापता बच्चों के आँकड़े, 5 राज्यों में सक्रिय तस्करी नेटवर्क और दिल्ली में ₹8-10 लाख में नवजातों की बिक्री के मामले का हवाला देते हुए ACP-स्तरीय जाँच और स्पेशल कोर्ट की माँग।

मुख्य बातें

वकील अश्विनी उपाध्याय ने 2 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में बाल अपहरण पर सख्त कानून की माँग वाली PIL दाखिल की।
1 जून 2026 के आँकड़ों के अनुसार बिहार में वर्ष 2013 से प्रतिवर्ष लगभग 15,000 बच्चे लापता होते हैं; मुश्किल से 50% ही बरामद हो पाते हैं।
NCRB डेटा के अनुसार मानव तस्करी के सर्वाधिक मामले ओडिशा, बिहार, तेलंगाना और महाराष्ट्र में दर्ज हैं।
5 जून 2026 को दिल्ली पुलिस ने 5 राज्यों में सक्रिय गिरोह के 13 सदस्यों को गिरफ्तार किया; नवजात शिशुओं को ₹8-10 लाख में बेचा जा रहा था।
याचिका में ACP/SHO-स्तरीय जाँच , एक वर्ष में निपटारे के लिए स्पेशल कोर्ट और अपहरणकर्ताओं के परिजनों की संपत्ति जब्ती की माँग की गई है।

देश में बाल अपहरण और चाइल्ड ट्रैफिकिंग के बढ़ते मामलों पर अंकुश लगाने के लिए कठोर कानूनी ढाँचे की माँग करते हुए वकील अश्विनी उपाध्याय ने बुधवार, 2 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की। याचिका में संगठित अपहरण माफिया, गैर-कानूनी गोद लेने के रैकेट और अंतरराज्यीय तस्करी नेटवर्क को जड़ से उखाड़ने के लिए तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की अपील की गई है।

याचिका में क्या आरोप लगाए गए हैं

याचिका के अनुसार देश में गैर-कानूनी गोद लेने का संगठित रैकेट सक्रिय है और अंतरराज्यीय चाइल्ड ट्रैफिकिंग नेटवर्क बेरोकटोक काम कर रहे हैं। इसमें दावा किया गया है कि बच्चों को यौन शोषण, अंग-तस्करी और मेडिकल ट्रायल जैसे अपराधों के लिए किडनैप किया जाता है। याचिका में यह भी कहा गया है कि पुलिस लापता और अगवा बच्चों के मामलों में तत्काल FIR दर्ज नहीं करती और जाँच की गति भी अत्यंत धीमी रहती है, जिससे अपराधियों को फलने-फूलने का अवसर मिलता है।

चौंकाने वाले आँकड़े

याचिका में उद्धृत आँकड़ों के अनुसार 1 जून 2026 तक उपलब्ध डेटा दर्शाता है कि वर्ष 2013 से बिहार में प्रतिवर्ष लगभग 15,000 लापता बच्चों के मामले दर्ज होते हैं, जिनमें से मुश्किल से 50 प्रतिशत बच्चे ही बरामद हो पाते हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के हवाले से याचिका में बताया गया है कि मानव तस्करी के सर्वाधिक मामले ओडिशा, बिहार, तेलंगाना और महाराष्ट्र में दर्ज हुए हैं। नाबालिग लड़कों की तस्करी में ओडिशा शीर्ष पर है, जबकि नाबालिग लड़कियों की तस्करी में राजस्थान सबसे आगे है। इन बच्चों को कथित तौर पर भीख मांगने, बाल मजदूरी और वेश्यावृत्ति जैसे गैर-कानूनी कामों में धकेला जाता है।

हालिया मामले का संदर्भ

याचिका में 5 जून 2026 को दिल्ली पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई का उल्लेख किया गया है, जिसमें 13 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस के अनुसार यह गिरोह दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात — पाँच राज्यों में सक्रिय था। गिरोह पर आरोप है कि वह EWS और BPL परिवारों के नवजात शिशुओं को अगवा कर उन्हें ₹8 से 10 लाख में बेच देता था।

याचिका में प्रमुख माँगें

याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय से निम्नलिखित निर्देश जारी करने की अपील की है:

पहली माँग यह है कि बाल अपहरण के मामलों की जाँच ACP या SHO स्तर के अधिकारियों द्वारा की जाए। दूसरी माँग में MLA-MP कोर्ट की तर्ज पर विशेष न्यायालय गठित करने की बात कही गई है, ताकि ऐसे मामले एक वर्ष के भीतर निपटाए जा सकें। तीसरी माँग में अपहरणकर्ताओं के परिजनों की संपत्ति जब्त करने का प्रावधान बनाने की अपील की गई है।

आगे क्या होगा

यह याचिका अभी सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल की गई है और सुनवाई की तारीख तय होना बाकी है। गौरतलब है कि बाल सुरक्षा से जुड़े मामलों में सर्वोच्च न्यायालय पहले भी सरकार को दिशा-निर्देश जारी कर चुका है। यह PIL उस व्यापक बहस को और तेज कर सकती है जो देश में POCSO अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन और बाल संरक्षण तंत्र को मजबूत करने को लेकर चल रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन जमीनी क्रियान्वयन लड़खड़ाता रहा। बिहार में हर साल 15,000 लापता बच्चों में से आधे का कभी पता न चलना महज आँकड़ा नहीं, बल्कि राज्य की जवाबदेही पर सीधा सवाल है। ACP-स्तरीय जाँच और स्पेशल कोर्ट की माँग तार्किक है, किंतु असली परीक्षा यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश भी क्या पुलिस की संस्थागत उदासीनता और राजनीतिक संरक्षण को तोड़ पाएँगे — जो अब तक इस माफिया की सबसे बड़ी ढाल रहे हैं।
RashtraPress
2 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल बाल अपहरण PIL में क्या माँगा गया है?
वकील अश्विनी उपाध्याय ने 2 सितंबर 2026 को दाखिल इस PIL में बाल अपहरण मामलों की जाँच ACP या SHO स्तर के अधिकारियों से कराने, एक वर्ष में निपटारे के लिए स्पेशल कोर्ट गठित करने और अपहरणकर्ताओं के परिजनों की संपत्ति जब्त करने की माँग की है।
भारत में बाल तस्करी की स्थिति कितनी गंभीर है?
NCRB के आँकड़ों के अनुसार मानव तस्करी के सर्वाधिक मामले ओडिशा, बिहार, तेलंगाना और महाराष्ट्र में दर्ज होते हैं। बिहार में 2013 से प्रतिवर्ष लगभग 15,000 बच्चे लापता होते हैं और मुश्किल से 50 प्रतिशत ही बरामद हो पाते हैं।
5 जून 2026 को दिल्ली पुलिस ने किस गिरोह को गिरफ्तार किया था?
दिल्ली पुलिस ने 5 जून 2026 को 13 लोगों को गिरफ्तार किया था, जो दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात — पाँच राज्यों में सक्रिय एक तस्करी नेटवर्क चला रहे थे। यह गिरोह EWS और BPL परिवारों के नवजात शिशुओं को अगवा कर उन्हें ₹8 से 10 लाख में बेचता था।
नाबालिग लड़कियों की तस्करी में कौन-सा राज्य सबसे आगे है?
NCRB डेटा के अनुसार नाबालिग लड़कियों की तस्करी में राजस्थान में सर्वाधिक मामले दर्ज हुए हैं, जबकि नाबालिग लड़कों की तस्करी में ओडिशा शीर्ष पर है और बिहार दूसरे स्थान पर है।
इस PIL की सुनवाई कब होगी?
याचिका 2 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल की गई है और सुनवाई की तारीख अभी तय होना बाकी है। न्यायालय द्वारा नोटिस जारी होने के बाद केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों से जवाब माँगा जा सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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