31 जुलाई 2026
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बांके बिहारी मंदिर प्रबंधन समिति के फैसलों को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट आज करेगा सुनवाई

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बांके बिहारी मंदिर प्रबंधन समिति के फैसलों को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट आज करेगा सुनवाई

सारांश

मथुरा के बांके बिहारी मंदिर की परंपराएँ बनाम न्यायालय-नियुक्त प्रशासन — यह टकराव आज सर्वोच्च न्यायालय में फिर सुनाई देगा। 'देहरी पूजा' बंद होने और दर्शन समय बदलने से नाराज़ सेवकों की याचिका पर CJI सूर्यकांत की पीठ सुनवाई करेगी।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय आज CJI सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी.
मोहना की पीठ के समक्ष मथुरा के श्री बांके बिहारी मंदिर के सेवकों की याचिका पर सुनवाई करेगा।
याचिका में पारंपरिक 'देहरी पूजा' बंद करने और दर्शन समय में बदलाव को चुनौती दी गई है।
26 मई को कोर्ट ने 'राज भोग' और 'शयन भोग' गोस्वामी समूहों के 4 प्रतिनिधियों को प्रबंधन समिति में शामिल किया था।
अगस्त 2025 में न्यायमूर्ति अशोक कुमार की अध्यक्षता में उच्च-स्तरीय प्रबंधन समिति गठित की गई थी।
'श्री बांके बिहारी जी मंदिर ट्रस्ट अध्यादेश, 2025' के प्रमुख प्रावधानों पर सर्वोच्च न्यायालय की अंतरिम रोक जारी है।
उत्तर प्रदेश सरकार और समिति को मथुरा-वृंदावन क्षेत्र की व्यापक विकास योजना कोर्ट में पेश करनी है।

सर्वोच्च न्यायालय मंगलवार, 17 जून 2025 को मथुरा स्थित श्री बांके बिहारी मंदिर के सेवकों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करेगा। इस याचिका में मंदिर के कामकाज की देखरेख के लिए कोर्ट द्वारा गठित उच्च-स्तरीय प्रबंधन समिति के कुछ निर्णयों को चुनौती दी गई है, जिनके बारे में याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे मंदिर की सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं के विपरीत हैं।

किस पीठ के सामने होगी सुनवाई

सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित कॉज़ लिस्ट के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई करेगी। यह मामला मंदिर प्रशासन और पारंपरिक धार्मिक प्रथाओं के बीच संतुलन से जुड़े व्यापक विवाद का हिस्सा है।

याचिकाकर्ताओं की आपत्तियाँ

सेवकों की ओर से दायर याचिका में दो प्रमुख मुद्दे उठाए गए हैं — पहला, दर्शन के समय में किया गया बदलाव, और दूसरा, पारंपरिक 'देहरी पूजा' की प्रथा को बंद करना। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि प्रबंधन समिति के ये निर्णय मंदिर की उन धार्मिक परंपराओं को कमज़ोर करते हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं।

26 मई की सुनवाई में क्या हुआ था

26 मई को हुई पिछली सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च-स्तरीय प्रबंधन समिति का दायरा बढ़ाते हुए उसमें 'राज भोग' और 'शयन भोग' गोस्वामी समूहों से चार चुने हुए प्रतिनिधियों को शामिल किया था। कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि मंदिर प्रशासन में पारंपरिक धार्मिक प्रथाओं का उचित प्रतिनिधित्व हो। नए सदस्यों को निर्देश दिया गया था कि वे परंपराओं को बनाए रखने और रोज़मर्रा के कामकाज को बेहतर बनाने के लिए मिलकर उपाय सुझाएँ, जिसमें मौसम के अनुसार मंदिर के समय संबंधी सुझाव भी शामिल हों।

वृंदावन क्षेत्र के विकास पर भी होगा विचार

आज की सुनवाई में मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के व्यापक विकास से जुड़े मुद्दों पर भी ध्यान दिए जाने की उम्मीद है। 26 मई के आदेश में कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और प्रबंधन समिति को एक विस्तृत विकास योजना तैयार करने के निर्देश दिए थे। इस योजना में सड़कों को चौड़ा करना, व्यावसायिक गतिविधियों का नियमन, तीर्थयात्रियों के लिए बेहतर सुविधाएँ, पेयजल, अस्पताल, विश्राम स्थल, परिवहन सेवाएँ तथा महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांग भक्तों के लिए विशेष प्रबंध शामिल हैं।

समिति गठन की पृष्ठभूमि

अगस्त 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति अशोक कुमार की अध्यक्षता में उच्च-स्तरीय प्रबंधन समिति का गठन किया था। समिति को भीड़ प्रबंधन, तीर्थयात्री सुविधाओं, सुरक्षा उपायों और मंदिर परिसर के समग्र विकास की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उसी आदेश में कोर्ट ने 'श्री बांके बिहारी जी मंदिर ट्रस्ट अध्यादेश, 2025' के उन प्रावधानों पर भी अंतरिम रोक लगा दी थी, जिनके तहत राज्य सरकार को मंदिर प्रबंधन के लिए अलग ट्रस्ट बनाने का अधिकार दिया गया था। यह रोक तब तक जारी रहेगी जब तक इलाहाबाद उच्च न्यायालय इसकी संवैधानिक वैधता पर निर्णय नहीं सुना देता। आज की सुनवाई यह तय करेगी कि परंपरा और प्रशासनिक आधुनिकीकरण के बीच इस संघर्ष में न्यायालय किस दिशा में आगे बढ़ता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जितनी पीढ़ियों से जुड़े सेवक समझते हैं? 'देहरी पूजा' जैसी प्रथाओं का बंद होना महज़ प्रशासनिक सुविधा का मामला नहीं, बल्कि उस धार्मिक पहचान पर चोट है जो मंदिर की आत्मा है। गौरतलब है कि 'बांके बिहारी जी मंदिर ट्रस्ट अध्यादेश, 2025' पर रोक यह भी संकेत देती है कि राज्य सरकार का मंदिरों के प्रबंधन में बढ़ता हस्तक्षेप न्यायिक जाँच के दायरे में है। असली परीक्षा यह है कि क्या कोर्ट परंपरा और आधुनिक प्रशासन के बीच ऐसा संतुलन बना पाता है जो भक्तों, सेवकों और व्यापक जनहित — तीनों को स्वीकार्य हो।
RashtraPress
31 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बांके बिहारी मंदिर विवाद में सुप्रीम कोर्ट में आज क्या सुनवाई होगी?
आज CJI सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ मंदिर के सेवकों की उस याचिका पर सुनवाई करेगी, जिसमें कोर्ट-नियुक्त उच्च-स्तरीय प्रबंधन समिति के निर्णयों — विशेषकर 'देहरी पूजा' बंद करने और दर्शन समय बदलने — को चुनौती दी गई है। वृंदावन क्षेत्र की विकास योजना पर भी विचार होने की संभावना है।
बांके बिहारी मंदिर प्रबंधन समिति का गठन कब और क्यों हुआ?
अगस्त 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति अशोक कुमार की अध्यक्षता में यह समिति गठित की थी। इसका उद्देश्य मंदिर के रोज़मर्रा के कामकाज, भीड़ प्रबंधन, तीर्थयात्री सुविधाओं और सुरक्षा उपायों की देखरेख करना था।
'देहरी पूजा' क्या है और इसे क्यों बंद किया गया?
'देहरी पूजा' बांके बिहारी मंदिर की एक पारंपरिक धार्मिक प्रथा है जो सेवकों द्वारा मंदिर की देहरी (दहलीज़) पर की जाती है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, प्रबंधन समिति ने इसे बंद कर दिया है, जिसे वे परंपरा के विरुद्ध बताते हैं; हालाँकि समिति की ओर से इस पर कोई आधिकारिक कारण सार्वजनिक नहीं किया गया है।
'बांके बिहारी जी मंदिर ट्रस्ट अध्यादेश, 2025' पर रोक क्यों लगाई गई है?
सर्वोच्च न्यायालय ने इस अध्यादेश के उन प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाई है जिनके तहत उत्तर प्रदेश सरकार को मंदिर प्रबंधन के लिए अलग ट्रस्ट बनाने का अधिकार दिया गया था। यह रोक तब तक जारी रहेगी जब तक इलाहाबाद उच्च न्यायालय इसकी संवैधानिक वैधता पर फैसला नहीं सुना देता।
26 मई की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने क्या निर्देश दिए थे?
26 मई को कोर्ट ने प्रबंधन समिति में 'राज भोग' और 'शयन भोग' गोस्वामी समूहों के 4 प्रतिनिधियों को शामिल किया था। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार और समिति को मथुरा-वृंदावन क्षेत्र की व्यापक विकास योजना — जिसमें सड़क, परिवहन, पेयजल और दिव्यांग-अनुकूल सुविधाएँ शामिल हैं — कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे।
राष्ट्र प्रेस
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