बांके बिहारी मंदिर विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने 21 घंटे दर्शन व्यवस्था पर विचार का निर्देश दिया
सारांश
मुख्य बातें
मथुरा स्थित प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर के प्रबंधन और धार्मिक व्यवस्थाओं को लेकर दायर याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने 26 मई 2026 को अहम सुनवाई की। न्यायालय ने मंदिर प्रबंधन कमेटी को निर्देश दिया कि पारंपरिक धार्मिक व्यवस्थाओं की बहाली, भीड़ प्रबंधन में सुधार और रोज़मर्रा की व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के लिए गोस्वामियों के सुझावों पर गंभीरता से विचार किया जाए।
मुख्य घटनाक्रम
वकील अश्विनी उपाध्याय ने न्यायालय को बताया कि मंदिर के सेवायतों, सेवादारों और गोस्वामियों का आरोप है कि प्रबंधन कमेटी धार्मिक गतिविधियों में हस्तक्षेप कर रही है। दूसरी ओर, कमेटी की ओर से न्यायालय में स्पष्ट किया गया कि वह किसी भी धार्मिक परंपरा में दखल नहीं दे रही और सभी गतिविधियाँ पूर्ववत चल रही हैं। कमेटी ने यह भी कहा कि दर्शन का समय पहले से बढ़ाया जा चुका है।
21 घंटे दर्शन की माँग
अश्विनी उपाध्याय ने दलील दी कि जब बांके बिहारी मंदिर का निर्माण हुआ था, तब भारत की जनसंख्या लगभग 18 करोड़ थी — जिसमें वर्तमान पाकिस्तान और बांग्लादेश का क्षेत्र भी सम्मिलित था। आज देश की आबादी 145 करोड़ से अधिक है और करोड़ों श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में मज़दूरों, किसानों और आर्थिक रूप से कमज़ोर श्रद्धालुओं को पर्याप्त दर्शन समय नहीं मिल पाता।
उन्होंने तिरुपति बालाजी मंदिर और वैष्णो देवी मंदिर का उदाहरण देते हुए सुझाव दिया कि जहाँ प्रतिदिन लगभग 21 घंटे दर्शन की व्यवस्था रहती है, उसी मॉडल को बांके बिहारी मंदिर में भी लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने इस मंदिर को 'उत्तर भारत का तिरुपति' बताया और कहा कि वर्तमान में भक्तों को दर्शन के लिए मात्र कुछ सेकंड ही मिल पाते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश
न्यायालय ने 21 घंटे दर्शन के सुझाव पर कहा कि प्रबंधन कमेटी इस पर विचार करे। साथ ही, उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया गया कि मंदिर और उसके आसपास के क्षेत्र के लिए एक व्यापक योजना तैयार की जाए, जिसमें अस्पताल की व्यवस्था, श्रद्धालुओं के ठहरने की सुविधा, सड़कों का चौड़ीकरण और बुज़ुर्गों के आवागमन की बेहतर व्यवस्था जैसे पहलू शामिल हों।
गोस्वामियों के प्रतिनिधित्व का मुद्दा
अधिवक्ता तन्वी उपाध्याय ने बताया कि यह मामला पिछले वर्ष अगस्त में दायर किया गया था, जब मंदिर प्रबंधन से जुड़े अध्यादेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। उस समय न्यायालय ने अध्यादेश के साथ-साथ एक कमेटी के गठन का आदेश भी दिया था।
तन्वी उपाध्याय ने माँग रखी कि मंदिर के आंतरिक धार्मिक रीति-रिवाजों और परंपराओं में किसी प्रकार का हस्तक्षेप न हो। उन्होंने यह भी उठाया कि कमेटी के सदस्यों का चयन केवल कुछ आवेदनों के आधार पर किया गया, जबकि गोस्वामियों के दोनों प्रमुख समूहों — शयन भोग और राजभोग — के बीच विस्तृत चुनाव प्रक्रिया पहले ही संपन्न हो चुकी थी। उन्होंने आग्रह किया कि गोस्वामियों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों को कमेटी में उचित स्थान दिया जाए।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर विस्तृत सुनवाई के बाद कहा कि गोस्वामियों के प्रतिनिधियों को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए और मंदिर की आंतरिक धार्मिक परंपराओं पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। अगली सुनवाई में सरकार और कमेटी दोनों से जवाब अपेक्षित है।