एफसीआरए पर अखिलेश यादव का सरकार से सवाल: भारत का पैसा विदेश जा रहा, रोक क्यों नहीं?
सारांश
मुख्य बातें
समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष और सांसद अखिलेश यादव ने 10 अगस्त को संसद सत्र के दौरान केंद्र सरकार से तीखे सवाल पूछे — कि भारत का कितना धन विदेश जा रहा है और उस पर अंकुश लगाने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है। उन्होंने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के एकतरफे इस्तेमाल पर भी सवाल खड़े किए, यह तर्क देते हुए कि विदेशी फंड भारत में लाने पर तो सख्त पाबंदियाँ हैं, लेकिन भारतीय धन के बाहर जाने पर पर्याप्त रोक-टोक नहीं दिखती।
मुख्य आरोप और सवाल
पत्रकारों से बातचीत में अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सत्ता में आने के बाद बड़े और अमीर तबके के 'अच्छे दिन' आए हैं, जबकि आम जनता के लिए स्थिति नहीं बदली। उन्होंने कहा कि बड़ी मात्रा में भारतीय पैसा पहले ही विदेश जा चुका है और सरकार को इस पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
अखिलेश ने यह भी कहा कि यदि विदेश जाने वाले धन पर रोक नहीं लगाई जाती, तो FCRA के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं। उनके अनुसार, यह कानून कहीं केवल अल्पसंख्यकों को परेशान करने या आतंकवाद और टेरर फाइनेंसिंग के विरुद्ध सख्ती का संदेश देने तक सीमित तो नहीं रह गया है।
ममता बनर्जी के काफिले पर हमले की निंदा
अखिलेश यादव ने पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के काफिले पर हुए हमले को लेकर भी गहरी चिंता जताई। उन्होंने इसे लोकतंत्र के लिए दुखद घटना बताया और कहा कि एक वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री के साथ इस तरह का व्यवहार निंदनीय है। उनके अनुसार, ममता बनर्जी की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन सरकार इस दिशा में ध्यान नहीं दे रही।
उन्होंने यह भी कहा कि ममता बनर्जी बहुत बड़े अंतर से चुनाव नहीं हारी थीं और यदि केंद्रीय बलों की तैनाती नहीं होती तो संभव है कि चुनाव परिणाम अलग होता।
सपा सांसद राम गोपाल यादव का हमला
सपा सांसद राम गोपाल यादव ने महिला आरक्षण बिल, परिसीमन और FCRA को लेकर भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि यदि सरकार किसी विषय पर कार्रवाई करना चाहे तो उसके रास्ते में कोई बाधा नहीं आती। 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' का उल्लेख करते हुए उन्होंने दावा किया कि इसे उसी रात लागू कर दिया गया था, जिस दिन मतदान होना था।
FCRA बिल पर राम गोपाल यादव ने कहा कि इस विषय पर विशेषज्ञ अलग-अलग सुझाव दे रहे हैं और सरकार व विपक्ष की राय में भारी अंतर है। उन्होंने कहा कि यह पूरा मामला उन्हें संतोषजनक नहीं लगता।
राजनीतिक संदर्भ
यह बयान ऐसे समय में आया है जब संसद में FCRA सहित कई मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच तीखे मतभेद सामने आ रहे हैं। गौरतलब है कि FCRA के तहत हाल के वर्षों में कई गैर-सरकारी संगठनों के लाइसेंस रद्द किए गए हैं, जिसे विपक्ष एकतरफा कार्रवाई बताता रहा है। आलोचकों का कहना है कि कानून का दायरा और उसका क्रियान्वयन पारदर्शी नहीं है।
आगे यह देखना होगा कि सरकार इन सवालों का जवाब संसद के पटल पर देती है या नहीं, और क्या FCRA पर बहस किसी ठोस नीतिगत संशोधन की दिशा में आगे बढ़ती है।